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Saturday 18 Nov 2017

भूमण्डलीकरण को व्याख्यायित करती हिंदी कविता

सुनील कुमार

शोधार्थी, हिन्दी विभाग

नेहू, शिलांग-793022

मो.-9863407478

सो वियत संघ का विघटन एक सामान्य घटना नहीं थी। इसको भूमण्डलीकरण और समकालीन हिन्दी कविता पुस्तक के लेखक  डॉ. श्यामबाबू शर्मा ने विश्व पटल पर पंूजीवादी और साम्यवादी व्यवस्था की टकराहट का परिणाम बताया है। साथ ही किस प्रकार पूंजीवाद का रूप परिवर्तित हो जाता है और वह भूमण्डलीकरण के नाम से जाना जाता है। लेखक ने पुस्तक में साहित्यिकता को तरजीह देते हुए जिस तरह से विश्व की अर्थनीति से गुजरते हुए भूमण्डलीकरण के परिणामों एवं पारितोषों को उजागर किया है वह अद्वितीय है। लेखक की पैनी नजर केवल कविता या हिन्दी साहित्य पर ही नहीं पड़ी बल्कि आपने सूक्ष्मातिसूक्ष्म तथ्यों को पाठक के सामने लाने का प्रयास किया है जो हिन्दी साहित्य में विरले साहित्यकारों के यहां देखने को मिलता है। भूमण्डलीकरण शब्द की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि इस शब्द से भ्रम पैदा होता है कि यह एक ऐसी व्यवस्था होगी जिसमें समस्त विश्व, समाज एक मंच पर आकर विश्व विकास में सहयोग करेंगे परंतु यह उसका पूर्ण रूप से उल्टा है। भूमण्डलीकरण ने विश्व को प्रभावित किया है। तब इससे साहित्य जगत कैसे अछूता रह सकता है। इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें लेखक ने किसी एक भाषा की कविता को नहीं लिया है या केवल हिन्दी कविता पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव की बात नहीं कही गई है। इसमें विश्व सााहित्य पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव की बात की गई है। पुस्तक के एक अंश में इसके प्रभाव पर आलोकपात करते हुए लिखा गया है- ‘‘पूंजीवाद के इस नये वैश्वीकृत रूप ने विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ वहां की संस्कृति समाज तथा नैतिक मान्यताओं को भी गंभीरता से प्रभावित किया है। पंूजी एवं राजसत्ता के गठजोड़ से एक नई आर्थिक संरचना विकसित हुई जिसमें राष्ट्र  के आर्थिक ढांचे को पूरे विश्व बाजार के लिए खोल दिया गया और पूरी दुनिया ग्लोबल विलेज का रूप लेती गई।......इसके प्रभाव से हमारे रीति-रिवाज, खान-पान, वेश-भूषा, तीज-त्योहारों, उत्सवों आदि की विशिष्टता क्षरित होने लगी। इससे अलग सांस्कृतिक पहचान समाप्त होने लगी तथा पूरी दुनिया एक रूप में दिखाई देने लगी है। अमीर-गरीब के बीच की खाई गहरी हुई है पटी नहीं।’’

                इस पुस्तक में लेखक ने साहित्य और समाज के अंतर्संबंधो की ओर भी स्पष्ट संकेत किया है। साहित्य पर समाजिक गतिविधियों का प्रभाव पड़ता है। इस पुस्तक में भूमण्डलीकरण के प्रभाव को विशेषकर साहित्य पर लेखक ने केन्द्र में रखा है। विश्व साहित्य के क्रम में हिन्दी साहित्य भी भूमण्डलीकरण से प्रभावित हुआ है। साहित्य की सभी विधाओं में इसे देखा जा सकता है। कविता, कहानी उपन्यास इससे मुख्य रूप से प्रभावित हुए हैं। मानवता पर जब-जब आक्रमण हुआ है कविता ने उसका मुक्त स्वर से विरोध किया है। यह कविता का प्राचीन इतिहास रहा है।

                लेखक ने इस पुस्तक में कवि के भूमण्डलीकरण से मुक्त होने की छटपटाहट एवं टीस को उद्घाटित किया है। कवि इस संकट के समय में आदमी की आदमीयत को बचाने के लिए प्रयत्नशील है और समाज को मुक्ति दिलाने के लिए प्रयासरत है। इस पुस्तक में कविता के माध्यम से भूमण्डलीकरण के दुष्परिणामों के प्रति, तीव्रतम विरोध का स्वर मुखर होकर सामने आया है। लेखक ने भूमण्डलीकरण के मानवता पर आक्रमण, बाजार पर एकाधिकार, अर्थनीति पर एकछत्र राज की राजनीति पर पाठक का ध्यान आकर्षित करने की सफल चेष्टा की है। कविता किस प्रकार जीवन से जुड़ी हुई है इस पर लेखक का तर्क है-‘‘ मनुष्यता पर जब-जब संकट आया है तब-तब संघर्ष तेज हुए हैं तथा जीवन को जब-जब संकुचित करने के प्रयास किये गये हैं तब-तब उसे व्यापक बनाने का उपक्रम कविता ने किया है। कविता अपने समय की समझ से पैदा होती है।’’ समकालीन कविता ने मानव जीवन की कमियों को सकारात्मक रूप में, समस्याओं से लड़ते-जूझते आम आदमी का खाका किस प्रकार खींंचा है इस पर कविताओं के माध्यम से विश्लेषण किया है। निराशा की जगह संघर्ष और पराजय के स्थान पर विद्रोह के भाव को दिखाया गया है।

पुस्तक के प्रथम अध्याय में भूमण्डलीकरण की परख और पहचान की बात की गई है जिसमें आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों पर भूमण्डलीकरण के प्रभावों को दिखाया गया है। इस अध्याय के प्रथम उपशीर्षक में भूमण्डलीकरण का सामान्य अर्थ, अर्थशास्त्रियों के विचार तथा भूमण्डलीकरण की परिभाषा एवं इसकी सामान्य विशेषताओं की चर्चा की गई है। द्वितीय उपशीर्षक में आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों पर भूमण्डलीकरण के प्रभावों का अन्वेषण किया गया है। विश्वायन के जनतंत्र और राजनीति को अपने लपेटे में लेने, लोक-जीवन, सांस्कृतिक मूल्यों तथा धार्मिक मान्यताओं-विश्वासों के क्षरण पर विचार किया गया है।

द्वितीय अध्याय में लेखक ने समकालीन कवियों का परिचय देते हुए उनके काव्य की सामान्य विशेषताओं को बताया है और साथ  ही यह भी दिखाया है कि कविता किस प्रकार समय के प्रभाव से प्रभावित होती है। यह अध्याय तीन भागों में विभक्त है। इसके प्रथम भाग में समकालीन हिन्दी कविता का परिचय दिया गया है जिसने भारतीय जन-जीवन को अत्यंत सकारात्मक रुप में, इसकी कमियों को उद्घाटित करते हुए अपने में उभारा है। दूसरे भाग में समकालीन हिन्दी कविता के प्रमुख कवियों का सामान्य परिचय दिया गया है तथा अंतिम भाग में समकालीन हिन्दी कविता की प्रमुख प्रवृत्तियों का रेखांकन किया गया है।

तीसरे सोपान में ‘समकालीन कविता में भूमण्डलीकरण’ पिछले डेढ़-दो सौ साल में भारतीय समाज का सामंतवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ  जो संघर्ष हुआ है, उससे जनता विकास एवं परिवर्तन की प्रक्रिया में जिस संक्रमण के दौर से गुजरी है, उससे भारतीय और हिन्दी साहित्य पर पडऩे वाले प्रभावों का रेखांकन किया गया है। विश्वायन के क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय भाषाओं पर पडऩे वाले प्रभाव, बड़े-बड़े पुरस्कारों में खेली जाने वाली कुत्सित राजनीति पर समाहित अध्ययन इस भाग में किया गया है। इस अध्याय के दूसरे भाग में विश्व के प्रमुख कवियों के हिन्दी साहित्य के कवियों पर पडऩे वाले प्रभाव को दिखाया गया है, और समाज के साथ पिछले वर्षों से चल रहे संघर्ष और उससे प्रभावित होते हुए साहित्य के बारे में बात की गई है।

भ्रष्टाचार, कुत्सित राजनीति, सामाजिक परिप्रेक्ष्य और शासन तंत्र की साजिशों को उद्घाटित करता चतुर्थ अध्याय अपने आप में बेजोड़ है। इस अध्याय में हिन्दी कविता के सामाजिक परिप्रेक्ष्य से लेकर सामाजिक चिंतन, उपभोक्तावादी मनोवृत्ति, बाजारवाद के कसते शिकंजे और कट्टरपंथियों को कठघरे में खड़ा किया गया है। यह अध्याय तीन भागों में बांटा गया है। प्रथम भाग में कविता के बदलते जनबोध को व्याख्यायित किया गया है। दूसरे भाग में विघटन की प्रक्रिया पर भी चिंता व्यक्त की गई है। अंतिम भाग सांप्रदायिकता के जहर से आगाह करती रचनाओं को लेकर है। कठमुल्लों और कट्टरपंथियों को बेनकाब करती हुई कविताओं का विश्लेषण किया गया है।

पांचवे अध्याय में संस्कृति, समाज व राष्ट्र के लिए भूमण्डलीकरण को घातक रूप में देखा गया है। चलते-चलते अंत में लेखक की पैनी नजर से वर्तमान समय के ज्वलंत मुद्दे स्त्री-विमर्श और दलित विमर्श की ओर भी इशारा किया है कि किस प्रकार भूमण्डलीकरण की चपेट से यह भी बच नहीं पाये हैं। इसमें लेखक ने  कविताओं के माध्यम से तरुण संस्कृति को समाज व राष्ट्र के लिए घातक बताया है। सांस्कृतिक मूल्यों में ह्रास, जातीय अस्मिता की अवधारणा में परिवर्तन, धार्मिक आस्था में बदलाव और उपभोक्तावादी मनोवृत्ति की स्वीकृति उपशीर्षकों के अन्र्तगत भगवत रावत, अष्टभुजा शुक्ल तथा लीलाधर मंडलोई आदि रचनाकारों की कविताओं का विश्लेषण कर किया गया है।

पुस्तक के अंतिम और महत्वपूर्ण भाग में लेखक ने भूमण्डलीकरण और समकालीन कविता के विमर्श के बदलते स्वरुप की चर्चा की है। इस अध्याय के प्रथम भाग में स्त्री-विमर्श के विविध संदर्भों को चार अवांतर भागों में वर्गीकृत कर कविताओं को वैश्विक स्त्री समाज के सापेक्ष रखकर जाँचा-परखा है। आधुनिकता की यूरोपीय परिभाषा ने स्त्री को जो बख्शीशें दी हैं उसके पीछे जो छलावा काम कर रहा है उस पर अध्ययन किया गया है। अध्याय का दूसरा भाग दलित-विमर्श को भूमण्डलीकरण के वर्तमान परिदृश्य में परखता है। आर्थिक समृद्धि का दम भरने वाले समाज में निचला वर्ग अवसरों से विमुख हुआ है। इस अध्याय में लेखक ने भूमण्डलीकरण के वर्तमान परिवेश में दलितों के लाभ-हानि का लेखा-जोखा कविताओं के विश्लेषण के माध्यम से प्रस्तुत किया है।

चूँकि समकालीन कविता विद्रूपताओं और विडम्बनाओं पर अपनी पैनी निगाह रखती है और भूमण्डलीकरण ने साहित्य को एकान्तिकता में बदल दिया है। आज पूरे विश्व समाज के एक साथ होने के बावजूद मनुष्य नितांत अकेला रह गया है। जब मनुष्य की संवेदनाएँ खोखली हो रही हैं, मानवीय रिश्तों की ऊष्मा ठंडी पडऩे लगी है तथा पँूजीवाद-उदारीकरण के दो पाटों  के बीच आमजन पिस रहा है, ऐसे में समकालीन हिंदी कविता समाज में एक नई उम्मीद, नई आस्था तथा नए विश्वास के साथ जिंदगी की, मनुष्यता की तस्वीर पेश करती है। संचार माध्यम वाली दुनिया ने मनुष्य को  समाज से काट दिया है। यह साहित्य के सामने गंभीर चुनौती है। इन चुनौतियों को हिन्दी के प्रमुख कवि विष्णु खरे, नरेश सक्सेना, भगवत रावत, चन्द्रकांत देवताले, लीलाधर जगूड़ी, लीलाधर मंडलोई, अशोक वाजपेयी, राजेश जोशी इत्यादि ने अपनी कविता के माध्यम से स्वीकार किया है। लेखक की स्पष्ट स्वीकारोक्ति है कि वैश्वीकरण की स्याह छाया से काव्य रचनाएं जिंदगी की, मनुष्य के भीतर बचे स्नेह, सौहाद्र्र तथा अपनेपन को सहेज लेने का प्रयास शिद्दत से करती हैं।