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Tuesday 21 Nov 2017

अक्षरपर्व दिसम्बर अंक में प्रकाशित चेखव की कहानी नींद पढ़ी। अब तक वार्का ज़ेहन में छाई है।

अक्षरपर्व दिसम्बर अंक में प्रकाशित चेखव की कहानी नींद पढ़ी। अब तक वार्का ज़ेहन में छाई है। चेखव को मैंने पहले भी पढ़ा है और हर बार उनकी कहानी ने गहरे तक संवेदना को छुआ है। वार्का कहींहमें वर्षों पहले की सामाजिक विद्रूपता में ले जाती है तो उतनी ही आज भी उसी रूप में खड़ी नजऱ आती है। युग बदले, समय बदला लेकिन शोषण, प्रताडऩा और अमानवीयता तो वैसी ही है। वार्का ने सिर्फ नाम रूस का पाया है लेकिन यह किरदार आज भी भारत से लेकर पूरे विश्व में सिसक रहा है या फिर अपराध के अंधेरों में कहींगुम हो रहा है। दरअसल बात जब बच्चों के प्रति अमानवीयता की होती है तो उससे जुड़े बहुत से विमर्श होते हैं। चेखव सच में कथा के कलाकार हैं, असर पैदा करने वाले जादूगर हैं। वे कथानक को बुनते हैं, गढ़ते हैं और सोचने पर मजबूर करते हैं, जहां से विमर्श के, बदलाव के ढेरों रास्ते खुल जाते हैं। आज हम बड़ी कोशिशों के बाद साहित्य रचते हैं और स्वयं को महान की श्रेणी में लाने के लिए मशक्कतें करते हैं। चेखव अपने आसपास से उठाकर बेहद साधारण को असाधारण बना देते हैं। कथा में संवेदना और मासूमियत के रंग भरकर महान हो जाते हैं। तेरह वर्ष की वार्का के भोले स्वप्नों को कथा में चेखव ने जिस तरह पिरोया है, वह अद्भुत है। कथा के अंत में ही प्रारंभ है, पुकार है, आग्रह है, समाज को बदलने के लिए। चेखव की कलम हमेशा यथास्थिति कहती है, लेकिन असीम वेदना भी कह जाती है। वार्का की नींद उन तमाम तरह के अधिकार हनन पर चोट करती है जो आश्चर्यजनक रूप से इस दुनिया में होते हैं। सर्वोत्तम में एक कहानी पढ़ी थी एक द्वीप की, जहां फंसे हुए कुछ लोग भूख की इंतहा होने पर एक-दूसरे को मारकर खाने लगते हैं। नींद भी उसी की कड़ी है। वार्का से नींद का हक छिन जाने पर उसका दिमाग (जिस पर नींद हावी है) अह्यपराध कर बैठता है। बच्चों की मासूमियत के फायदे पहले भी उठाए जाते रहे हैं और अब भी। वार्का को जानकर अंदर कुछ ऐसा अनुभूत होता है जो शायद चेखव को हुआ होगा। अनुवाद के  माध्यम से जो स्तरीय विश्व साहित्य हमें मिलता है उसके लिए सभी अनुवादकों का हमें आभारी होना चाहिए। तरूशिखा जी ने तो कर्जदार बना दिया।

मंदाकिनी श्रीवास्तव, एनडीएस, थ्री, 229, स्टेट बैंक के पास, किरन्दुल (जिला दंतेवाड़ा), छत्तीसगढ़

मो.9424278372