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Saturday 18 Nov 2017

रामखिलावन का रामराज्य

डॉ. विजयलक्ष्मी शास्त्री

शास. कालिदास म.वि.

प्रतापपुर, जि.सूरजपुर, छ.ग.

‘रामखिलावन का रामराज्य’ रवि श्रीवास्तव द्वारा रचि व्यंग्य संग्रह है। श्री श्रीवास्तव लेखन के विविध पक्षों से जुड़े हुए हैं। व्यंग्य रचना के अतिरिक्त उनके काव्य संग्रह भी समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। साथ ही वे पत्रकारिता से भी जुड़े हुए हैं।  आलोच्य संग्रह में तीस व्यंग्य रचनाएं सम्मिलित हैं। जिसमें से अधिकांश रचनाओं में भारतीय शासन तंत्र पर गहरा कटाक्ष किया गया है। हमारे देश में आजादी के बाद से अब तक तमाम विसंगतियां व्याप्त हैं। भ्रष्ट शासन व्यवस्था, अंधविश्वास, धार्मिक आडम्बर और रिश्वतखोरी के विरुद्ध लेखक सामान्य जनता को कुरेद-कुरेदकर जगाने की कोशिश करते हैं। आज का शासन तंत्र आदमी के अंदर की प्रतिभा को दरकिनार कर उसे दूसरी तरफ उलझने को विवश करता है। शनि की महादशा और बाजारवाद में लेखक ने, नेताओं द्वारा  किस प्रकार धार्मिक आडम्बर फैलाकर भोलीभाली जनता पर शासन किया जाता है, को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया है। धर्म के ठेकेदार सामान्यजन के बीच ईश्वर का भय दिखाते हैं और अंधविश्वास फैलाते हैं। सामान्य जनता प्रकोप के भय से उनके बताए रास्ते पर चलने लगती है और वह धार्मिक अंधविश्वास में उलझती चली जाती है। इसका लाभ व्यापारी वर्ग उठाता है। मंदिरों में भीड़ लगी रहती है। जिसका लाभ नेता उठाते हैं उन्हें तो वोट चाहिए। भोली-भाली जनता इसमें इतनी उलझ जाती है कि वह अपने विकास या कल्याण के विषय में सोच ही नहीं पाती है।

‘रामखिलावन का रामराज्य’ इस व्यंग्य संग्रह की प्रतिनिधि रचना है। रामखिलावन रामराज्य की कल्पना करता है किन्तु देश में महंगाई और भ्रष्टाचार इस कदर है कि यह सपना सपना ही रह जाता है। देश में यह कैसी व्यवस्था है कि यहां एक कृषक दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करता है किन्तु उसे उसका उचित मेहनताना भी नहीं मिल पाता है। कृषक की मेहनत और थकान की कीमत देश के नेताओं के स्वागत सत्कार और चाटुकारिता में उड़ाई जा रही है। महंगाई से कृषक को लाभ मिलना चाहिए किन्तु लाभ तो यहां के नेता प्राप्त कर रहे हैं। कृषकों को तो आत्महत्या करनी पड़ रही है। प्रस्तुत व्यंग्य रचना में दर्शाया गया है कि कैसे महंगाई का दुष्प्रभाव रामखिलावन के जीवन पर पड़ता है। वह सोचता है कि महंगाई का लाभ कृषक को मिलना चाहिए। किन्तु कृषक का जीवन इतना कठिन हो गया है कि वह आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर विवश हैं। आजादी के इतने वर्षों बाद भी हमारे देश की अर्थव्यवस्था कैसी है? उन्हीं लोगों का वर्चस्व है जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। रामखिलावन आवाज तो उठाना चाहता है किन्तु उसकी आवाज गले से बाहर नहीं आ पाती है। देश की कानून व्यवस्था की हालत भी जर्जर ही रही है। रामखिलावन राम राज्य की कल्पना तो करता है परन्तु ऐसी परिस्थितियों में कल्पना कल्पना ही रह जाती है।

‘पप्पू और पामेरियन’ व्यंग्य आलेख में लेखक पुलिस के गलत रवैयों और उनमें व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करते हैं। पुलिस के दोहरे आचरण को लेखक ने चुटीली भाषा में संकेत किया है। मिसेज पालीवाल का खूबसूरत पामेरियन गुम हो गया है। शहर के विभिन्न हिस्सों में उसकी तलाश की जाती है। गुमशुदगी की रिपोर्ट भी थाने में दर्ज हो चुकी है। उधर गरीब मजबूरों की बस्ती से पप्पू गायब हो गया है। लेकिन उसकी रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई गई है। पप्पू के पिताजी कोतवाली से डरते हैं। पामेरियन की खबर अखबारों में आ चुकी है। यह हमारे शासन व्यवस्था की विडम्बना है। इस भ्रष्ट शासन तंत्र में ईमानदार रहना भी संभव नहीं रह गया है। पप्पू ईमानदार था। एक प्रतिष्ठान में नौकरी इसलिए छोड़ी कि उसे चोरी का माल पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी जा रही थी। पालीवाल के व्यावसायिक प्रतिष्ठान में अवैध कारोबार का भंडाफोड़ हो चुका है। लेखक अत्यंत सहज ढंग से हमारे समाज एवं शासन व्यवस्था के इस नकारात्मक पक्ष को प्रस्तुत करते हैं। स्थितियों को वे वास्तविक रूप में देखते हैं। अतिश्योक्ति का प्रयोग नहीं करते हैं। स्वातन्त्र्योत्तर भारत की जनता तरह-तरह की समस्याओं से व्यथित है। अब संघर्ष का भी उस पर असर दिखाई नहीं देता। श्रीवास्तवजी का पात्र रामखिलावन तनाव सहते-सहते तनावमुक्त हो गया है।

आलोच्य लेखक रचनाएं अपनी सरलता सहजता के कारण आकर्षित करती हैं।