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Monday 20 Nov 2017

छोटू भाई का आखिरी इंतजाम

कुन्दन सिंह परिहार

 59, नव-आदर्श कॉलोनी,

गढ़ा रोड, जबलपुर - 482002

मो. 9926660392

कुछ दिनों से छोटू भाई चिंतित नजऱ आते हैं । एक दिन आकर बैठ गये, कुछ इधर उधर की करने के बाद बोले, ‘देख भैया, अब अपन उमर के पचास पार कर गये । अब जिन्दगी का कोई ठिकाना नहीं । कौन सा रोग चिपक जाये पता नहीं। वैसे भी सब तरफ मरने की सुविधा उपलब्ध है। मोटरें, मोटरसाइकिलें सडक़ों पर इसीलिए दौड़ती फिर रही हैं। जो चाहे इस सुविधा का लाभ उठाकर स्वर्ग पहुंच सकता है। इस सेवा की कोई फीस नहीं लगती।

‘अब चूंकि जिन्दगी अनिश्चित हो गयी है इसलिए हमने सोचा है कि अपनी पसन्द के हिसाब से अपनी मौत का इंतजाम कर दिया जाये। जब जिन्दगी के हर कदम की प्लानिंग की तो इसे ही क्यों छोड़ दिया जाये ? अब दिखावे और प्रचार का जमाना है। जो दिखावा नहीं करता उसे कोई नहीं पूछता। इसलिए मौत के बाद का काम भी स्टैंडर्ड और सलीके से होना चाहिए ताकि लोग पाँच दस साल याद करें कि मौत हो तो छोटू भाई जैसी हो।’

मैंंने कहा, ‘बात अक्ल की है। क्या इरादा है ?’

छोटू भाई बोले, ‘ऐसा है कि तुम मुझसे तीन चार साल छोटे हो इसलिए माना जा सकता है कि मेरे रूख़सत होने के तीन चार साल बाद तुम्हारा नंबर लगेगा। मेरा इरादा है कि बीस पच्चीस हजार रूपये तुम्हारे पास छोड़ दूं ताकि तुम स्टैंडर्ड से हमारा सब काम करा दो। खर्च करने के बाद कुछ बच जाये तो अपनी भाभी को लौटा देना। मुझे भरोसा है कि तुम बेईमानी नहीं करोगे ।’

मैंने पूछा, ‘क्या चाहते हो?’

छोटू भाई बोले, ‘पहली बात तो यह है कि लोग उल्टे-सीधे कपड़े पहन कर शवयात्रा में पहुँच जाते हैं। गन्दा कुर्ता-पायजामा पहन लिया और कंधे पर तौलिया डाल कर चल पड़े। इससे शवयात्रा का स्टैंडर्ड गिरता है और मुर्दे की इज्जत दो कौड़ी की हो जाती है। मैंने अभी से अपने दोस्तों से कहना शुरू कर दिया है कि मेरी शवयात्रा में आएं तो ढंग के कपड़े पहन कर आएं नहीं तो घर में ही विराजें । मैंने यह भी बता दिया है कि जो मित्र सूट पहन कर आएंगे उनके सूट की धुलाई का पैसा तुमसे मिल जायेगा।

दूसरी बात यह कि शवयात्रा में कारें ज्यादा से ज्यादा हों। कार वाले दोस्तों रिश्तेदारों को बता रहा हूं कि कार से ही पहुंचे और चाहें तो पेट्रोल का पैसा तुमसे ले लें। जरूरी समझो तो किराये की चार-छ: कारें बुलवा लेना। हाल में मेरे पड़ोस में हिकमत राय मरे थे तो उनकी शवयात्रा में एक सौ दस कारें मैंने खुद गिनी थीं। क्या ठप्पेदार शवयात्रा थी। श्मशान में लोग मुर्दे को भूल कारों के मॉडल देखते रह गये। वो शवयात्रा अब तक आँखों में बसी है। तीसरी बात यह कि शवयात्रा में कम से कम तीन चार वी.आई.पी. जरूर पहुँचे। मैं इसके लिए लोकल वी.आई.पीज से सहमति और वादा ले रहा हूँ । साधारण जनता कितनी भी पहुंच जाये लेकिन बिना वी.आई.पी. के किसी भी मजमे में रौनक नहीं आती। मीडिया वालों से भी बात कर रहा हूँ । उनसे बता रहा हूँ कि एकाध दिन बाद तुम उन्हें बुलाकर चाय-पानी करा दोगे। ध्यान रखना कि श्मशान में सभी वी.आई.पी. मेरी तारीफ में थोड़ा-थोड़ा बोलें। तुम्हारे पास अपना फोटो छोड़ जाऊंगा। चार छ: दोस्तों के नाम से चार-छ: शोक-सन्देश फोटो के साथ अखबारों में छपवा देना । टी.वी. में भी ढंग से आ जाये। गुमनामी में मरे तो क्या मरे। जितना बन सके उतना प्रचार कर देना। एक दो दिन बाद किसी सार्वजनिक स्थान में शोकसभा कर लेना। इसके लिए एक बड़ा फोटो बनवा लिया है। सबको बता देना कि शोकसभा के बाद चाय-पकौड़े का इंतजाम रहेगा ताकि उपस्थिति अच्छी हो जाये ।’ छोटू भाई थोड़ा साँस लेकर बोले, ‘ये सब बुनियादी बातें हैं। इनमें तुम और जो जोड़ सको, जोड़ लेना। पांच-दस हजार तुुम्हारे भी लग जाएं तो लगा देना । आखिर दोस्ती किस दिन के लिए होती है ? लेकिन मेरी आखिरी यात्रा जलवेदार होना चाहिए। बजट में आ जाये तो एक दो अच्छे से बैंड बुलवा सकते हो। लेकिन शानदार हों, जैसे आर्मी के होते हैं। कोई ढपर-ढपर करने वाला मत बुलवा लेना। बढिय़ा बैंड होगा तो हम भी रास्ते भर म्यूजिक सुनते चले जायेंगे। तुम जानते हो मैं संगीत का शौकीन हूं । विदेशों में किराये पर रोने वाले मिलते हैं जो काले कपड़े पहनकर पूरी ईमानदारी और जोश से रोते हैं। यहां भी यह सिस्टम शुरू हो जाये तो शवयात्रा में चार चांद लग जाएं ।’ मैंने कहा, ‘छोटू भाई, आपने मेरे ऊपर बड़ी गंभीर जिम्मेदारी डाल दी लेकिन जैसा आपने खुद कहा जिन्दगी का कोई भरोसा नहीं है। कहीं मैं आपसे पहले दुनिया से रूखसत हो गया तो आपके दिये पैसों का क्या होगा?’ छोटू भाई मेरा कंधा थपक कर बोले, ‘उसकी चिन्ता तुम मत करो। तुम मेरे पैसे बहू के पास रख देना । तुम पहले चल बसे तो मैं उनसे ले लूंगा। वे धरम-करम वाली हैं। मेरा पैसा कहीं नहीं जायेगा।’ मुझसे पूरे सहयोग का आश्वासन पाकर छोटू भाई निश्चिंत उठ गये ।