Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

महाकवि नज़रुल-इस्लाम: बग़ावत का बिगुल, संगीत का बुलबुल

डॉ. कृष्ण भावुक
कोठी नं. 201.।, गली नं.18.ज्ञ, गुरुनानक नगर, पटियाला-147003 (पंजाब)।
मो. 098151.65210
काज़ी नज़रुल-इस्लाम को कुछ समीक्षक बंगलाभाषी कवियों में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित गुरुवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद दूसरे स्थान या सम्मान का समुचित अधिकारी घोषित करते हैं। अन्य कुछ विद्वान उन्हें कवि से भी कहीं अधिक एक महान संगीतज्ञ मानते हैं। यह महाकवि मूलत: अपने आरम्भिक जीवन से ही संगीतकला पर मन-मस्तिष्क से न्यौछावर रहे हैं। अत: आलोचकों की सम्मति से सहज ही सहमत भी हुआ जा सकता है। एक तो नज़रुल ने उर्दू के महाकवियों की भांति किसी भी व्यक्ति को आजीवन ही अपना काव्य-गुरु धारण नहीं किया था; दूसरे, वे पराकोटि के स्वाभिमानी व्यक्ति और कलाकार थे। इसी दृष्टिबिन्दु से वे अपने किसी भी समकालीन शाइर से व्यंग्यपूर्वक उर्दू शाइर 'अकबरÓ इलाहाबादी के इस शेÓर  को भी सुना सकते थे:-तुम से उस्तादों में मेरी शाइरी बेकार है/ साथ सारंगी का बुलबुल के लिए दुश्वार है।1         
वैसे भी नज़रुल के जीवन में इनके बहुत कम समय तक जीवित रहने वाले ज्येष्ठ सुपुत्र का बड़ा हाथ रहा है, क्योंकि उसका भी नाम 'बुलबुलÓ ही था, जिसका जन्म कृष्ण नगर में हुआ था। उन दिनों राजनीतिक और साहित्यिक स्तर पर घोर दरिद्रता और निराशा में ग्रस्त नज़रुल के लिए वह बेटा अपने जन्म के साथ उनके मन में अपार आशा की रश्मियाँ लेकर इस धरती पर अवतरित हुआ था और उन्होंने अपने एक आरम्भिक कविता-गीत-संग्रह का नाम भी उसी के नाम पर रखा था। 'बुलबुलÓ संग्रह का प्रथम भाग सन् 1928 में और दूसरा भाग सन् 1952 में प्रकाशित हुआ था। उनकी एक कविता 'दारिद्रयÓ शीर्षक से भी उनकी लेखनी से प्रसूत हुई थी। नज़रुल ने अपने गांव में एक प्राइमरी स्कूल भी खोला था। उन्होंने अपनी बंगला भाषा में 'कम्युनिस्ट इण्टरनेशनलÓ का सर्वप्रथम अनुवाद किया था।
जीवन की प्रमुख घटनाएं और प्रसंग:
नज़रुल के जीवन में रचित उनकी कविताओं और गीतों में क्रान्ति-चेतना के साथ-साथ संगीतकला को उनकी अविस्मरणीय देन पर विचार आरम्भ करने से पहले पृष्ठपीठिका के रूप में उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं पर यहाँ प्रकाश-प्रक्षेपण किया जा रहा है:-
जन्म:  मुग़्ाल बादशाह शाह आलम का काल था। एक मुस्लिम परिवार हाजीपुर को छोड़कर बर्दवान जि़ले में आसनसोल के समीप चुरुलिया नामक ग्राम में आ कर बस गया था। यह गाँव ब्रिटिश शासन में बंगाल के बड़े राज्य के अन्तर्गत आता था, जोकि अब भारत के पश्चिमी बंगाल में स्थित है। नज़रुल के पूर्वजों में कभी किसी व्यक्ति को 'काज़ीÓ का पद प्रदान किया गया था, जिसका शाब्दिक अर्थ है -चिन्तक या विचारक। नज़रुल के वंश में प्राचीन काल से ही नाम से पूर्व 'काज़ीÓ पद-नाम जोडऩे की परम्परा चली आ रही थी। उनके पिता का नाम था काज़ी फ़कीर अहमद। वे एक स्थानीय मस्जिद के इमाम और संरक्षक के पद पर काम किया करते थे। नज़रुल का जन्म 24 मई सन् 1899 को मंगलवार के दिन हुआ था। जलज भादुड़ी ने अपनी अनूदित पुस्तक में उनके जन्म की यही तिथि दी है।2 नज़रुल की वालिदा (माता) का नाम ज़ाहिदा ख़ातून था। नज़रुल तीन भाइयों और एक बहिन में दूसरे नम्बर की सन्तान थे।
    गोपाल हालदार ने नज़रुल इस्लाम की जन्म-तिथि का दिन 25 मई दिया है और साल वही सन् 1899 ई.ही है। जब नज़रुल की अवस्था केवल लगभग 8 वर्ष की ही थी, तभी उनके पिता दिवंगत हो गए थे। घर में दरिद्रता इस सीमा तक छाई हुई थी, कि घर-परिवार के सभी लोग नज़रुल को 'दुक्खू मियाँÓ कहकर बुलाया करते थे। चूँकि उनकी माता जी एक तान्त्रिक साधु ख्यापा (या खेपा, जिसका शब्दिक अर्थ है 'देवी काली माता का भक्तÓ) से अपने लिए एक पुत्र के जन्म के लिए प्रार्थनाएं किया करती थी और उस इच्छा की पूर्ति होने के अनन्तर उसने अपने सर्वप्रथम सुपुत्र का नाम भी उसी तान्त्रिक साधु के नाम पर रख दिया था, किन्तु वह अधिक समय तक न चल पाया। अतिप्राकृतिक और आध्यात्मिक विचारों से अभिभूत होने की ओर नज़रुल की प्रवृत्ति सदैव बनी रही थी। उन्होंने चुरुलिया में विद्यमान मात्र एक ही मक्तब (पाठशाला) में मौलवी फज़़ल अह्मद से अरबी और फ़ारसी भाषा की आरम्भिक शिक्षा अच्छी प्रकार ग्रहण की थी। उसी पाठशाला में उन्होंने एक अध्यापक के रूप में भी कार्य किया था। एक कट्टर धार्मिक मुसलमान होने पर भी  अल्पावस्था में ही उन्होंने कुरान के अतिरिक्त बंगला भाषा में ही अनूदित रामायण, महाभारत, पुराण और हिन्दुओं के अन्य अनेक धार्मिक ग्रन्थों का गहन स्वाध्याय करके अपने राष्ट्रीय एकता और साम्प्रदायिक सद्भावना वाले विचारों के निदर्शन देने आरम्भ कर दिए थे। वे प्राय: निकटस्थ ग्रामों के साधुओंं, हाजी पहलवान जैसे फकीरों, सूफ़ी दर्शन से प्रभावित बाउल गायकों, विशेष रूप से स्वच्छन्दताप्रिय स्वभाव  वाले सूफियों और दरवेशों की संगति में विशेष रूप से आनन्दित और परम सन्तुष्ट रहा करते थे। चूँकि उनके गाँव में शिक्षा-प्राप्ति की कोई विशेष व्यवस्था न थी, इसलिए वे 'लीटो दलÓ जैसी नाटकीय टोलियों की ओर प्रवृत्त होने लगे थे, जोकि विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं पर प्रखर व्यंग्य करने वाली नौटंकियाँ प्रस्तुत किया करती थीं। ऐसा करके वे दल जनसाधारण में विशेष रूप से लोकप्रिय हुए जा रहे थे। अपने सामाजिक परिवेश के विरुद्ध विद्रोह के अंकुर उनके व्यक्तित्व में उसी समय से रोपे जाने लगे थे। इसी से वे लोक-गीतों और साहित्यकारों से भी अतिशय प्रभावित होने लग गए थे। उनके एक चाचा 'लीटो बैंडÓ के सदस्य थे। वही अपने साथ उन्हें भी उसी दल में ले गए थे और धीरे-धीरे वे एक दिन उस दल के मुखिया तक बन गए थे।
अपनी यायावरी प्रकृति के ही कारण वे वहाँ भी अधिक दिनों तक न टिक सके थे और रानीगंज  (बर्दवान) जाकर शीरशील गंज हाई स्कूल में 8 वीं कक्षा में प्रविष्ट हो गए थे। वहाँ के राजा ने कृपा करके इनकी नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था कर दी थी। वहाँ इनकी शिक्षा तो नि:शुल्क थी ही, इसके अतिरिक्त 'मुस्लिम होस्टलÓ में भोजन, वस्त्र आदि भी नि:शुल्क मिला करते थे। इस पर भी इन्हें 7 रुपये मासिक छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुआ करती थी। वहाँ वे अपनी कक्षा की परीक्षा में सर्वप्रथम भी आए थे। इसी छोटे नगर रानीगंज की ही एक अन्य पाठशाला में अपने सहपाठी और आगे चलकर बंगाल के सुप्रसिद्ध कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में स्थापित हुए श्री शैलजानन्द मुखोपाध्याय इनके साहित्यिक मित्र बने और आजीवन तक रहे। वहीं निबारनचन्द्र घटिक भी इनके घनिष्ठ मित्र बन गए थे। एक बार परीक्षा के किसी पत्र में अनुत्तीर्ण हो जाने के कारण वे आसनसोल ही लौट आए थे। वे बाद में माथुरन हाई स्कूल में स्थानान्तरित कर दिए गए, जहाँ वे  कवि श्री कुमुदरंजन मलिक के सुयोग्य निर्देशन में अध्ययन करते थे, किन्तु स्कूल की फ़ीस न दे पाने के ही कारण वहाँ शिक्षा ग्रहण करना छोड़ कर कवियालों के एक दल में जाकर सम्मिलित हो गए थे।
वहाँ से नज़रुल एक बड़े रेलवे जंक्शन और कोयला-खानों के केन्द्र माने जाने वाले नगर आसनसोल चले गए थे। आरम्भ में तो उन्होंने रेलवेगार्ड-क्वार्टरों में घरेलू कामकाज किया था, किन्तु तदनन्तर वे एक प्रशिक्षु का काम त्यागकर आसनसोल में ही अब्दुल वहीद की बेकरी और टी-स्टाल में मात्र एक रुपए मासिक वेतन पर डबलरोटियां सेंकने वाली नौकरी करने लग गए थे। यह और बात है कि अपने कामकाज से अवकाश पाकर वे संगीत की गोष्ठियों और महफि़लों में जाकर बांसुरी भी बजाकर अपनी संगीतकला का यथासम्भव प्रदर्शन करते रहते थे। वे प्रथम विश्वयुद्ध (सन् 1914-1918) के दिन थे। पुलिस के सब-इंस्पेक्टर रफीकुल्ला इनकी संगीतकला से प्रभावित होकर इन्हेंं तब के बंगलादेश में मैमनसिंह जि़ला के त्रिशाल में स्थित अपने गाँव लेकर चले गए थे। बर्तनिया शासन के शासक बंगाली लोगों को एक जुझारू जाति नहीं मानते थे और इसीलिए इन्हें आरम्भ में सेना में भर्ती के अयोग्य समझकर इन्हें भर्ती नहीं किया करते थे। यही देखकर नज़रुल 18 वर्ष की अवस्था में ही सन् 1917 में ही स्वतंत्रता संग्राम की सफलता के ही दृष्टिगत सैनिक शिक्षा प्राप्त करने लग गए थे, क्योंकि देशप्रेम के भाव तो आरम्भ से ही इनकी शिराओं में तरंगित हो रहे थे। सन् 1917 में स्कूल के अन्तिम वर्ष में इन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। फिर जाकर 'डबल कम्पनीÓ में अपना नाम लिखवा लिया था। वे 49 वीं बंगाल रेजीमेंट के साथ नौशेरा (उत्तरपश्चिमी सीमान्त) भेज दिए गए थे। वहां से वे करांची छावनी प्रस्थान कर गए थे। वहाँ वे इस रेजीमेंट के टूटने तक अर्थात् सन् 1917 से सन् 1919 तक रहे थे। वहाँ वे एक कार्पोरल के निम्न पद से उन्नति करते हुए भारतीय कमीशनप्राप्त अफ़सर के रूप में एक 'हवलदारÓ के उच्च पद तक जा पहुंचे थे। बर्तानवी सेना में सेवा करते हुए उन्होंने एक पत्रकार के रूप में भी अच्छा नाम कमा लिया था। इसके अतिरिक्त वे करांची की बैरकों में अपने सुशीलता, स्नेह, स्वच्छन्दताप्रिय स्वभाव और संगीतात्मक काव्य से अपने सहकर्मियों के मनों में प्राण फूँक दिया करते थे। एक पंजाबी मौलवी की सहायता से उन्होंने फारसी भाषा से सम्बद्ध अपने ज्ञान और समझ में पर्याप्त अभिवृद्धि कर ली थी। वहीं उन्होंने फारसी शाइर हाफि़ज़ की रुबाइयों का 'रुबाइयाते-हाफिज़Ó नाम से एक अनुवाद करना आरम्भ कर दिया था।  इनकी राजनीतिक व्यस्तताओं के कारण बड़ी देर से सन् 1930 ई. में ही जाकर इसे सम्पूर्ण कर के प्रकाशित करवा पाए।3 इनका दूसरा अनुवाद 'काब्यापाराÓ सन् 1933 में और तीसरा अनुवाद 'रुबाइयाते उमरख़ैयामÓ नाम से सन् 1959-60 में प्रकाशित हुआ था। अपनी भाषा में यदि वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर और शरत चन्द्र चटर्जी के साहित्य से अतिशय प्रभावित थे, तो फ़ारसी के कुछेक कवियों से भी अतिशय प्रभावित थे। उदाहरणत: टैगोर का स्वर्गवास 8 अगस्त सन् 1941 ई. में हुआ था। नज़रुल ने इनकी सुमधुर स्मृतियों को अपनी दो विशिष्ट कविताओं में शब्दबद्ध किया था, जिनमें एक का शीर्षक था 'राबीहाराÓ। यह आल इण्डिया रेडियो से प्रसारित भी हुई थी।
मई सन् 1919 में इनकी सर्वप्रथम गद्य-रचना 'बाउडीलीयर आत्मकथाÓ प्रकाशित हुई थी। इन शब्दों का अर्थ है 'आवारा की आत्मकथाÓ। इनकी सुप्रसिद्ध कविता 'मुक्तिÓ जुलाई सन् 1919 में 'बंगला मुसलमान साहित्य पत्रिकाÓ में प्रकाशित हुई थी। ऐसी कविताओं के ही कारण इन्हें रेजीमेंट में 'काज़ी नज़रुल कविÓ के नाम से ही जाना जाने लगा था। उस काल में अली अकबर ख़ां विशेष रूप से बाल-साहित्य के प्रकाशक के रूप में विशेष लब्धप्रतिष्ठ थे। वे एक दिन 'मुस्लिम भारतÓ समाचार-पत्र के कार्यालय में पधारे और उन्होंने नज़रुल को अपना परम मित्र बना लिया था। उन्होंने उनसे न केवल उनकी एक विशेष नज़्म 'लीची-चोरÓ  प्राप्त कर ली थी, अपितु वे अपने साथ उन्हें भी पूर्वी बंगाल के गाँव दौलतपुर (तिपेरा जि़ला, अब हैड ऑफिस कोमिल्ला) कांदीपाड़ लेकर चले गए। मार्च-अप्रैल सन् 1921 में जब उन्हें कांदीपाड़ में स्थित जिस भव्य निवासस्थल में ठहराया गया, उसके स्वामी थे श्री इन्द्रकुमार सेनगुप्त और गृहस्वामिनी थीं उनकी पत्नी बिराजसुन्दरी। चूँकि इन्द्र जी के सुपुत्र श्री वीरेन्द्र कुमार सेनगुप्त अली अकबर ख़ाँ के स्कूली समय के परम मित्र थे, इसीलिए उस घर में नज़रुल का आतिथ्य-सत्कार भी उनके मित्र के नाते ही किया जाता था। नज़रुल ने बिराजसुन्दरी की प्रौढ़ावस्था और उच्चपद के अनुसार उन्हें 'माँÓ शब्द से ही सम्बोधन करना आरम्भ कर दिया था। उनके ही सम्बन्धियों में उनकी एक बहिन गिरिबाला देवी भी थीं। उनकी इकलौती सुपुत्री प्रमिला थी, जिसका घरेलू नाम दूली या दोलन था। वह उस समय केवल 13 वर्ष की अवस्था की ही थी। अभी दो मास ही बीते थे कि नज़रुल के कुछेक मित्रों को अप्रत्याशित रूप से नज़रुल के विवाह का एक निमन्त्रण-पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें यह छपा था कि अली अकबर ख़ाँ की विधवा बहन की बेटी नर्गिस बेगम के साथ नज़रुल का विवाह आगामी 17 जून सन् 1921 को हो रहा है। नज़रुल को साधारणतया अधिकतर कवियों के ही समान शीघ्रताप्रिय स्वभाव और अधिकतर अप्रत्याशित कार्य सम्पन्न करने वाला व्यक्ति समझा जाता था। एक तो नर्गिस निपट देहाती और अशिक्षित युवती ही नहीं, अपितु सामाजिक कार्यों और तौर-तरीक़ों से एकदम अनजान थी; दूसरे, निकाह वाले दिन अली अकबर ख़ाँ साहिब ने उनकी रचनाएँ स्वयं रख लेने और निकाह के बाद नज़रुल के वहीं दौलतपुर में ही रहने जैसी कठिन शर्तें रख दीं। अत: नज़रुल ने नर्गिस के सम्बन्ध में अपनी कुछ प्रेम-प्रवृत्ति होने पर भी अतिशय स्वाभिमानी और अहंवादी स्वभाव के कारण उसके साथ निकाह करने और एक घर-जमाई बनकर वहीं रहने से एकदम इन्कार कर दिया। इसके बाद वे दौलतपुर से कौमिल्ला ही लौट आए थे।
श्री अशोक कुमार 'यमनÓ ने अपने वृहद् ग्रन्थ 'संगीत-रत्नावलीÓ में जो विचार व्यक्त किए हैं, वे इस प्रकार हैं - ये भारत में अंग्रेज़ी भाषा के कट्टर विरोधी थे। इसी कारण ये देश की स्वाधीनता के लिए सदा तत्पर रहते थे। अंग्रेज़ सरकार ने इनको 'सब-रजिस्ट्रारÓ के पद ('परÓ शब्द छूटा है) नियुक्त करना चाहा, लेकिन इन्होंने उसका बहिष्कार कर दिया और 'धूमकेतुÓ नामक पत्रिका के साथ जुड़ गए। तदनन्तर वे और भी तीव्र गति से विद्रोही रचनाओं का प्रणयन करने लगे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेज़ सरकार ने सन् 1923 में उनको गिरफ़्तार कर लिया और एक वर्ष श्रम-कारावास के लिए जेल भेज दिया। जेल से निकलने के बाद ये कृष्ण नगर नामक स्थान पर चले गए।4
इनकी अनेक कविताओं और गीतों का संकेत स्पष्ट रूप में नर्गिस बेगम की ओर हुआ करता था। इसके बाद नज़रुल कौमिल्ला में सेनगुप्त-परिवार की छत्रछाया में सन् 1921 में 18 जून से 6 जुुलाई लगभग तीन सप्ताह तक रहे थे। इस प्रकार सेनगुप्त-परिवार के साथ अपने निकटस्थ सम्बन्धों का ही रेखांकन वे अपनी नज़्म 'रेशमी डोरÓ में इस प्रकार से करते हैं:-तोरा कोथा होते केमने एशे मनीमालार मतो, आमार कण्ठे जड़ा ली।-अर्थात् तुम लोग कहां से आए हो और तुम लोग कैसे मेेरे गले से मणिमाला की तरह से लिपट गए हो? इसी प्रकार 'स्नेहातुरÓ कविता भी उसी घर के पारिवारिक जनों के प्रति एक प्रकार से स्नेहांजलि कही जा सकती है। इस प्रकार यद्यपि नज़रुल ने अपने मस्तिष्कीय शून्य को भरने का यथाशक्ति कार्य किया था, तथापि घोर निराशा और टूटन का वातावरण ही इनकी असंख्य कविताओं का वण्र्य विषय या प्रतिपाद्य रहा था। केवल अपवादस्वरूप इनकी एक कविता 'पलकÓ अवश्य देखी जा सकती है, जिसमें निराशावाद की अपेक्षा आशावाद का ही स्वर उभरता है। सामाजिक सुधारों से सम्बद्ध एक संस्था 'ब्रह्म समाजÓ से जुड़ी हुई एक हिन्दू युवती पूर्वकथित युवती प्रमिला से प्रेम हो जाने पर उसके साथ नज़रुल ने 24 अप्रैल सन् 1925 में विवाह कर लिया था। इससे वह और नज़रुल दोनों ही संस्था के कोप का भाजन बन गए थे, क्योंकि वह संस्था इसे अपने धार्मिक-सामाजिक नियमों का घोर विरोध समझती थी।
काव्य में विद्रोह-भाव:
किसी अफ्रीकी कवि ने कभी लिखा था कि काव्य तो सदैव क्रोध या रोष की ही उपज हुआ करता है। यह कथन यद्यपि किसी सीमा तक विवादास्पद हो सकता है, तथापि नज़रुल के काव्य पर लगभग चरितार्थ किया जा सकता है। इनके प्रकाशित नाटकों के नाम हैं:-1. चाशार शौंग 2. शौकुनी बोध 3. राजा युधीष्ठीर 4. दाता कोर्ना 5. अकबर बादशाह 6. कोबी कालिदास 7. बिद्यान होतुम (अर्थात् विद्वान् उल्लू) इत्यादि। इनके अतिरिक्त इनके ये नाटक भी विशेष प्रख्यात हुए थे:-1. आले आ (सन् 1925, 1931) 2. मधुमाला (1959-60) 3. झली मली (1930)। इनका गीत 'भंगार गानÓ इसी सन्दर्भ में विशेषकर ध्यातव्य है। इसमें इनका यही युयुत्सु और जुझारू तेवर रेखांकित हुआ है। वे कहते हैं कि:-कारार ओई लौह कपाट, भेंगे फेल कार-रे लोपाट, रक्त जामात सिकाल पूजार पाषाण-वेदी।- भावार्थ यह है कि इस बंदीख़ाने के लोहे के द्वारों को तोड़ डालो, रक्त से स्नात पत्थर की वेदी को पाश-पाश कर दो, जोकि मात्र बेडिय़ों के देवता की पूजा के लक्ष्य से ही खड़ी की गई है।5
 उस कविता की यह पंक्ति विशेष रूप से जनता को कण्ठस्थ हो चुकी थी:-बॉलो, वीर,  बॉलो ! उन्नत मम शीर,,,,6- अर्थात्  बोलो, ओ वीर बोलो कि मेरा सिर उन्नत है!
श्री वारीन्द्र कुमार घोष ने अपने सम्पादकत्व में प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका 'बिजलीÓ में महाकवि नज़रुल से सम्पर्क स्थापित करके उनकी इसी कविता को प्रकाशित कर दिया था। जनसाधारण ने इस कविता को महात्मा गांधी जी के असहयोग आन्दोलन से जोड़ कर देखा और पत्रिका के उस अंक को पाठकों आदि की प्रबल माँग की पूर्ति-हेतु पुन: प्रकाशित करना पड़ा था। जब नज़रुल ने गुरुवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के सामने उपस्थित होकर स्वयं इस कविता का पूरा पाठ किया, तब उन्होंने उनके भावी काल के प्रति उन्हें हार्दिक आशीर्वाद दिया, जिससे वे रातोंरात जनता में और भी अधिक प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय हो गए थे।
सन् 1922 में नज़रुल ने साप्ताहिक पत्रिका 'धूमकेतुÓ का प्रकाशन करना प्रारम्भ कर दिया था। इससे पत्रिका निकालने की उनकी एक पुरानी इच्छा की पूर्ति हो गई थी। पत्रिका का प्रवेशांक 12 अगस्त सन् 1922 को सर्वश्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शरतचन्द्र चटर्जी, वारीन्द्रकुमार घोष इत्यादि सम्मान्य विभूतियों की शुभकामनाओं के साथ प्रकाशित हुआ था। इसकी ये पंक्तियाँ विशेष रूप से उल्लेख्य थीं:-जागिये दे रे चमक मेरे, आछे जारा अद्र्ध-चेतन!Ó-अर्थात् जो जन अब भी अद्र्धचेतन या आधे जागे हुए हैं, उनको चमक मारते हुए जगाओ!
नज़रुल रूस की क्रान्ति और रूसो के सिद्धान्त स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्व से अत्यधिक प्रभावित थे। 16 जनवरी सन् 1923 ई में उनकी कैद के ही कारण 'धूमकेतुÓ का प्रकाशन बन्द कर देना पड़ा था। 'धूमकेतुÓ नाम से ही उनके एक निबन्ध-संकलन का प्रकाशन सन् 1961 में हुआ था। इससे पूर्व जब नज़रुल ने 'नौजूगÓ (नवयुग) नाम से भी एक पत्रिका निकाली थी, तब तक वे अपनी क्रान्तिकारी पत्रकारिता के कारण बंगाल की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया बन चुके थे। यौवन में ही वे इस राजनीतिक दल के एक अग्रणी मुज़फ्फ़ऱ आमेद से अपना सम्पर्क स्थापित कर चुके थे। सन् 1922 में भी उन्होंने 'जूग बानीÓ (युगवाणी) नाम से एक पत्रिका प्रकाशित करनी प्रारम्भ कर दी थी। उनकी व्यापक लोकप्रियता का एक प्रमाण यह भी है कि हिन्दी भाषा और काव्य के प्रमुख और लोकप्रिय महाकवि श्री सुमित्रानन्दन पन्त जी ने भी अपने एक कविता-संग्रह का यही नाम 'युग-वाणीÓ रखा था। बर्तानिया सरकार उनकी ऐसी ही क्रान्तिकारी गतिविधियों और रचनाओं से अतिशय कुपित थी और इन्हें बार-बार जेलों में भेजती रहती थी। जनवरी सन् 1923 में 40 दिनों तक जेल में उन्होंने भूख-हड़ताल तक की थी। जब सम्मान्य टैगोर ने इन्हें स्वयं एक पत्र लिख कर अनशन का त्याग करने के लिए प्रार्थना की, तब भी वे न माने, किन्तु एक दिन जेल में अपनी पूज्य माता जी के आकर उपस्थित हो जाने पर ही उन्होंने अपना वह अनशन समाप्त किया था। एक बार तो नेताजी श्री सुभाषचन्द्र बोस ने भी जेल में ही बैठकर उनके क्रान्तिकारी भावों की प्रशंसा करते हुए ये शब्द कहे थे, हम जैसे इंसान, जो संगीत से दूर भागते हैं, हमारे अन्दर तक भी एक ज़बरदस्त जोश जाग रहा है कि हम भी नज़रुल की तरह गीत गाने लग जाएंगे। अब आगे से हम लोग 'मार्च-पास्टÓ के वक़्त ऐसे ही गीत गाया करेंगे। इनके गीत सुनने और गाने से तो हमें यह कैद भी कैद मह्सूस नहीं होती है।8
15 दिसम्बर सन् 1923 को जेल की 11 मास की कैद समाप्त करके ये बाहर आए थे। उन्होंने वहाँ जेल में रहकर असंख्य गीतों और कविताओं की रचना की थी। उदाहरणत: 'सुपेर बन्दनाÓ ('सुपेर अर्थात् 'सुपरिंटेंडेंट की प्रार्थनाÓ) इनकी एक व्यंग्यपरक कविता थी।  
इनका जो दूसरा गीत जनसामान्य को उन दिनों कण्ठस्थ हो चुका था, वह इन पंक्तियों से प्रारम्भ होता था, एई शिकलपोरा छल आमादेर शिक-पोरा छल।- इस पंक्तिा भावार्थ यह था कि जो बेडिय़ाँ हमने पहनी हैं, वे तो मात्र एक छल और दिखावा भर ही हैं, क्योंकि वास्तव में इन्हें धारण करके तो हम निर्दयियों को एक कठिनता में ही डाल देंगे।9
12 अगस्त सन् 1922 से स्वयं प्रारम्भ की गई पत्रिका 'धूमकेतुÓ में नज़रुल ने अपने लिखित सम्पादकीयों में जो विभिन्न टिप्पणियाँ लिखी थीं, वही आगे चलकर इनके कविता-संग्रहों यथा 'अग्निबीनाÓ (सन् 1922), निबन्ध-संकलनों यथा दुर्दिनेर जात्रीÓ (1938) और 'रुद्र मंगलÓ संग्रहों में भी संकलित हुई थीं। इसी पत्रिका की अन्य रचनाएँ भी इन्हीं के 'वशीर बंसीÓ और 'भंगारनÓ में भी सम्मिलित हुई थीं। उसके बाद सरकार ने इन रचनाओं को अवैध घोषित कर दिया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद तो वे साहित्य और संगीत के साथ पूरी तरह से जुड़ गए थे। यद्यपि दूसरी ओर, इनकी आर्थिक दशा बहुत हीन चल रही थी, तथापि स्वातन्त्र्र्य संघर्ष की गतिविधियों में रंच मात्र कमी नहीं आने पाई थी। सन् 1924 ई. में सारा बंगाल एक ओर महात्मा गांधी जी के असहयोग आन्दोलन के पृष्ठपोषण में व्यस्त था; दूसरी ओर, नज़रुल के राजनीतिक गीत और कविताएँ अतिशय लोकप्रिय हुई जा रही थीं। उदाहरणत: उनके 'मरन मरनÓ गीत की प्रथम पंक्ति ही अवलोकनीय है:-एशो एशो ओगो मरन !-अर्थात् आओ, तुम मृत्यु, आओ! वास्तव में ऐसा कहकर वे जनता को देश की स्वाधीनता की शीघ्र प्राप्ति हेतु प्रेरित ही कर रहे थे। इसके बाद भी लिखी कुछेक रचनाओं में इनके निजी जीवन के प्रतिबिम्ब देखे जा सकते हैं। यथा वे 'दुपहिर अभिसारÓ रचना में कहते हैं -जाश कोथा शोई एकेला ओ तुई अलस बैसाखे?10- अरी मेरी प्रिया! तू कहां जा रही है अकेली ही इस अलसाए बैसाख में?
लखनऊ पैक्ट में कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों राजनीतिक दलों की कृत्रिम राजनीतिक और राष्ट्रीय एकता पर व्यंग्य करते हुए उन्होंने तब एक गीत लिखा था 'बदना गाडूर पैक्टÓÓ। इसमें वे कहना चाहते थे कि खि़लाफत आन्दोलन के कारण से हिन्दुओं और मुसल्मानों की एकता केवल दो दिनों की चांदनी की तरह से स्थायी न होकर केवल एक सामयिक चेष्टा भर ही है। उन्होंनेे 40 कोटि भारतीयों को चेतावनी देते हुए स्पष्ट रूप में यह लिखा था कि, चालीस कोटि मनुष्य हम भारतवासी भिन्न-भिन्न बने, ढाओं ढाओं बसे पराधीन खो दी आज़ादी।- अर्थात् हम भारतीय जन 40 करोड़ की संख्या में हैं, किन्तु हम सभी जन भिन्न-भिन्न स्थानों पर निवास करते हैं और अलग-अलग मत रखते हैं। इसी के कारण ग़्ाुलाम भी हैं और फलस्वरूप हमने अपनी स्वतन्त्रता गँवा डाली है।    इसी प्रकार वे सभी प्रकार के दंगों-फ़सादों का समाधान बताते हुए अपने देश के निवासियों को यह उपदेश भी करते थे, कि फिर एक बार हम संगठित होवें, जाति, धर्म, भेद-भाव भुला देवें, तो शान्ति,साम्य,अन्न,वस्त्र,पुण्य सभी कुछ पावें।11-अर्थात् हम सभी को एक बार पुन: परस्पर संगठित हो जाना चाहिए। जातियों, धर्मों और धार्मिक मतभेदों को भुला दें और शान्ति-सुखचैन के साथ इस प्रकार से हम सब समानताओं, अन्न, वस्त्र आदि फिर से प्राप्त कर सकते हैं।
नज़रुल ने अपने चारों बेटों के ये जो नाम रखे थे, वे उनकी राष्ट्रीय एकता और धार्मिक सद्भावना के ही अकाट्य प्रमाण माने जाएँगे-1. कृष्ण मुहम्मद 2. अरिन्दम  ('अरिन्दमÓ शब्द का संस्कृत भाषा में अर्थ है शत्रु को विजय करने वाला) 3 . सव्यसाची (संस्कृत भाषा में अर्थ है अर्जुन)। 4. अनिरुद्ध (संस्कृत भाषा में अर्थ है भगवान् श्रीकृष्ण का पोता और उषा का पति)।
वे हिमालय पर्वत को निर्दय और क्रूर अंग्रेज़ शासकों का प्रतीक बनाते हुए यह लिखकर अपनी जवांमर्दी और दिलेरी का ही प्रमाण देते हैं:-बोल वीर क्रान्त सिर शिखर हिमाद्रि ने किया नत अपना देख उन्नत मेरा सिर?12-अर्थात् ऐ वीर! अपने सिर को ऊँचा कर और बता मुझे कि हिमालय की चोटियों ने भी क्या अपना उच्च सिर आज तक कभी भी झुकाया है ? कहने का आशय यही है कि कभी भी नहीं झुकाया है। अत: तुम वीरों को भी अपना उन्नत सिर कदापि नहीं झुकाना चाहिए।
नज़रुल की परवत्र्ती कविताओं में विवाह वाली पुरानी दुर्घटना की प्रतिध्वनियाँ बार-बार सुनी जाती रही हैं। आगे चलकर भी नर्गिस बेगम उनसे सम्पर्क स्थापित करने की असफल चेष्टाएं करती रही, किन्तु उन्होंने उसके अन्तिम पत्र का अस्वीकारात्मक उत्तर दे डाला था। इसके साथ ही 1 जुलाई सन् 1937 की ही तिथि को एचएमवी कम्पनी के रिकार्ड के लिए जिस गीत की विशेष रूप से रचना की थी, उसकी सर्वप्रथम पंक्ति में ही उनके विगत प्रेम का निजी संस्पर्श अवलोकनीय था-जार हाथ दिये माला, दिते पारो नाईं/कैनी मने राखा तारे? भूले जाओ तारे, भूले जाओ, एकेबारे!13 -अर्थात् जिसके हाथ में माला देकर भी तुम दे न सके थे, उसे क्यों याद रखते हो उसको भूल जाओ, भूल जाओ एकदम !
कोमिल्ला में निवास करते हुए नज़रुल ने महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन से उत्थापित एवं प्रेरित होकर असंख्य कविताओं और गीतों की रचना करके अतिशय लोकप्रियता प्राप्त कर ली थी। उन्होंने गांधी जी का अभिनन्दन इन शब्दों के द्वारा किया था-ऽए कोन पागल पथिक छोटे एलो बंदिनी मार आंगिनाये। त्रीस कोटि भाई मरण हरण गान गेये तार संगे जाए।14-अर्थात् पराधीन माता के आंगन में भला यह कौन पगला पथिक दौड़ता ही चला जा रहा है ? उसके पीछे उसी के तीस करोड़ भाई भी उसके साथ ही मौत को चुनौती देते हुए गीत गाते हुए चले जा रहे हैं !
नज़रुल गांधी जी के असहयोग आन्दोलन में 'स्वराजÓ  के मत से पूर्णत: सहमत न थे, क्योंकि वे उसके स्थान पर प्राचीन नियमों और सिद्धान्तों की ही शिक्षा देने को वरीयता प्रदान करते थे। इसी सन्दर्भ में उनका यह वक्तव्य विशेषत: द्रष्टव्य है, 'राजबन्दीर जबानबन्दीÓÓ का लक्ष्य स्पष्ट है। गांधी जी जिसे 'दुष्ट सरकारÓ कहते थे, उस सरकार की और अधिक वैध और सामूहिक उपकरणों से खुली भत्र्सना करना ही आज उद्दिष्ट है। एक कवि मूलत: ईश्वर की एक ऐसी चुनी हुई आवाज़ हुआ करता है, जो सदैव यथार्थ और सत्य बात का ही पृष्ठपोषण किया करती है। वह ईश्वर और न्याय का पक्ष-ग्रहण करती है और सभी घृण्य वस्तुओं को नष्ट-भ्रष्ट करने का एक उपकरण या साधन है। उर्दू के शाइर फ़ैज़ अह्मद 'फ़ैज़Ó ने भी जेल की कैद काटते हुए विदेशी शासन के विरुद्ध ज़बानबन्दी की आपत्ति करते हुए कहा था-1. ''मताए लौहो-क़लम छिन गई, तो क्या ग़म है/कि ख़ूने-दिल में डुबो ली हैं उँगलियाँ मैंने/ज़बाँ पर मुह्र लगी है तो क्या, कि रख दी है/हरेक हल्क ए ज़ंजीर में ज़बाँ मैंने।15
इससे आगे भी वे आध्यात्मिक, दैवी और अतिप्राकृतिक शक्ति में अपनी आस्था ज्ञापित करते हुए कहते थे कि, मुझे स्पष्ट रूप में यह पता चल गया है कि मैं सांसारिक विद्रोह करने के लिए ही उस ईश्वर का पठाया हुआ एक लाल सैनिक हूँ। सत्य की रक्षा और न्याय की प्राप्ति के हेतु मैं एक सैनिक भर हूँ। उस दिव्य परम शक्ति ने मुझे बंगाल की इस हरी-भरी धरती पर, जोकि आजकल किसी वशीकरण से अभिभूत है, भेजा है। मैं तो मात्र एक साधारण-सा सैनिक भर ही हूँ और उसी ईश्वर के सभी निर्देशों की पूत्र्ति करने के लिए मैंने कुछ यथासम्भव चेष्टा ही की है।16
अग्रलिखित तीन राष्ट्रीय गीतों में भी नज़रुल के क्रान्तिकारी और विद्रोही विचारों को रेखांकित देखा जा सकता है।
1.दुर्गम गिरि कान्तार मरु दुस्तर पारावार,
लांघिते हॉबे रात्रि निशीथे, यात्रिरा हुँशियार।17
-अर्थात् दुर्गम पर्वत, विकट मरुस्थल और सागर फैले हुए हैं। रात के गहरे अन्धकार में उन्हें फिर से पार करना होगा, यात्रियो, सावधान !
2. नज़रुल ने एक छात्र-सम्मेलन का उद्घाटन करते समय एक कोरस-गीत का भी नेतृत्व किया था। उन्होंने उस प्रयाण-गीत को स्वयं भी गाया था, जिसकी आरम्भिक पंक्ति बहुत ही प्रेरक थी -आमरा शक्ति आमरा बल, आमरा छात्र-दल !-अर्थात् छात्रों का समूह ही हमारी पूरी शक्ति या बल है। एक अन्य युवकों के समूह गान में और भी अधिक उत्तेजना के स्वर प्रयाण-गीत के अन्तर्गत माने गए थे-चल, चल, चल ! ऊध्र्व गगने बाजे मादल, निम्ने उत्तला धरणि-तल, अरुण प्रान्तेर तरुण-दल, चल रे, चल, चल!18
एक अन्य सामूहिक प्रयाण-गीत की शैली में ही रचा गया था- चल, चल रे, ऊध्र्वे गगने बाजे मादल, निम्ने धरनी तल, अरुन प्रान्तेर तरुन दल! चल रे, चल रे, चल !19-अर्थात् चलो, चलो, आकाश पर ढोल बज रहे हैं, नीचे धरती कम्पायमान हो रही है। समय उषा काल के युवको! आगे, आगे और आगे बढ़ो! नज़रुल ने नवनिर्मित बंगला देश के लिए जो राष्ट्रीय गीत रचा था, वह अब 'चल, चल, चल नाम से ही विश्वजनीन हो चुका है।
संगीत में प्रवीणता:
नज़रुल प्रारम्भिक काल से ही काव्य से कहीं अधिक संगीतकला की ओर प्रवृत्त थे और उनकी इस रुचि को उनके ग्राम के शास्त्रीय संगीत के प्रकाण्ड विद्वान शितीशचन्द्र कांजीलाल ने विशेष रूप से और भी अधिक पुष्पित-पल्लवित किया था। इनको हारमोनियम, ढोलक और तबला बजाने में विशेष महारत थी। वे स्वयं इन वाद्य-यन्त्रों का वादन करते हुए साथ ही गान भी किया करते थे। उन्होंने लगभग 4 हज़ार गीतों की रचना की थी। श्री अशोक कुमार 'यमनÓ ने अपने संगीत-विषयक बृहद् ग्रन्थ में उनके सम्बन्ध में ये विचार व्यक्त किए हैं, -एक 'छन्दसीÓ नामक गीतिनाट्य में इन्होंने संस्कृत के दस छन्दों का प्रयोग किया है। इन्होंने लगभग पांच सौ गीत प्रेम-सम्बन्धी एवं पांच सौ गीत आकाशवाणी के लिए बनाए हैं। इनकी इस प्रकार की रचनाएँ 'नव राग मालिकाÓ के अन्तर्गत प्रकाशित होती रहती थीं। नज़रुल ने अनेक नवीन रागों की भी रचना की थी। इनके द्वारा निर्मित मुख्य राग इस प्रकार हैं- उदासी भैरव, रुद्र भैरव, आशा भैरव, शिवानी भैरव, अरुण रंजनी, योगिनी, देवयानी चांपा, संध्या मालती, वनकुन्तला, शंकरी, मीनाक्षी, रूपमंजरी, निर्झणी (कदाचित् शुद्ध नाम निर्झरिणीÓ होगा), शिव सरस्वती तथा रक्तहंस सारंग आदि।20
हिन्दी और उर्दू काव्य दोनों ही के सर्वप्रथम सशक्त कवि अमीर खुसरो की ही भाँति नज़रुल ने भी रागों की ही तरह से नई तालों का भी आविष्कार किया था। उदाहरणत: उनका आविष्कृत 'नौनन्दÓ ताल बीस मात्राओं का है और 'प्रियाछन्दÓ नामक ताल सात मात्राओं का। मूलत: उन्होंने केवल उन्हीं रागों का प्रयोग करने को प्राथमिकता दी थी, जोकि बंगला भाषा और उसके संगीत, भावों और अनुभूतियों के ही सर्वथा अनुकूल बैठती थी और सहायक भी हो सकती थी। उन्होंने विशेषकर लोकसंगीत, शास्त्रीय संगीत और विदेशी, विशेषत: अरबी संगीत को ही अपनी रचनाओं में एक विशेष दर्जा प्रदान किया था। कहा जाता है, कि सन् 1930 से लेकर सन् 1940 के मध्य में वे प्रतिदिन कम-से-कम एक दर्जन नए गीतों की रचना किया करते थे। उन्होंने लगभग कुल 4000 गीत रचे थे, जिनमें से आज केवल आधे के लगभग ही प्राप्त हैं। शेष गीत परिश्रमी शोध-कत्र्ताओं की बाट जोह रहे हैं। आशा है कि इस उच्च कोटि के कवि और संगीतकार की विभिन्न सेवाओं को संसार के काव्य और संगीत के प्रेमियों के सामने उद्घाटित करने के लक्ष्य से शीघ्र ही नियमपूर्वक सीमाबद्ध कार्य की कोई व्यवस्था की जाएगी, जोकि आज के समय की एक ज्वलन्त माँग है।
नज़रुल के गीत बाउल, झूमर और सन्थाली जैसे लोकगीतों पर ही आधारित हैं या फिर सपेरों, भठियाली और भाउआ की तरह लोकगीतों का आधार लिए हुए हैं। इनकी धुनों के अतिरिक्त वे सभी काव्यात्मक सौन्दर्य के साथ-साथ उच्च कोटि की संगीतात्मकता से भी ओतप्रोत मिलते हैं। कुछेक वर्ष पूर्व अज़हरुद्दीन ने ही सबसे  पहले लगभग 16 -17 सौ गीतों की एक प्रशंसनीय और प्रामाणिक सूची तैयार की थी। नज़रुल ने ही बंगला काव्य में सबसे पहले काव्य की 'गज़़लÓ नामक विधा का प्रयोग करके परवत्र्ती कवियों का पथ-प्रदर्शन किया था। इनकी आत्मकथा 'बांडुलेयर आत्मकाहिनीÓ नाम से जुलाई सन् 1919 में ही 'बंगला मुस्लिम साहित्य पत्रिकाÓ में प्रकाशित हो चुकी थी। इसी प्रकार इनकी कविताओं का सर्वप्रथम संग्रह 'बोधानÓ नाम से छपा था। इनका उपन्यास 'बन्धनहाराÓ सन् 1920 में प्रकाशित होकर लोकप्रिय हुआ था। राष्ट्रभाषा परिषद् (वर्धा) ने गोपाल हालदार द्वारा सम्पादित और संकलित पुस्तक में नज़रुल के जीवन की  प्रमुख घटनाओं के साथ उनकी दस प्रमुख कविताओं और गीतों को भी हिन्दी के अनुवाद के साथ प्रकाशित कराया था।
सन् 1932-35 के मध्य उनके लगभग 800 गीतों के दस संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। जिनमें 600 से अधिक तो शास्त्रीय रागों पर ही आधारित थे और इनमें भी लोकसंगीत से सम्बद्ध कीर्तनों की धुनों पर आश्रित थे और लगभग 30 राष्ट्रीय चेतना से आपूरित गीत थे। इसके अतिरिक्त नज़रुल ने गुरुवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मूल बंगला उपन्यास 'गोराÓ पर आधारित एक चलचित्र में एक संगीत-निर्देशक के रूप में भी कार्य सम्पन्न किया था। उन्हीं की भाँति इनकी भी एक कविता का शीर्षक 'विजयिनीÓ ही था, जिससे इनके साहित्य का इनके काव्य पर विशेष प्रभाव ही प्रमाणित होता है। इसी प्रकार सचिन सेनगुप्ता के नाटक 'सिराजुद्दौलाÓ में इन्होंने न केवल अपने गीत ही दिए थे, प्रत्युत उसे अपनी उच्च कोटि के संगीत से भी नवाज़ा था। सन् 1938 ई. में वे कोलकाता रेडियो स्टेशन में संगीत से सम्बद्ध समस्त कार्यक्रमों के स्पृहणीय पद पर नियुक्त कर दिए गए थे। उन्होंने वहां भी संगीतकला की ही नींव पर जो अनेक डॉक्यूमेंटरियां सम्पूर्ण करके प्रसारित की थीं, उनमें कुछेक उल्लेख्य ये हैं:-1. 'हारामोनीÓ और 2. 'नवराग मल्लिकाÓ। इसके अतिरिक्त वे राग भैरव से विशेषत: प्रेरित और प्रभावित होकर असंख्य गीतों की रचना करते रहते थे। ये इनके संगीतज्ञ व्यक्तित्व का एक विशेष ध्यातव्य जमाबिन्दु कहा जा सकता है।
इनके गीतों को जिन लब्धप्रतिष्ठ गायकों ने अपने सुमधुर स्वरों से अतिशय लोकप्रियता के सोपानों पर पहुँचा दिया था, उनमें ये नाम विशेषत: उल्लेखनीय हैं:-फ़ीरोज़ा बेगम, सुपर्वा सरकार, अंगुरबाला, इन्दुबाला, अंजलि मुकर्जी, ज्ञानेन्द्रप्रसाद मुकर्जी, नीलोफऱ यासमीन, मानबेन्द्र मुकर्जी, कनिका मजूमदार, दिपाली नाग, सुकुमार मित्रा, महेन्द्र मित्रा, धीरेन बासु, पुर्बी दत्ता, फिऱदौस आरा, शाहीन समद, सुस्मिता गोस्वामी इत्यादि। इनके जिन सुयोग्य शिष्यों के लिए एचएमवी संगीत-कम्पनी ने रिकार्ड तैयार किए थे, उनमें ये कतिपय नाम उल्लेख्य रहे हैं:-सर्वश्री एस डी बर्मन (चलचित्रों के प्रख्यात संगीत-निर्देशक), जोथिका रॉय, सुपर्वा सरकार, के मलिक, गीता बासु, सीता चौधरी इत्यादि। इनकी कहानियों के कुछ संग्रह ये हैं:-1. ब्यथार दान (सन् 1922,1992) 2. रिक्तेर बेदना (1925) 3. श्यूलीमाला (1931) इत्यादि।     नज़रुल को कोलकाता विश्वविद्यालय ने स्पृहणीय और विरल 'जगतारिणी पुरस्कारÓ दे कर भी सम्मानित किया था। भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मभूषणÓ के सम्मान से उन्नतशिर किया था। 'रवीन्द्र भारतीÓ नामक स्तरीय संस्था ने भी इन्हें 'डीलिट्Ó की सम्मानार्थ उपाधि प्रदान की थी, वही इन्हें बंगलादेश के ढाका विश्वविद्यालय ने भी देकर मानो स्वयं को ही गौरवान्वित किया था।
सन् 1942 में वे 43 वर्ष की अवस्था में अज्ञात रोगों से ग्रस्त हो गए थे और धीरे-धीरे अपनी श्रवण-शक्ति तक गंवा बैठे थे। उन्हें उसी वर्ष एक मस्तिष्कीय अस्पताल में प्रविष्ट कराया गया था। जब वहां इनका ठीक से उपचार न हो पाया, तब उसी प्रकार के अस्पताल में इन्हें करांची में स्थानान्तरित कर दिया गया था। उनके शुभचिन्तकों और प्रशंसकों ने 'नज़रुल ट्रीटमेंट सोसाइटीÓ नाम से एक संस्था बनाई थी। श्री श्यामाप्रसाद मुकर्जी की संस्तुति के कारण इन्हें भविष्य में उत्तम उपचार, चिकित्सा आदि के दृष्टिगत लन्दन भेजा गया था। पहले तो बर्तानवी शासन पर यह मिथ्या आरोप भी लगयाया गया कि इन्हें धीमा विष दिया गया था। वियना में ही कुछ विशेषज्ञ डॉक्टरों के दल ने अन्तत: उन्हें एक विरल रोग मॉरबस पिक होने का प्रमाण भी प्रस्तुत कर दिया था। यह मस्तिष्क से सम्बन्धित एक लाइलाज रोग माना जाता था। वियना के योग्यतम डॉ. हंस हॉफ़ ने स्वीकार किया कि तब तक नज़रुल का असन्तोषजनक और साधारण उपचार ही किया जाता रहा था। वहाँ  भी उपचार न होने के कारण नज़रुल विवश होकर भारत में कोलकाता ही लौट आए थे। सन् 1962 में उनकी चिरकाल से रोगग्रस्त पत्नी प्रमिला का स्वर्गवास हो गया। तदनन्तर वे 'आईसीयूÓ में रोग से जूझने के लिए केवल एकाकी ही रह गए थे।21
इसके बाद अनेक वर्षों तक वेे केवल एकान्तवास तक ही सीमित रह गए थे। नवनिर्मित बंगलादेश के शासन के बुलाने पर वे भारत सरकार से विधिवत् अनुमति लेकर सपरिवार सन् 1972 में चले गए थे। वे परस्पर प्रेम और रूसो के सिद्धान्त 'स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृत्वÓ के व्यापक सिद्धान्त पर चलते रहे। मानवीय मित्रता और विश्व-बन्धुत्व का यह प्रतिनिधि महाकवि और संगीतकार चार वर्ष बाद सन् 1976 को ही इस नश्वर संसार को त्याग कर परलोकगामी हो गया। इसने सरस्वती देवी के कोष में अपने गीतों और कविताओं आदि से अक्षय अभिवृद्धि कर दी थी। इन्होंने अपने रागों, तालों की भास्वर मणि-मुक्ताओं से जो अमूल्य संवद्र्धन किया है, वह अद्याविधि अद्वितीय ही रहा है।
पुस्तक-सन्दर्भ:
1.''इन्तिख़ाबे 'अकबरÓ इलाहाबादी, तस्हीह व तर्तीबÓÓ, डॉ. सिद्दीकुल रह्मान कि़दवाई, जेबी किताबें, जामिआ नगर,     नई देहली, पहली बार सन् 1984, पृष्ठ 70.
2.हिन्दी पुस्तक 'मानवतावादी नज़रुल के गीतÓ, अनुवाद जलज भादुड़ी, पारिजात पब्लिकेशंज़, कोलकाता, प्रथम संस्करण फरवरी सन् 1992, पृष्ठ 109.
3. हिंदी अनूदित पुस्तक 'काज़ी नज़रुल-इस्लामÓ, संपादक गोपाल हालदार, अनुवाद विनोद भारद्वाज, साहित्य अकादमी, नई देहली, प्रथम संस्करण सन् 1977. पृष्ठ 12-14.
4. अशोक कुमार 'यमनÓ, 'संगीत रत्नावलीÓ, अभिषेक पब्लिकेशन्स, सेक्टर 17 सी, चण्डीगढ़, प्रथम संस्करण सन् 2008 ई., पृष्ठ 713.
5. पूर्वोक्त 'मानवतावादी नज़रुल के गीतÓ, पृष्ठ 15.
6. पूर्वोक्त Óकाज़ी नज़रुल-इस्लामÓ, पृष्ठ 31.
7. वही, वही, वही, पृष्ठ 37.
8. 'मानवतावादी नज़रुल के