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Friday 17 Nov 2017

जनवरी-15 का ‘अक्षर पर्व’। नंद चतुर्वेदी का बुद्धिजीवियों संबंधी लेख इस अंक की उल्लेखनीय उपलब्धि है।

जनवरी-15 का ‘अक्षर पर्व’। नंद चतुर्वेदी का बुद्धिजीवियों संबंधी लेख इस अंक की उल्लेखनीय उपलब्धि है। उन्होंने बहुत तार्किक, गंभीर और प्रामाणिक विश्लेषण किया है जिसमें बुद्धिजीवियों की भूमिका के मार्ग में आने वाली सभी पक्ष-विपक्ष विश्लेषित हुए हैं। ऐसे सर्वांग लेख कम ही देखने में आते हैं।

सर्वमित्राजी ने अपने उपसंहार में गीता को लेकर जो विचार व्यक्त किए हैं वे निभ्रन्ति हैं। भाजपाईयों का एक स्वभाव है कि वे किसी बात पर तटस्थ नहीं रह सकते। धर्म और हिन्दुत्व का भूत सिर पर हमेशा तैयार रहता है। राष्ट्रीय परिदृश्य पर भूमिका निभाने वालों से इतनी अपेक्षा तो रहती है कि वे अपने संकुचित दायरों को तोड़ें। गीता-रामायण जैसे ग्रंथों को किसी ठप्पा या प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है। वो हजारों साल से विश्व स्तर पर सर्वस्वीकृत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। सभी ने उसे मान्यता दी है।

इस बार की प्रस्तावना मलय की पुस्तक की समीक्षा बनकर रह गया है। अच्छा विवेचन किया है। सहज कविताओं का चयन अच्छा लगता है।

डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया, 12-एमआईजी, चौबे कॉलोनी,छतरपुर (म.प्र.) 471007