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Wednesday 22 Nov 2017

अदा जाफऱी 22 अगस्त 1924 को उत्तर प्रदेश के शहर बदायूँ में पैदा हुईं। 1947 में लखनऊ के नुरुल हसन जाफऱी से शादी कर पाकिस्तान चली गईं

 रईस  सिद्दीक़ी
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अदा जाफऱी 22 अगस्त 1924 को  उत्तर प्रदेश के शहर बदायूँ में पैदा हुईं। 1947 में लखनऊ के नुरुल हसन जाफऱी से शादी कर  पाकिस्तान चली गईं  और  12 मार्च 2015 को कराची में आखरी साँस  ली।  अदा ने 13 वर्ष की उम्र से  अदा बदायूँनी  के नाम से शेर कहना शुरू किया। शादी के बाद उन्होंने , 91 वर्ष की उम्र तक,  अदा जाफऱी के नाम से गज़़लें, नज़्में और जापानी  काव्य विधा हाईकू लिखीं। उर्दू दुनिया की मशहूर और नर्म शेरी आवाज़ के लिए मारूफ़ शायरा के अनेक काव्य संकलन, मैं साज़ ढूंढती रही,  शहर -ए -दर्द, हफऱ् -ए -शनासाई ,  गज़़ल नुमा,  गज़़ाला तुम वाकिफ़़ हो  और  साज़ -ए- सुखन बहाना है,  एक जगह संकलित कर  मौसम -मौसम  के नाम से प्रकाशित हो चुका है।  जो रही सो बे-खबरी रही , यह अदा की आत्मकथा है।  हम  खिराज -ए -तैहसीन / श्रद्धांजलि के तौर पर उनके कलाम से कुछ चुनिंदा शेर पेश कर रहे हैं।
ये फख़्र तो हासिल है, बुरे हैं कि भले हैं
दो -चार  क़दम हम भी तेरे साथ चले हैं

दिल दुखाते रहे, जी जलाते रहे
हौसले  दर्द  के आज़माते रहे

आखऱी टीस आज़माने को
दिल तो चाहा था मुस्कुराने को

हाथ काँटों से कर लिए ज़ख्मी
फूल बालों में इक सजाने को

एक आईना रु -ब -रु है अभी
उसकी खुशबू से गुफ़्तगू है अभी

दीप था या तारा क्या जाने
दिल में क्यूँ डूबा क्या जाने
आस की  मैली चादर ओढ़े
वो भी था  मुझ- सा क्या जाने
रीत भी अपनी, ऋतु भी अपनी
दिल रस्म-ए- दुनिया क्या जाने

हर गाम संभल संभल रही थी
यादों के भंवर में चल रही थी
साँचे में ख़बर के ढल रही थी
इक ख्वाब की लौ से जल रही थी
शबनम  सी लगी जो देखने में
पत्थर की तरह  पिघल रही थी

हाल खुलता नहीं जबीनों से
रंज उठाए हैं जिन कऱीनों से
हम ने सोचा, न उसने जाना है
दिल भी होते हैं आबगीनों  से

उसके हुज़ूर  शुक्र  भी आसाँ नहीं अदा
वो जो कऱीब-ए-जाँ मेरी तन्हाइयों में था

लहूलुहान उँगलियाँ हैं और चुप खड़ी हूँ मैं
मगर वो शोखी-ए-रंग-ए-हिना नहीं आई

हथेलियों  के गुलाबों से ख़ून रिसता है
गुल-ओ-समन के बे-पनाह चाहतों के दरमियाँ

जिसकी बातों के फ़साने लिक्खे
उसने तो कुछ न कहा था शायद
ख़ून -ए-दिल में तो डिबोया था क़लम
और फिर कुछ न लिखा था शायद

होंठों पे कभी उनके मेरा नाम ही आये
आए तो सही ब-सर-ए -इलज़ाम ही आये