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Tuesday 21 Nov 2017

नागार्जुन का कविकर्म

विजय बहादुर सिंह

29 निराला नगर, भदभदा रोड, भोपाल

भूतपूर्व कवि और हिन्दी लेखक अजित कुमार ने अब इस पकी हुई उम्र में अनथक और अविराम सर्जक नागार्जुन के कवि-कर्म की विवेचना करते हुए उनकी प्रसिद्ध कविता ‘शासन की बंदूक’ की जो व्याख्या की है वह भले ही उनके अनुरूप हो पर कवि और कविता के अनुरूप तो कभी नहीं। इस व्याख्या से पहले वे यह निष्कर्ष दे चुके हैं कि नागार्जुन एक अभिधात्मक प्रतिक्रिया करने वाले कवि हैं। इससे जो सामान्यीकरण उन्होंने कर लिया है वही आगे उन्हें भटकाता भी रहा है। यहीं उन्होंने यह भी कह डाला है कि उनके काव्य शिल्प और छन्द-विधान में प्रचुर विविधता नहीं है। उनके इन कथनों के आलोक में जब हम नागार्जुन की प्रकृति और प्रेम संबंधी कविताओं की याद करते हैं या फिर उनके आक्रामक व्यंग्य-काव्य की याद करते हैं तब आलोचक के काव्य-विवेक को लेकर भारी असमंजस में पड़ जाते हैं। उनकी व्यंग्य कविताएं- सौन्दर्य प्रतियोगिता जयति नखरंजनी तो फिर क्या हुआ या फिर मंत्र कविता, हिन्दी काव्य-संसार की ऐसी संहारक कविताएं हैं जिनमें नागार्जुन की व्यंजना शक्ति की धार अपने चरम रूप में है। वे जब आठ पंक्तियों वाली अपनी ‘अकाल और उसके बाद’ वाली कविता लिखते हैं तब भी उनकी व्यंजना शक्ति ही अपनी प्रबलता दिखाती है। और तो और उनकी चर्चित प्रेम कविता- ‘यह तुम थी’ की पंक्तियां हंै-

कर गई चाक

तिमिर का सीना

ज्योति की फॉंक

यह तुम थी

तब भी तो अभिधा का नहीं, व्यंजना का ही सौन्दर्य प्रकट होता है।

ऐसा भी नहीं कि नागार्जुन अभिधा में लिखते ही नहीं। अभिधा उनकी प्रमुख प्रवृत्ति है इसे मानने में भी कोई हर्ज नहीं। किन्तु निराला भी मुख्यत: अमिधा के ही कवि हंै। कालिदास भी। प्रश्न किन्तु काव्य-मार्ग का नहीं है, उस अर्थ-संसार का है, जिसे नागार्जुन जैसे विलक्षण कवि प्रकट करते हैं। अजित कुमार जी ने यहीं कवि के साथ ज्यादती की है। अव्वल तो उन्होंने सारी कविता अपने ढंग से पढऩे की कोशिश की है। इसलिए उनके आग्रह इस संदर्भ में प्रबल हो उठे हैं। उन्होंने इस बहाने नागार्जुन को जनकवि के स्थान से भी अपदस्थ करना चाहा है। उनका कहना है कि जनकवि के रूप में नागार्जुन पर तात्कालिकता का दबाव अत्यधिक होने के कारण उनका काव्य कौशल असावधानी का शिकार होता गया। इसे प्रमाणित करने के लिए उन्होंने कवि की कविता ‘शासन की बंदूक’ को लिया है। उनकी व्याख्या के अनुसार- ‘हरे-भरे पेड़ को जलाकर ठूंठ कर देने के बाद, उस पर आ बैठी कोयल को भी जब बंदूक ने भून देना चाहा तो उसने फुर्र से उडक़र अपनी जान बचाई।’

इस व्याख्या के बाद की उनकी टिप्पणी भी गौरतलब है- सत्यमेव जयते का दंभ भरने वाले देश के एक जुझारू कवि का संदेश पूरा तो तब समझा जाता जब कविता का समापन कुछ इस तरह होता कि मार से दूर जा चुकी कोयल को तलाशती बंदूक पर घात लगाए गिद्धों-चीलों/छापामार दस्तों ने आकस्मिक हमला कर बंदूक को कुछ उसी तरह खत्म कर दिया, जिस तरह उसने कहा था कि जवानों ने दुश्मन का सफाया किया लेकिन इसके लिए अपेक्षित धैर्य, सूझ या संयम बरतने की जगह यदि नागार्जुन अविचारित वाहवाही से ही संतुष्ट हो गए तो यही इशारा किया जा सकता है कि गहरे अंधेरे को चीरकर सूरज की किरण फूट पडऩे वाली जिस सरलीकृत समाधान में हमारी बहुतेरी क्रान्तिधर्मी कविता भूलती-भटकती रही, उसका प्रतिवाद अंधेरे में का कवि पहले ही कर चुका था।

व्याख्या और टिप्पणी पर गौर करें तो दोनों ही अतिव्याप्ति और दुव्र्याख्या से सनी हुई हैं। पहली बात तो यही कि कविता में कहीं भी कोयल के फुर्र से उडऩे का उल्लेख नहीं है। वह तो उसी जले ठूंठ पर शासन की बंदूकों के बावजूद आ बैठती है और कूक-कूककर चली जाती है। अजित कुमार जी ने जो अर्थ लगाया और व्याख्या की, वह कविता में है ही नहीं, न ही कविता अभिधात्मक है। वह तो प्रतीकात्मक कविता है। दूसरे उसका काव्य-शिल्प इतना सुघड़, सुगठित, सुचयनित और सांकेतिक है कि वह उस कालातिगामी सत्य की स्थापना करता है कि इतने विध्वंस के बावजूद नवनिर्माण की ताकतें कभी भी उदास या पराजित नहीं होतीं। तमाम तरह के हिंसक विध्वंस के बावजूद कला और सृजन की ताकतें कभी पस्त या निराश नहीं होती। शासन या सत्ता का भय या व्यवस्था का आतंक और त्रास उन्हें कभी पराजित या आतंकित नहीं कर पाता। उनके हौसले कभी टूटते नहीं।

सच तो यह कि अजित कुमार जी स्वयं अति सरलीकरण में डूब गए हैं। स्वभावत: उनकी व्याख्या और टिप्पणी भी भ्रमात्मक हो उठी है।

रही बात प्रतिरोध की पद्धति और शैली की तो मुक्तिबोध ही क्यों समस्त जनवादी सोच वाले लोग यह मानते हैं कि वैयक्तिक प्रतिरोध से कई गुना मूल्यवान है सामूहिक प्रतिरोध। भारतेन्दु ने जब ‘आवहु सब मिलि कै भारत भाई।’ लिखा या राष्ट्रकवि ने ‘हम कौन थे...’ लिखा तब यही विचार-दृष्टि काम कर रही थी। यह तो नई कविता थी जो प्राय: व्यक्तिवाद के गर्त में डूबती चली गई जिसका प्रतिवाद मुक्तिबोध करते हैं।

अजित कुमार जी को कैसे यह नहीं मालूम कि नागार्जुन  केवल शाब्दिक या रचनात्मक प्रतिवाद के कवि नहीं हैं। उनके शब्द उनके आचरणों की कमाई हंै। वह चाहे बंगाल का किसान आंदोलन रहा, चाहे इंदिरा गांधी का आपातकाल, नागार्जुन एक नागरिक की तरह उससे भिड़ते और जेल जाते रहे। वे केवल कोरे शब्द कर्मी नहीं थे।

एक बात और। जनकवि का मतलब सिर्फ संघर्ष और प्रतिरोध नहीं। उस सत्ता और व्यवस्था की संभावना की टोह लेना भी है जिसमें फूल निरातंक होकर खिले और तितलियां स्वच्छंद होकर उड़ सकें। जन कविता जितनी दृढ़ और कठोर है उतनी ही तरल और कोमल भी। नागार्जुन उसके भरे-पूरे और सच्चे प्रमाण थे।