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Monday 20 Nov 2017

‘‘बदरी बाबुल के अंगना जइयो....’’

डा.  कुंअर बेचैन से साक्षात्कार

वैद्यनाथ झा

हाउस न. 55 सी,

व्लाक सी 4 ए

जनकपुरी, नई दिल्ली

मो.958221968

डॉ. कुँअर बेचैन हिन्दी साहित्य में गीत, नवगीत एवं गज़ल विधा के सिद्धहस्त शिल्पी हैं। 1 जुलाई 1942 को मुरादाबाद (उप्र) के उमरी गांव में जन्मे डा. कुँअर बेचैन  अब तक एक महाकाव्य (पांचाली), 9 गीत संग्रह, 15 गजल संग्रह, दो कविता संग्रह, दो उपन्यास एक हाइकु संग्रह, एक दोहा संग्रह एक यात्रा वृत्तांत (यूके) रच चुके हैं, दो फिल्मों मे गीत दे चुके हैं। उनकी रचनाओं पर 22 शोध हो चुके हैं।

भीषण झंझावाती बचपन गुजार चुके डा. बेचैन अपने सामाजिक एवं सांस्कृतिक सरोकारों से गहराई और पूरी शिद्दत से जुड़े हैं। संवेदना उनकी रचनाओं का मूल तत्त्व है।  डा. बेचैन से मिलकर आश्चर्य होता है कि पांच हजार कवि सम्मेलनों में शिरकत कर चुका गीत गजल का इतना बड़ा शिल्पी इतना सहज, सरल और उदात्त कैसे हो सकता है।

यह साक्षात्कार नहीं, एक अग्रज-अनुज के बीच एक बातचीत है जहां अग्रज अपने अनुज की बालोचित जिज्ञासाओं का सहजता से शमन करता है। विशाल पेड़ की छाया-तले के सुख की गाथा है यह साक्षात्कार।

आपका उपनाम ‘बेचैन’ व्यक्ति को यह जानने के लिए बेचैन कर देता है कि बेचैन ही क्यों?

कवियों की एक आम प्रवृत्ति होती है कि वे उपनाम रखते हंै। इसी क्रम में मैंने भी सोचा कि मैं भी अपना कोई उपनाम रखूँ। पहले मैंने अपना उपनाम ‘अश्रु’ रखा। यह थोड़ा विचित्र-सा लगा तो ‘अश्क’ रख लिया। अब भी यह उपनाम मन को जँच नहीं रहा था। ये दोनों उपनाम या तो मुझे पता है या मेरी डायरी को । इन्हें मैंने घोषित नहीं किया। एक दिन अचानक मैंने ये पंक्तियां लिखीं-

मुझे दिन-रात किसी वक़्त भी राहत न मिली,

मैं हूँ बेच़ैन, मुझे चैन की आदत न मिली।

बस, इन पंक्तियों का बेचैन शब्द मुझे जँच गया और उपनाम की समस्या हल हो गई। मेरा पूरा नाम तो कुँअर बहादुर सक्सेना है मगर धीरे धीरे बहादुर और सक्सेना हट गए और कुँअर बेचैन साथ रह गए।

आपने पहली कविता कब शुरू की ? वे पंक्तियाँ क्या थीं?

मैं नवीं कक्षा में पढ़ता था, तब यह कविता लिखी और अपने क्लास टीचर को दिखाई थी। पहले तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि यह कविता मैंने लिखी है। मगर बाद में मैं उनका प्रिय छात्र बन गया।  ये ही मेरी पहली कविता की पंक्तियाँ हैं-

ऐे सुन्दर फूलों की सुन्दर आशाओं

हो सके अगर तो मुझको यह बतलाओ

तुममें यह मादक गंध कहाँ से आई

रंगों ने तुममें कैसे ली अंगड़ाई

क्यों बजा रहे भँवरे प्रतिपल शहनाई

मैं सोया हूँ तुम मुझको अभी जगाओ

ऐ सुन्दर फूलों की सुन्दर आशाओं।

आपके जीवन का पूर्वाद्ध लोगों के सम्मुख जितना आया है, वह बेहद तनावपूर्ण, बेचारगी, अभाव व असंतोष भरा रहा है। साहित्य का यह मिथक रहा है कि  व्यक्ति में एक कवि के जन्म लेने के लिए ये ही तत्त्व आवश्यक माने जाते हंै।

यह सच है कि दो महीने की आयु में मेरे पिता की मृत्यु हो गई, सात आठ वर्ष का था तो मेरी मां भी चल बसी। मैं पांचवी कक्षा में था तो मेरी आश्रयदात्री बड़ी बहन की भी मृत्यु हो गई। मैं अपने बहनोई श्री जंगबहादुर सक्सेना के संरक्षकत्व में बढऩे लगा। दरअसल बात यह है कि उन दिनों समाज की संस्कृति उदार, संवेदनशील और सहअस्तित्व पूर्ण थी। मातृ-पितृ-विहीन मैं अपने गली-मोहल्लेवालों का लाड़ला बन गया। गांव की संस्कृति में अनेकानेक जातियों, उपजातियों, सम्प्रदायों के लोगों के रहने के बावजूद उनमें आपस में कोई दुराव, अलगाव या भेद नहीं था। लोगों में करुणा थी। गांव के उस समाज ने मुझे किसी वस्तुु या निश्छल प्रेम से कभी वंचित नहीं किया। अत: उस उम्र में मैंने किसी वस्तु या स्नेह की कमी महसूस नहीं की। हां, इतना ज़रूर था कि मां-पिता, बड़ी बहन जो दे सकते थे, वह अन्य कैसे दे सकते थे।

सृजन-कर्म के लिए सम्पन्नता-विपन्नता मायने नहीं रखती। सम्पन्न लोगों को भी किसी न किसी चीज का अभाव तो होता ही है। वास्तव में संवेदनशील हृदय, उर्वर भावभूमि, दूसरे की अनुभूतियों को अंगीकार करने जैसी प्रवृत्ति ही सृजन कर्म की ओर प्रेरित करती है।

अपनी रचना-यात्रा में आप स्वयं पर किसका अधिक प्रभाव मानते है?

मैं अपनी रचना-यात्रा में किसी का प्रभाव नहीं मानता। मैं गीत-नवगीत का गायक हूं, जीवन के अनुभवों को गीतों में पिरोकर पेश करता हूं। मैं कथ्य, प्रतीक एवं बिम्ब अपने परिवेश से लेता हूं। इस दिशा में स्कूल के दिनों के मेरे क्लास टीचर पंडित माहेश्वर दयाल शर्मा जी मेरे प्रेरक थे। उनकी प्रेरणा से ही मैं इस पथ पर अग्रसर हुआ। मेरी पहली कविता ‘ऐ सुन्दर फूलों’ में ही संभवत: उन्होने मेरा भविष्य बांच लिया था।

हिन्दी साहित्य में नई कविता के आने से सबसे अधिक प्रभावित गीत विधा ही हुई है। क्या आपको लगता है कि नई कविता की छन्दमुक्त शैली ने गीतों की मौलिकता, शब्द-विन्यास, गेयता आदि को प्रभावित किया है?

यह एक ध्रुव सत्य है कि समय परिवर्तन का प्रबलतम कारक है। समय के बदलने के साथ नई कविता का दौर शुरू हुआ। विचारों, सिद्धांतों को कविता में भी प्रमुखता मिलने लगी। प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के दौर आए। साहित्य में माक्र्सवाद, वामपंथ, विचार और सिद्धांत के रूप में आया। छंदों के अनुशासन से मुक्ति का मार्ग तलाशा जाने लगा। गीत-नवगीत में भावधारा प्रधान होती है। भावना के आगे तर्क नहीं टिकते। मगर नई कविता और छन्दमुक्ति के दौर में यथार्थवाद ज्यादा उभरा। निश्चय ही प्रगतिशील साहित्यकारों ने विचार व विश्लेषण को ज्यादा महत्व दिया। छन्द, गेयता, कलापक्ष दबा दिया गया। इसके बावजूद गीतकारों ने हार नहीं मानी। उन्होंने भी विचारों, यथार्थ, परिवेश की सच्चाई, समकालीनता को अपने गीतों में स्थान दिया। मेरी गज़ल में एक शेर की ये पंक्तियों देखिए-

हजारों खुशबुएं दुनिया में हैै

पर उससे कमतर है

किसी भूखे को जो सिंकती हुई रोटी से आती है।

एक गीत की ये पंक्तियाँ भी द्रष्टव्य हैं-

मीठापन जो लाया था मैं गाँव से

कुछ दिन शहर रहा

अब कड़वी ककड़ी है।

तब तो नंगे धूप में ठंडे थे

अब जूतों में रह कर भी पांव जल जाते है।

तब आया करती थी महक पसीने से

आज इत्र भी कपड़ों को छल जाते हंै।

मुक्त हँसी जो लाया था मैं गाँव से

अब अनाम जंजीरों ने आ जकड़ी है।

जहां तक बात छन्दमुक्ति की है तो निराला ने भी तो छन्दमुक्त (जूही की कली जैसी कविता) लिखी मगर छन्दों को तोडऩे के बाद भी उसमें प्रवाह बना रहा।

दूसरी बात, नई कविता के जो पक्षधर हैं वे गीतकारों पर यह आक्षेप लगाते हैं कि ये लोग भावों की आत्ममुग्धता में जीते है। इन्हें अपने परिवार, समाज के यथार्थ से क्या लेना-देना है तो मैं फिर यही कहूँगा कि जिस कटु यथार्थ, विषमता, असंतोष की बात वे छंदों को तोडक़र कहते हैं, वही बात हम भी छन्दों में गाकर कहते हैं। तभी तो मैं लिख पाया -

होटल / जिसके दरवाजे  हैं /बड़े सजे-सँवरे

लेकिन हैं अश्लील जहां के नाजायज कमरे ।

आपने बच्चन जी, गिरिजा कुमार माथुर, भवानी प्रसाद मिश्र, सोम ठाकुर, गोपाल दास नीरज, रमानाथ अवस्थी, वीरेन्द्र  मिश्र आदि का दौर देखा है और आज के गीतकारों का दौर देख रहे है । इस लम्बी यात्रा में आप क्या प्रवृत्तिगत बदलाव  पाते है?

जी हां, मैने तो राष्ट्रकवि सिंह दिनकर, पं. सोहनलाल द्विवेदी, रामकुमार वर्मा, बच्चन जी, श्याम नारायण पाण्डे, नीरज जी के समक्ष और उनकी अध्यक्षता में मंच पर कविता पाठ किया है। एकाध  अवसरों पर दिनकर जी ने मेरी कविताओं को सुना तो बुलाकार पीठ ठोंक उत्साह बढ़ाया। उस दौर के कवियों के पास सुन्दर शब्द संयोजन था, छंदों का अनुशासन, परम्पराओं और शास्त्रीय विधानों के प्रति निष्ठा थी। कला के प्रति गहरी निष्ठा थी। आज की पीढ़ी को गहरे उतरने का अवसर ही नहीं मिलता। कला-पक्ष के प्रति कोई आग्रह नहीं है, न ही धैर्य। सब कुछ ‘इन्स्टेंट’ चाहते हैं। इस प्रवृत्ति के मूल में आज का व्यस्त वातावरण है। इसमें दोष नई पीढ़ी का भी नहीं है। आज सबके पास समय की कमी है।

आपके गीत संवेदना के बेहद कोमल तंतुओं को झनझनाते हैं तो गजलें जीवन मूल्यों की पुरजोर वकालत करती हैं। सर्जना के स्तर पर आप इन दोनों में संतुलन कैसे स्थापित करते हैं?

संतुलन का कोई प्रश्न ही पैदा नहीं होता। यथार्थ से मुठभेड़ से मिलने वाले जीवन के अनुभव संवेदना के रस से सिक्त हो शब्दों के ताने-बाने से जो वस्त्र बुनते हैं, वे गीत भी होते हंै और गज़़ल भी। जीवन-मूल्य तो गीतों और गज़लों में भी आते है।

तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी।

किसी के पांव से कांटा निकाल कर देखो

हां, एक बात ज़रूर है। गीत काफ़ी एकाग्रता और लम्बे भावभूमि विचरण की मांग करते हैं। गेयता तो होती ही है कथ्य की तारतम्यता भी होती है। गज़़ल में पांच-सात शेर में बात खत्म। एक गज़़ल में कथ्यों की विविधता लिए हुए अलग-अलग शेर भी हो सकते हैं। तो यह सृजन-वैभिन्य अपने आप निभ जाता है। मेरी एक गज़़ल का शेर देखिए-

तब गज़़ल में प्यार के ही काफिय़ों का जोर था

अब गज़़ल में प्यार का ही काफिय़ा बीमार है।

क्या आपको लगता है कि हिन्दी गज़़लों के समाज-सापेक्ष स्वरूप ने उर्दू की गज़़लों के स्वरूप को प्रभावित किया? यदि हां तो कहां तक और कैसे?

बेशक। उर्दू गज़लों के कथ्य एक सीमित परिधि में थे। या वे कथ्य की दृष्टि से कुछ बाहर भी आए तो पुराने प्रतीकों से बाहर नहीं आ सके। इसके विपरीत दुष्यंत ने ऐसी गज़़लें कहीं जिससे गज़़ल का मिज़ाज़ ही बदल गया । यही नहीं, दुष्यंत कुमार से पहले हिन्दी साहित्य के कई नामचीन साहित्यकारों ने भी हिन्दी में गज़़लें लिखी मगर दुष्यंत कुमार ने अपने परिवेश के प्रतीकों को उठाकर समकालीन चुनौतियों को अपना कथ्य बनाया। हिन्दी गज़़लों को मुख्यधारा में लाने का श्रेय उन्हें ही जाता है। अपने तत्कालीन समाज की विसंगतियों, विषमताओं, आक्रोश, को उन्होंने अपनी गज़़लों का कथ्य बनाया। परेशान समाज को एक स्वर मिल गया, एक मंच मिल गया।

हिन्दी गज़़लों की बढ़ती लोकप्रियता ने उर्दू गज़़लों को भी एक व्यापक फलक दिया। गज़़लों के कथ्य ने भी करवट बदली। पहले के कवि और शायरों में से अधिकतर राज्याश्रय में होते थे। राजाओं, बादशाहों को खुश करना उनका अभीष्ठ था। इसलिए राजकीय/ दरबारी परिवेश के बिम्ब, प्रतीक आदि का प्रयोग हुआ। इश्क, शराब, पैमाना, सागर, मयखाने आदि प्रतीक हुआ करते थे।

कालान्तर में शायरों, कवियों का संपर्क आम जनता उनके दुख-दर्द, यथार्थ से बढऩे लगा तो प्रतीकों का आज का सामाजिक पाखंड, विषमता, जीवन-मूल्यों के ह्रास आदि विषय गज़़लों में भी आने लगा। वे भी मीना, पैमाना, जाम, शराब, चिराग, महताब, आफताब से ऊपर उठकर कहने लगे। मेरा ही एक शेर देखें-

होके मायूस न यूं शाम-से ढलते रहिये

जिन्दगी भोर है सूरज से निकलते रहिये।

एक प्रासंगिक प्रश्न - हिन्दी के शीर्ष आलोचक गज़़लों का विरोध क्यों करते है।

सामान्यत: समालोचना के शिखर पुरूषों ने शायद गज़़ल विधा की ओर झांकने की जहमत ही नहीं उठाई, विचार योग्य ही नहीं समझा जब कि दुष्यंत कुमार सरीखे लोगों ने गज़़ल को भी हिन्दी साहित्य में एक सशक्त विधा के रूप में स्थापित कर दिया। ये समालोचक गज़़ल जैसी गेय कविता को चर्चा के योग्य ही नहीं मानते। बस, यही अन्तर है।

हिन्दी गीत और गज़़ल को व्यापक स्वीकार्यता के लिए किस तरह के संघर्षों का सामना करना पड़ रहा है?

मैंने पहले भी कहा है कि चंूकि हिन्दी गीत और गज़़ल समकालीन संदर्भों को स्वयं में समाविष्ट करते रहे हंै, उनका शब्द-भंडार  प्रचुर रहा हैै, गेयता का परिसर भी व्यापक रहा है। अत: संघर्ष वाली बात नहीं है। हां, नई कविता ने थोड़ी बाधा जरूर डाली परन्तु जीत तो गीतों की हुई। दुष्यंत कुमार ने यह संघर्ष खत्म ही कर दिया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि जनता के बीच जनता की बात कहकर ही आप स्वीकार्य रह सकते हैं, इश्क, शमां, चराग, साकी, मयखाना, टूटी बोतलों के जिक्र से नहीं।

आप लगभग पचास-पचपन वर्षों से मंच पर काव्य पाठ कर रहे हंै। पुराने दौर के गीतों, नवगीतों, कविताओं और गज़़लों में परम्पराओं, जीवन-मूल्यों, छन्द, संगीत की उपस्थिति रहती थी, श्रोताओं का ‘स्पान्टेनियस इन्वाल्वमेंट’ होता था जो आज के दौर में कम है। यह पीढ़ी-अन्तराल का प्रभाव है या तेजी से बदलते जीवन मूल्यों व सामाजिक आर्थिक वातावरण का प्रभाव है या और कुछ?

समय एक चक्र है जो हमेशा गतिमान रहता है। प्रकृति किसी भी कालखंड या युग चरित्र को बहुत लम्बे तक बने रहने की इज़ाज़त नहीं देती। आज के दौर में कवि सम्मेलनों में आने वाला श्रोता अपनी दैनिक गतिविधियों में इतना व्यस्त रहता है, समय की कमी से इतना जूझता है कि दीर्घ कलात्मक कविता या गीत सुनने का उसके पास धैर्य नहीं है। वह सब कुछ तुरंत पाना चाहता है - बस एक क्लिक पर।

 आज कवि सम्मेलनों और काव्य गोष्ठियों में जो श्रोता आते हंै, वे तीन स्थितियों में आते हंै-या तो वे तनाव में हों या क्रोध में या गति पसंद करते हों। मंच पर जब उन्हें चुटकुलेनुमा हास्य व्यंग्य की कविताएं मिलती हंै तो उनका तनाव दूर होता है, गीत/नवगीत व्यवस्था की कमियों को उठाते है तो उनका क्रोध शांत होता है। और कम से कम शब्दों में बात उन तक पहुंचती है तो वे संतुष्ट होते हैं। आज  का कवि इसी तुरंत-फुरंत के अस्त्रों से लैस होता है। इसलिए आज मंच पर वही कवि जम रहा है जो तुकान्त, चुटकुले नुमा छोटी-छोटी कविताएं प्रस्तुत करता है। वह लोगों के अधैर्य को भुनाता है। निश्चय ही यह बदलते समय का प्रभाव है।

खुली मंचीय परम्परागत काव्यगोष्ठियों को इलेक्ट्रानिक मीडिया कितना प्रभावित कर रहा है?

इसमें कोई शक नहीं कि इलेक्ट्रानिक मीडिया कवि-सम्मेलनों और गोष्ठियों, चर्चाओं को व्यापक मंच, श्रोता दे रहा है परन्तु खुले मंच इन गोष्ठियों को जीवन्तता देते हैं- ‘लाइवलीनेस’ देते हैं। श्रोता अपने प्रिय कवि से प्रत्यक्ष संवाद कर सकता है, उसे लाइव देख सकता है, उसकी-भाव गंगा में बह सकता है। यह बात मीडिया में उतना संभव नहीं है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इतने चैनलों के बावजूद  खुली काव्य गोष्ठियों, कवि-सम्मेलनों की संख्या बढ़ती जा रही है।

ऐसा देखा गया है कि कवि सम्मेलनों में मंच पर जब आप कविता-पाठ नहीं कर रहे होते हैं तो कुछ नोट कर रहे होते हैं। यह अपने खाली समय का उपयोग है या और कुछ?

दरअसल मैं आजकल कवि सम्मेलनों का एक इतिहास लिखने पर काम कर रहा हूँ। जब मंच पर मेरी बारी नहीं होती है तो मैं वहां उपस्थित श्रोताओं की संख्या, कवियों के नाम, उनकी कविताओं, जनता से वाह-वाही मिलने वाली पंक्तियां नोट करता हूँ। मैं अब तक पांच हजार काव्य-गोष्ठियों में शिरकत कर चुका हूँ। कवि सम्मेलनों के इतिहास-लेखन का काम संभवत: अब तक किसी ने नहीं किया है।

एक जगह आप लिखते हैं और गाते हैं -

ग़म मिलते हैं तो और निखरती है शायरी

ये बात है तो सारे जमाने का शुक्रिया।

क्या यह जमाने से जिंदगी को मिले गिले-शिकवे का माफीनामा है? अर्थात- एक रचनात्मक, सकारात्मक सोच?

माफीनामा ? कैसा माफीनामा और किससे ? कतई नहीं । बल्कि जीवन में मिले दुखों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है - एक सकारात्मक सोच कह सकते हैं। ये न होते तो आज कुँअर बेचैन न होकर कोई कुँअर बहादुर सक्सेना या मि. के. बी. सक्सेना होते।

आग थे, अंगार थे और धूप के उपमान थे

हम अगर पानी नहीं होते तो रेगिस्तान थे।

जीवन की कोई संवेदनशील, मार्मिक घटना जो आप भूल नहीं पाते?

वैसे मेरे जीवन में मेरी बड़ी बहन की मृत्यु मेरे लिए अत्यंत मार्मिक घटना थी परन्तु एक और भी ऐसी घटना मेरे जीवन में घटी जो आज भी मेरी संवेदना को झकझोर देती है।

मैं नवीं कक्षा में पढ़ रहा था। मेरा एक घनिष्ठ मित्र लम्बा था। वह अंतिम पंक्ति में और मैं छोटे कद के होने के कारण क्लास में अगली बेंच पर बैठता था। उन दिनों मेरी विपन्नता चरम पर थी। मेरे पास दो पायज़ामे और दो कमीजें़ थीं। एक धोकर सुखाता और दूसरे दिन पहन कर स्कूल जाता था। उस दिन बरसात हो रही थी। कपड़े सूखे नहीं और रास्ते में उस पर कीचड़-मिट्टी के छींटे पड़ गए। मैं उन्हीं कपड़ों में क्लास में आया और अगली बेंच पर बैठ गया। मेरे अध्यापक तन्मयता से पढ़ाते रहे थे। अचानक उनका ध्यान मेरे गंदे कपड़ों पर गया और वे भडक़ गए । मुझे बुरी तरह से डांटा। असह्य अपमान के कारण मैं क्लास से बाहर आकर कोने में खड़ा होकर रोने लगा। तब तक मेरे उस घनिष्ठ मित्र ने अध्यापक को मेरी वास्तविकता बता दी थी। गुरूजी ने तुरंत कक्षा समाप्त कर दी। बाहर आकर मुझे ढूँढऩे लगे। मुझे कोने में रोता देख मेरे पास आए और फूट-फूटकर  कर रोने लगे। मुझसे माफी मांगने लगे -बेटा, मुझे माफ  कर दे की रट लगाने लगे।

आज भी नहीं भूलता अध्यापक की इस सदाशयता, अपराध -बोध की ईमानदार स्वीकृति को। आज ऐसे अध्यापक कहां मिलते है। आज के छात्र तो अध्यापक के इस डांट पर उनका सिर फोड़ दें।

अपनी सृजन यात्रा से कितना संतुष्ट हैं?   

संतुष्टि कहां ? संतुष्टि का अर्थ है -सृजन की मृत्यु। यह सृजन तो जीवन के अंतिम क्षण तक चलता रहेगा। जब तक अनुभव की चेतना रहेगी, संवेदना की नदी बहती रहेगी, कुछ न कुछ तो बाहर आयेगा ही।