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Tuesday 21 Nov 2017

सलाम

शिक्षित शर्मा जी स्वास्थ्य के प्रति भी जागरुक हैं। सुबह की सैर पर नियमित जाते हुए सड़क पर सावधानी से चलते हैं। बहुत बड़े अस्पताल की दीवार से सटकर खड़ी की गई एंबुलेंसों को आदर से देखते हैं। पर मुर्दा गाड़ी से बिदक कर निकलते हैं। हालांकि निर्णय नहीं कर पाते। ऐसा मौत से डर की वजह से करते हैं या यूं ही। अलबत्ता यह विचार कई बार मन में आया कि एक दिन ऐसी ही किसी गाड़ी से उन्हें भी जाना होगा। फिर भी ड्राइवर को देखते हुए अप्रिय भाव उमड़ आते हैं, जाने क्यों। जबकि खूब जानते हैं कि यह तो कोई यमदूत नहीं है। जिसे अपनी मौत का संभावित सूत्रधार मानकर मुंह मोड़ा जाए। बावजूद इसके, उन्होंने कभी मुर्दा गाड़ी के ड्राइवर से आंखें चार नहीं की। यह महसूस करते हुए उनमें झुरझुरी उठती हैं कि वह उन्हें नियमित इधर से गुजरते हुए देख-देखकर चौंकेगा या मुस्कुराएगा। कभी उससे आंखें चार नहीं करने की चालाकी बरतने के लिए सोचते हुए वे मुस्कुराते हैं।
उस दिन मुर्दा गाड़ी का पिछला दरवाजा खुला था। मृतक शैय्या पर जो था, उसके नंगे पैर दूर से दिखाई दे रहे थे। मुर्दा है या कोई सो रहा है। उन्होंने अटकल लगाई, कहीं ड्राइवर ही तो नहीं। बाहर नजर भी तो नहीं आ रहा। वरना अक्सर तो गाड़ी के आसपास मंडराता रहता है। कभी सीट पर बैठा अखबार पढ़ता है। वे कनखियों से भांप लेते हैं। लेकिन चालक ऐसी जगह क्यों सोएगा। संभव है चल बसा हो। वे अकुलाते हैं। अब तक एकदम पास आ गए हैं। मोबाइल बजता है। चालक तत्परता से उठकर बात कर रहा है। देखते हुए राहत की सांस लेकर वे चलते जा रहे हैं। इतने में मुर्दागाड़ी फर्राटे से चलती हुई उनसे आगे निकल जाती है।
अगले दिन वे चालक को देखकर मुस्कुराते हुए उसे सलाम करते हैं। वह भी उत्साह से जवाब देता है। अब शर्मा जी की नियमित सैर में यह सलाम भी शामिल है।
-प्रहलाद श्रीमाली
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