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Friday 24 Nov 2017

भाषा, फिल्म और सरकार

सर्वमित्रा सुरजन
भाजपा के राज में धर्म और संस्कृति के नाम पर जो खुलेआम तानाशाही की जा रही है, उसका ताजा उदाहरण है मुंबई के मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में शाम 6 से 9 यानी प्राइम टाइम में मराठी फिल्मों को दिखाने का सरकारी फरमान। उग्र प्रांतवाद और उग्र भाषावाद में रंगे इस फैसले से मराठी फिल्मों और भाषा का कितना भला होगा, कहा नहींजा सकता, लेकिन कला और साहित्य का नुकसान तय है। शिवसेना इस तरह के फैसलों की हमेशा हिमायती रही है, इसलिए उसे इसके पक्ष में होना ही था। लेकिन बहुत से लोग इस फैसले के पक्ष में नहींहै, जैसे शोभा डे। आखिर लोकतंत्र में असहमति के लिए भी स्थान होता है। शोभा डे ने महाराषट्र सरकार के इस फैसले पर मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडऩवीस को अपने एक ट्वीट पर तानाशाह बताया, और कहा कि गो मांस पाबंदी के बाद अब मराठी सिनेमा। जिससे मैं प्रेम करती हूं, यह वह महाराष्ट्र नहींहै। अपने दूसरे ट्वीट में उन्होंने कहा कि मुझे कब और कहां मराठी फिल्म देखनी है, यह मुझे तय करने दो, आपकी दादागिरी नहींचलेगी। इसके आगे उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अब मल्टीप्लेक्स में पापकार्न नहीं, दही-मिसल और वड़ा-पाव मिलेगा। शोभा डे की इन टिप्पणियों से सरकार को, उसकी सहयोगी शिवसेना को बहुत नाराजगी हुई। इस कदर कि शोभा डे के खिलाफ मराठी भोजन और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस की आलोचना के लिए महाराष्ट्र विधानसभा में विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश किया है। प्रस्ताव में मांग की गई है कि शोभा डे अपनी टिप्पणियों के लिए माफी मांगे। शोभा डे किसी संसदीय पद पर नहींहैं, इस देश की सामान्य नागरिक हैं, वे अपनी सरकार की आलोचना का अधिकार रखती हैं। असंसदीय बयान तो आए दिन मंत्री, सांसद और विधायक देते हैं, इनमें से कितनों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई, जनता देख रही है। हाल ही में देश के विदेश राज्य मंत्री ने मीडिया पर अशोभनीय टिप्पणी की। उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करना तो दूर, भाजपा के प्रवक्ता उनके पक्ष में खड़े नजर आए। शोभा डे ने वड़ा पाव का जिक्र मराठी भोजन की खिल्ली उड़ाने के लिए कतई नहींकिया होगा। यह सरकार की सोच पर कटाक्ष था, जिसे समझने के लिए उदार सोच चाहिए। कुछ दिन पहले ही भाजपा सांसद दिलीप गांधी के तंबाखू समर्थन वाले बयान पर कटाक्ष करते हुए शिवसेना के मुखपत्र सामना में लिखा गया कि उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया जाना चाहिए। तो क्या इस व्यंग्यात्मक टिप्पणी से नोबेल पुरस्कार का अपमान हो गया? दरअसल केेंद्र में बहुमत के साथ जीत कर आई भाजपा सरकार को यह गुमान हो गया है कि वह देश में जो चाहे कर सकती है। महाराष्ट्र में उसे पूर्ण बहुमत नहींमिला, लेकिन रवैया और अकड़ केेंद्र वाली ही है। मल्टीप्लेक्स में कब, कौन सी भाषा की फिल्म दिखाई जाए, इससे जरूरी दूसरे मुद्दे हैं, जैसे विदर्भ में सूखे की समस्या, किसानों की आत्महत्या, बारिश से नासिक में फसलों को नुकसान, नक्सलवाद का प्रसार, कुपोषण से जूझते बच्चे। क्या भाजपा और उसके सहयोगी दलों को इनका समाधान मिल गया है, जो वे मराठी अस्मिता की तथाकथित रक्षा में जुट गए हैं। निश्चित ही मराठी फिल्मों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। देश के अन्य राज्यों में भी क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। मराठी में कई उच्चश्रेणी की फिल्में बनी हैं और आस्कर पुरस्कार के लिए भारत की ओर से चयनित कर भेजी भी गईं। मराठी में कई सशक्त अभिनेता-अभिनेत्रियां हैं, जो मराठी के साथ-साथ हिन्दी फिल्मों में भी प्रशंसा बटोरते रहे हैं। लेकिन प्राइम टाइम में मराठी सिनेमा दिखाने के सरकारी आदेश से मराठी भाषा और कला-साहित्य को कोई खास लाभ मिलेगा, ऐसा कोई शोध-अध्ययन  तो शायद नहींहुआ है। सरकार के आदेश का पालन मल्टीप्लेक्स वाले करेंगे, लेकिन टिकट खरीद कर फिल्म देखने वाली जनता पर यह जबरदस्ती कैसे की जाएगी कि वह मराठी फिल्म ही देखे। भाषा पर इस हठधर्मिता से किसी का भला नहींहोने वाला। भाजपा और शिवसेना को यह समझना चाहिए कि राज्य के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने के लिए भाषा का ज्ञान जरूरी नहींहै, भावनाएं जरूरी हैं। एक उदाहरण से इस बात को बेहतर समझा जा सकता है ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक उडिय़ा नहींजानते, लेकिन हाल ही एक सर्वे में उन्हें देश के सर्वाधिक लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों में से एक बताया गया है।