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Thursday 23 Nov 2017

ठाकुर बावजी

एक ठाकुर साहब के पड़ोसी काश्तकार ने घरेलू जरूरत के चलते अपने खेत से एक पेड़ काटा। ठाकुर साहब से उसकी अदावत थी क्योंकि पिछले पंचायत चुनाव में वह विरोधी धड़े के साथ था और जीत भी उसी की हुई थी। बदली फिजां में वह अब तो रामरमी में भी कोताही करने लगा। उसकी तनी हुई रीढ़ ठाकुर साहब की आँखों में भाले की तरह चुभ रही थी। लिहाजा उन्होंने थाने में रपट दर्ज कराई कि पड़ोसी काश्तकार ने उनके खेत से पेड़ काट कर ले जाने की चोरी की है।
थाने वालों ने उसे तलब किया तो खेत की जमाबन्दी और नक्शा पेश करते हुए उसने बताया कि जरूरत होने पर घरेलू जरूरत होने के कारण उसने अपने ही खेत से पेड़ काटा है। इस पर थाने वालों ने तहसील को लिखा कि राजस्व रिकॉर्ड अनुसार पैमाइश कराई जाकर बताया जाए कि पेड़ किसके खेत से काटा गया है। तहसील कार्यालय ने वह मूल पत्र इस निर्देश के साथ पटवारी को भिजवा दिया कि मामले में पुलिस और खातेदारों की मौजूदगी में पैमाइश की जाकर तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश करें।
पटवारी ने पैमाइश की तो पेड़ का काश्तकार के खेत से ही काटा जाना पाया गया। लिहाजा तद्नुसार तथ्यात्मक रिपोर्ट थाने भिजवा दी गई। थाने वाले मामले में एफ. आर. लगा ही रहे थे कि ठाकुर साहब एस. पी. साहब के यहाँ पेश हो गये 'हुकम पटवारी ने पैसे खाकर गलत रिपोर्ट दी है इसलिए थानेदार जी को एफ. आर. लगाने से रोका जाए। मैं मामले की जाँच किसी उच्चाधिकारी से करवा रहा हूँ।Ó
एस. पी. साहब ने थानेदार को मामला स्थगित रखने के लिए कह दिया।
इस बीच ठाकुर साहब ने एक जिला स्तरीय नेता को एप्रोच किया- 'हुकम अब तो गाँव में ठाकुरों की रत्ती भर इज्जत नहीं रह गई हैं। एक भीलड़े की इतनी औकात कि वह मेरे खेत से दिन दहाड़े पेड़ काट ले जाए और पटवारी घूँस खाकर मामले को रफ़ा-दफ़ा करा देÓ।
नेताजी ने हमारे तहसीलदार साहब को फोन मिलाया और ठाकुर साहब द्वारा बताये कि़स्से को मुख्तसर बयान करते हुए फरमाया कि 'ठाकुर साहब को न्याय मिलना चाहिएÓ।
हमारे तहसीलदार जी चूंकि नेताजी की तहसील से ही स्थानान्तरित होकर आये थे इसलिए यारबाशी और पुराने रसूख के चलते उन्होंने फोन पर ही नेताजी को आश्वस्त कर दिया 'हुकुम आप फिक्र न करें भील जरूर जेल जाएगा।ÓÓ
एस. पी. साहब के दफ़्तर से ठाकुर साहब का शिकायती-पत्र थाने पहुँचा कि पटवारी के खिलाफ चूंकि घूसखोरी का आरोप है इसलिए मामले में पटवारी से उच्च स्तर के अधिकारी से नये सिरे से जाँच कराई जाए।
थाने वालों का पत्र मिलने पर तहसीलदार जी ने गिरदावर को मामले में नये सिरे से पैमाइश के आदेश दिए। लेकिन चलते-चलते उसके कान में फूँक भी मार दी कि रिपोर्ट ठाकुर साहब के हक़ में ही होनी चाहिए।
गिरदावर ने जब पैमाइश की तो पेड़ जहाँ से काटा गया था उससे कऱीब एक जरीब आगे तक भील की ही जमीन निकली। मौका स्थिति और तहसीलदार जी के निर्देश को लेकर पहले तो वह काफ़ी पसोपेश में रहा कि ऐेसे में पेड़ का ठाकुर साहब के खेत से काटा जाना कैसे बताए? आखिऱ उसका पुराना तज़ुर्बा काम आया। आपद्धर्म निभाते हुए उसने मौकेपर्चे में लिखा कि पेड़ दोनों खेतों की सीमा से काटा गया है। अर्थात पेड़ पर भील और ठाकुर साहब का साझा हक़ बनता है। इससे पेड़ पर ठाकुर साहब का मालिकाना हक तो सिद्ध हो गया, लेकिन उधर साझे पेड़ को अकेले भील द्वारा काट लेने से वह फँस गया।
थाने वालों ने गिरदावर की रिपोर्ट के आधार पर भील को मुजरिम करार दे दिया।
मामला यहीं तक रहता तो बात आगे नहीं बढ़ती। थाने वालों ने जैसे ही ठाकुर साहब को बताया कि गिरदावर की रिपोर्ट के आधार पर भील का चालान किया जा रहा है तो ठाकुर साहब जोश में आ गये। वे सीधे पटवार मुख्यालय पहुँचे और उन्होंने पटवारी को लपकाया। ''तूने तो अपनी ऐसी-तैसी करा ली, लेकिन अब देखता हूँ उस साले भीलड़े को जेल जाने से कौन रोकता है? कल ही साले का अरेस्ट वारन्ट जारी नहीं कराया तो मेरा नाम नहीं।ÓÓ
अब पटवारी भी हल्के का हाकिम ठहरा। ठाकुर साहब का रौद्र रूप और मौके की नज़ाकत देखकर उस समय तो वह चुप रहा। लेकिन ठाकुर साहब के जाते ही उसने चेन-मैन के मार्फ़त भील को बुलाया और अपनी मोटर साइकल पर बैठा कर एस. डी. ओ. साहब के दफ़्तर पहुँचा। पी. ए. से मिलकर मामले में उसी दिन पत्थरगढ़ी का आदेश जारी कराया और तहसीलदार जी को लाकर थमा दिया।
इसके बाद पटवारी मेरे पास आया। ''सर एक मामले में आपकी मदद चाहिए।ÓÓ मैंने पूछा तो उसने बताया कि एक पत्थरगढ़ी करानी है। उसने विस्तार से वाकया भी बताया।
पटवारी और काश्तकार को गौर से देखने के बाद मैंने इतना ही कहा कि ''देखो भई पटवारी जी यदि पेड़ काश्तकार के खेत से कटा है तब तो आप निश्चिन्त रहें। लेकिन वैसा नहीं होने कि स्थिति में मैं कोई मदद नहीं कर पाऊँगा। हालांकि मैं हरिश्चन्द्र नहीं हूँ, लेकिन फीस-फाँटा लेकर ग़लत रिपोर्ट कर दूँ यह मुझ से नहीं होगा।ÓÓ
पटवारी बोला ''हुकुम मैं भी श्रीमान से कोई फर्जी रिपोर्ट नहीं कराना चाहता। मेरा तो बस यही निवेदन है कि मामले में फैक्चुअल रिपोर्ट हो जाए।ÓÓ
मैंने कहा ''फिर कोई संकट नहीं है। लेकिन मैं इसके लिए तहसीलदार साहब को कुछ नहींकहँूगा। यदि मेरे नाम आदेश आता है तो मैं पत्थरगढ़ी कराने चल पडं़ूगा।ÓÓ
''सर, तहसीलदार जी से आदेश कराने की जिम्मेदारी मेरी है।Ó पटवारी ने उत्तर दिया और उसी दिन तहसीलदार साहब का आदेश मुझे मिल गया।
अगले दिन सुबह-सुबह प्रधान जी का फोन आया कि ''नायब साहब, पैमाइश कराने जा रहे हैं ?ÓÓ
मैंने हामी भरी तो वे बोले ''ठाकुर साहब का ख्याल रखिएगा, वे अपने ही आदमी हैं।ÓÓ आदत के मुताबिक मैंने कहा कि ''प्रधान साहब यदि ठाकुर साहब सही हैं तो फिर कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन नहीं है तो मैं मामले में कोई खास मदद नहीं कर पाऊँगा। आप चाहें तो तहसीलदार साहब को मौके पर ले जाकर उनसे पैमाइश करा सकते हैं।ÓÓ
प्रधान साहब को बात नागवार गुजऱी। उन्होंने कहा तो कुछ नहीं लेकिन कुछ देर चुप रहने के बाद खटाक से फोन काट दिया। मामला राजनीतिक और संवेदनशील होने से मैंने भी पैमाइश दो दिन के लिए स्थगित कर दी।
लेकिन जब दो दिन तक आदेश में कोई परिवर्तन नहीं हुआ तो तीसरे दिन पैमाइश के लिए मौके पर पहुँचा। पटवारी और गिरदावर भी साथ थे।
पैमाइश की गई तो पटवारी वाली रिपोर्ट ही सही पाई गई। जहाँ से पेड़ काटा गया था उससे लगभग एक जऱीब लम्बाई में भील की जमीन ही निकल रही थी। मैंने गिरदावर पर आँखे तरेरी तो वह फुसफुसाया 'क्या करूं सर तहसीलदार साहब का आदेश थाÓ।
ठाकुर साहब के संतोष के लिए मैंने पड़ोसी खेतों के मुस्तकिल बिन्दुओं से दो बार पैमाइश कराई ताकि किसी किस्म का मुगालता अथवा चूक न रहे। लेकिन सच तो आखिऱ सच था।
ठाकुर साहब से मैंने इतना ही कहा ''यह बुज़ुर्गों का पुण्य-प्रताप है कि आज भी गाँव के लोग हमें ठाकर बावजी कहते हैं। अरे भले आदमी, था तो साला खाँखरे (पलाश) का पेड़ ही, यदि गरीब भील ने ऐसा गुनाह कर भी दिया तो आपको तो बड़ा पेट रखना चाहिए था। फिर उसने तो यह पेड़ अपने ही खेत से काटा है ऐसे में थाने में आपका रिपोर्ट रपट दर्ज कराना कहाँ तक उचित है?Ó
ठाकुर साहब का मुँह उतर गया। फिर भी उन्होंने कुछ पुरानी नकलें पेश की। ''हुकुम नायब साहब, सैटलमेन्ट वालों ने मेरे खेत का रकबा कम कर दिया है, आप पुरानी जमाबन्दी और नक्शे से मिलान कर लीजिए।ÓÓ
''देखिए ठाकुर साहब, यह सब मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। यदि ऐसा था तो आपको रिकॉर्ड दुरस्ती का केस करना चाहिए था। मैं हाल रिकॉर्ड और नक्शे के खिलाफ कोई कार्यवाही करने के लिए अधिकृत नहीं हूँ।ÓÓ कहते हुए मैंने खिसियाये ठाकर बावजी से विदा लेना ही उचित समझा।
दस किलो चीनी का बढ़ा खर्च
सत्ता परिवर्तन के साथ प्रशासन भी वार्ड, ग्राम, पंचायत, तहसील और जिला स्तर पर गठित विभिन्न समितियों में परिवर्तन सुनिश्चित करता है। दरअसल इसके जरिए प्रशासन सत्ताधारी दल के साथ संतुलन बनाये रखने का उपक्रम साधता है। यहाँ तक कि छोटे-मोटे समारोहों के अध्यक्ष, मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि के मनोनयन तक में बाज़वक्त इस अनुशासन के पालन की परम्परा रही है।
एक बार सत्ता परिवर्तन तो नहीं हुआ। लेकिन प्रदेश में विरोधी खेमे के राज्यपाल की नियुक्ति हुई। राजभवन से फरमान जारी हुआ कि प्रशासनिक समितियों में विरोधी खेमे के नुमाइन्दे भी शामिल किए जाएं। इसी के तहत तहसील स्तरीय चीनी वितरण समिति के सदस्यों की संख्या पाँच से बढ़ाकर सात कर दी गई।
इस समिति के सदस्य चीनी वितरण रजिस्टर में दो बार दस्तखत करते हैं। पहले चीनी वितरण की शुरूआत में 'स्टॉक वेरीफिकेशनÓ के लिए और फिर वितरण के बाद इस तथ्य के प्रमाणीकरण के लिए कि चीनी वितरण हमारी मौजूदगी में हुआ और वितरण में किसी प्रकार की कोई अनियमितता नहीं हुई।
इस आदेश के बाद जब एक डीलर चीनी वितरण रजिस्टर के प्रमाणीकरण के लिए तहसील कार्यालय आया तो मैंने उससे नये आदेश बाबत पूछा। उसका जवाब था कि 'हुकुम नया आदेश मिल गया है।Ó
मैंने कहा 'आदेश का पालन सख्ती से होना चाहिए क्योंकि नये जिलाधीश महोदय इसे लेकर बहुत सतर्क हैं।Ó
''आप चिन्ता न करें हुकम आदेश की पालना कड़ाई से की जाएगी।ÓÓ उसने कहा और जाने लगा। लेकिन मैंने देखा उसके चेहरे पर एक कुटिल-सी मुस्कान तारी थी।
लिहाजा मैंने पूछा ''इसमें इस तरह मुस्कुराने की क्या बात है?ÓÓ
उसने कहा ''हुकुम ऐसी कोई खास बात नहीं, बस यूँ ही।ÓÓ लेकिन उसकी आँखों की कोरों में अब भी वह कुटिल मुस्कराहट बाबस्ता थी।
''कोई तो बात है?ÓÓ उसकी आँखों में झाँकते हुए मैंने फिर पूछा।
''अरे हुकुम आपको भी वहम हो गया है ऐसी कोई बात नहीं है। आप निश्चिन्त रहें, आदेश की पालना शत-प्रतिशत की जाएगी।ÓÓ
''देखिए आप कुछ छिपा रहे हैं, साफ-साफ नहीं बता रहे ?ÓÓ मेरे इसरार पर उसने झुकी हुई गरदन ऊपर उठाई और बोला ''अब हुकुम आप मजबूर ही कर रहे हैं तो असलियत बतानी पड़ती है। हम कितना ही ईमानदारी से चीनी वितरण करें, यदि सदस्यों के कोटे की पूर्ति नहीं हुई तो शिकायत हर हाल में होगी। इसलिए मैं इसे लेकर कोई चूक नहीं करता। हर महीने सदस्यों का कोटा उनके घर एडवांस में पहुँचा देता हूँ और वे रजिस्टर में साइन भी उसके बाद ही करते हैं।ÓÓ
''अब चूँकि समिति में दो मेम्बर और बढ़ गये हैं तो पाँच-पाँच किलो के हिसाब से दस किलो चीनी का खर्च बढ़ गया है। वह हर महीने उनके घर पहुँच जाएगी और आपके पास इसे लेकर कोई शिकायत नहीं आएगी।ÓÓ   
(शीघ्र प्रकाश्य तहसीलदारी के संस्मरणों के कुछ अंश)