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Sunday 19 Nov 2017

पूर्वी लोकगीतों में रामचरित

जयनाथ मणि त्रिपाठी
संपादक- अंचल भारतीय साहित्यिक त्रैमासिक
अंचल भारतीय प्रिंटिंग प्रेस, इंडस्ट्रियल स्टेट
देवरिया (उ.प्र.)
मो. 9415320854
लोकगीत ग्राम्य जीवन के प्रतिनिधि गीत होते हैं। उनके माध्यम से भारत की आत्मा बोलती है। राम का जीवन मानव-जीवन का आदर्श है। अत: हमारी सब भाषाओं और बोलियों में राम का यशोगान किया है। लोकगीत भी इनसे अछूते नहीं हैं। नैमी तिथि मधु मास पुनीता राम-जन्म की शास्त्रोक्त तिथि है। लोक गीतों के रचनाकार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें हर घर को कौशल्या के घर तथा हर पिता को दशरथ के रूप में देखा गया है। इनकी दृष्टि में हर पुत्र राम है या लक्ष्मण है, हर पिता दशरथ है, नगर-नगर अयोध्या है तथा विघटनकारी प्रवृत्तियां ही मंथरा और कैकेयी हैं। कितनी सुन्दर कल्पना है इन कलाकारों की। इनकी मौलिकता पर भला कौन संदेह करेगा। इन लोकगीतों में जो जनकल्याण की मंगल कामनाएं निहित हैं उनसे इस साहित्य की महत्ता तथा विशाल सहृदयता का सहज ही अनुमान किया जा सकता है। आइए हम भी इन लोकगीतकारों के माध्यम से मां कौशल्या से मिलें। रानी कौशल्या मचिया के ऊपर बैठी हुई हैं। वह अपनी सास से कहती हैं-
मचिया ही बैठिल कौशल्या रानी, सासू से अरज करें।
सासू सपना देखिलें अजगूत
सपन बड़ा सुन्दर।
वह सास से अपने सपनों का हाल बताती हैं। सास स्वप्न विचार कर प्रसन्न होती हैं। वह बताती हैं कि सपना पुत्र-जन्म का द्योतक है घर में आनंद होने वाला है।
''चुपहोख ए बहुअरि चुप होख
सुनेली असइन
अरे सावरें वरन हवें लरिका
त घरवां आनन्द होइहे
और फिर चैत मास की नौमी तिथि को राम जन्म होता है।
चैत राम नौमी।
घर भबरा के जन्म भइल
धगरिन सब नेग मांंगें नार के छिनौनी
घर भबरा के जन्म भइल
चैत राम नैमीÓÓ
सीता जी का जन्म अग्नि से-
इस तरह के अनेक लोकगीत राम जन्म के संबंध में प्रचलित हैं। राम पढ़-लिखकर बड़े होते हैं। राजकुमार राम के विवाह के लिए देश-विदेश से आमंत्रण आते हैं। उन्हीं दिनों राजा जनक की पुत्री जानकी जी का स्वयंवर था। राम चक्रवर्ती राजा दशरथ के पुत्र थे अत: स्वयंवर में भाग लेने वह भी पहुंचे। लोक गीतों में जानकी जी का जन्म अग्नि से माना गया है।
अग्नि कुण्ड से निकलेली सीतलि रानी,
भइले जनकपुर में शोर हों
पांच मोहर के राजा धनुष बनवावेलें,
देले मड़उवा ओठगाई हो
जे इहे धनुष करिहे नौखंडा हो
सीता के लें जेइहें बियाहि हो,
स्वयंवर में कोई भी धनुष नहीं तोड़ पाता है। श्रीरामचंद्र जी उस धनुष को तोड़ते हैं और सीता जी उनके गले में विजयमाला डाल देती हैं। बधाई के नगाड़े बजने लगते हैं। श्रीराम की बारात सजती है। महिलाएं मंगल गान करती हैं।
रामजी चले वियाहन
रिम झिम बाजन
उपरा से सुगा मेडऱइले
हमहुं चलब देखन
श्रीरामचंद्र जी की शादी सीता से हो जाती है। दुल्हा बने राम जनकपुर से जाने को तैयार हैं। जनकपुर की नारियां उनकी आरती उतार रही हैं। कुछ नारियां जो राम को पहचानती नहीं है उन्हें पहचानने की जिज्ञासा प्रगट करती है। सहेली राम की पहचान बताती है। वह कहती है कि जिनके माथे पर तिलक लगा है और जो पीताम्बर ओढ़े हुए हैं विशाल धनुष को तोडऩे वाले वही सुन्दर वर श्रीराम हैं।
परिछन चले लीं सासु मदादिन
कौन वर सुन्दर
अरे केकरही आरती उतारें
धनुहियां केहि तूरे
जिनके मथवा तिलक शोभे
ओढ़ले पिताम्बर
अरे उन्हीं के आरती उतारें
रमैया वर सुन्दर,
श्रीरामचन्द्र जी सीता को ब्याह कर अयोध्या आते हैं। राजा दशरथ ज्येष्ठ पुत्र राम को सर्वगुण सम्पन्न समझकर राज्य का भार उन्हें सौंप देना चाहते हैं। राज्य तिलक की तिथि भी निकाली जाती है। इस संवाद से उनकी मंझली रानी कैकेयी को विषाद होता है। वह ऐसी चाल चलती है कि सारे किए कराये पर पानी फिर जाता है। राम को चौदह वर्ष के लिए वन जाना पड़ता है।
''सोने के खड़उआ राजा दशरथ
खुटुर-खुटुर चलें
रानी राम के होइयें तिलकिया
कौन तोरे आई, कौन नहि आई
आई राजा गांव के गवनियां
शहर सब लोग।
राजा एक नाहि आई कैकेइया।
राम जी के बैरिन।ÓÓ
राजा दशरथ कैकेयी को मनाने के लिए जाते हैं। रानी कैकेयी वरदान मांगती हैं। इसी मांग की स्वीकृति से दृश्य बदल जाता है। वे दो मांगें यो हैं-
''राम के तिलका भरथ के
रमैया वनवास करें।
आरे राजा इन्हें मांगन जो मैं पइहौं
तबे सुख देखिबि।
मांगे के ए रानी मांगेलु मंगन नहि जानेहुंर
कैकई नाइ तू करेजवा में हाथ
करेजवां निकारेउ।
दूसरी ओर-
एतनी वचन जब सुने राजा रामचन्द्र
औरी लखन चन्द्र
रामा हथवा के ले के कमरिया
त बनकेरि राहि भये।ÓÓ
यह है हमारी सभ्यता और संस्कृति का आदर्श, जिसका निर्वाह हमारे लोकगीतों में पूरी तरह हुआ है। मृगचर्म के स्थान पर कमरी लेकर राम बन गए हैं। ग्राम्य गीत जो हैं। राम, लक्ष्मण और सीता का वन जाना सुनकर पुरवासी स्तब्ध रह जाते हैं। वह अपने मित्रों, जानकारों से साथी-संगियों से पूछते हैं राम कब गये लक्ष्मण कब चले गए। बहू रानी सीता गर्इं तो कब गईं? जानने वाले उन्हें समझाते हैं।
''कबके निकलि गइले राम
त कब बाबू लछिमन
कब चलि गइली सीता सुन्दरि
हथवां कमरियां ले लें...
संझवे निकलि गइलें राम
सझलौकें बाबू लछिमन
होत भिनुसार सीता सुन्दरि
हथवा कमरिया ले लें।ÓÓ
बतारी चक्रवाकी! कहां गए हैं राम?
सीताजी वन के रास्ते में श्रीराम और लक्ष्मण जी को ढूंढती फिरती हैं।
एक वन गइलौ दूसर वन
और तिसर वन
भेट भइलें वन के चकइयां।
सीतैया अरज करें
अरे अरे वन के तू चकइ
तूही मोरि बहिनि।
बहिनी एही बने
देखलूं, तू राम
औरी बाबू लछिमन।
चक्रवाकी सीता जी के प्रश्नों का बड़े अनमने ढंग से उत्तर देती हैं। सीताजी को उसकी बात जले पर नमक सी लगती है। शालीनता स्त्रियों का मुख्य गुण होता है। सीताजी उसे अपनी बहन बना चुकी हैं। उसके दोषों का मार्जन उसका कर्तव्य हो जाता है। वह उसे श्राप देती हैं। उनके उत्तर प्रति उत्तर को उन्हीं के शब्दों में सुनिये-
नाही देखो ए रानी राम
नाहि बाबू लछिमन
भूलल रहलो में आजु त
अपने चकउवा संघे।
अरे-अरे बन केरी चकईन कौन शराप देईं जियरा दुखित कइलू।
ए चकई दिन भर घूमिह चकउवां संघें।
रातिया बिछोहपरे।
आज भी हमारे गांवों में यह विश्वास किया जाता है कि चक्रवाक और चक्रवाकी पास-पास होते हुए भी रात में उनका मिलन नहीं होता इसका कारण सीताजी का श्राप ही है। इस तरह हम देखते  हैं कि ग्राम्य गीतों में बड़ी बारीकी से रामचरित मानस उतारा गया है। कितनी स्वाभाविकता और भोलापन है, गांव के गूंजते इन लोकगीतों में। इन लोकगीतों के भीतर जो अमृत भरा हुअआ है वह निश्चय ही राष्ट्र भारती की अमूल्य निधि है। ठ्ठ