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Thursday 18 Oct 2018

आज की गज़ल

 


राकेश अचल
एफ 10, न्यू पार्क, होटल पड़ाव, ग्वालियर, मप्र
मो. 09826217795  
      1

आड़ी-टेढ़ी लकीर खींचता है
फिर भी दांतों से तीर खींचता है
हो ना हो उसके पास चुम्बक है
दूर से ही फकीर खींचता है

कैसे कोई छिपा के ले जाये
दर्द को तो शरीर खींचता है
बावला है कि होने वाला है
कोई रांझे से हीर खींचता है?

आदमी जाने कितनी बार गिरे
रोज उसको जमीर खींचता है
रक्तरंजित मुहर भी उसकी है
खूब है जो अमीर खींचता है

खाका हर कोई खींच सकता है
खाल केवल कबीर खींचता है

       2

पहले ढेरों सवाल करता है
बाद में देखभाल करता है
सल्तनत पूछती है बेटों से
बाप को क्यूं हलाल करता है
हाकिमों से तो कुछ नहीं होता
काम पूरा दलाल करता है
टूटने पर भला कहीं कोई
टूटे रिश्ते बहाल करता है
भूख, रोटी, दवाओं के मसले
कौन-कब-कब निकाल करता है
चोंच दी है तो अन्न भी देगा
काम कोई अलाल करता है
       3

जिन्हें मजमे लगाने में महारत हो गयी हासिल
उन्हें ही देश में जननायकों सा मान हासिल है
असल में मान जिनको चाहिए, वे तो उपेक्षित हैं
ठगों को, भेडिय़ों को, मुफ्त में सब शान हासिल है  
रहे जो जिन्दगी भर मांगते रहमोकरम सबसे
उन्हीं को आजकल सबसे जियादा दान हासिल है
हमें तो देखने तक को नहीं मिलता सुनो ग़ालिब
जिन्हें पढऩा नहीं आता उन्हें दीवान हासिल है
अजब मंजर है, इसको देख कर दिल काँप उठता है
यहाँ रोटी नहीं पर मौत का सामान हासिल है