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Saturday 25 Nov 2017

बेकारी के दिनों में

 

 

    1.

बेकारी के दिन
बेकार ख्यालों के दिन
होते हैं
जिसमें किसी भी
अच्छी चीज के लिए
कोई जगह नहीं होती

हर चीज से
दूरी बढ़ती जाती है
अपने आप

और
एक खालीपन
गर्म लावे की तरह
उबलता हुआ
बढ़ता रहता है
भीतर ही भीतर

ये दिन
इतने ऊब और बैचनी से
भरे दिन होते हैं

कि छोटा सा एक कंकड़ भी
उठा कर सकता है
बड़ा सा तूफान

कभी भी ।   
 
     2

बेकारी के दिन
सिमटे हुए दिन होते हैं
जिसमें दुनिया
इतनी सिमट जाती है
कि अपने आप को
छुपाये रखना
बहुत मुश्किल हो जाता है

दूसरों की नजऱ से ।                                          
   
 3

बेकारी के दिनों में
दिन कुछ
लम्बे हो जाते हैं
जो
बहुत मुश्किल से
कटते हैं
कभी-कभी तो
इतने लम्बे हो जाते हैं
कि कटना पड़ जाता है
किसी टे्रन के नीचे !                                           

    4

बेकारी के दिनों में

कुछ ज्यादा ही
बोलते है दरवाजे

कुछ ज्यादा ही
सुनती हैं दीवारें                             
कुछ ज्यादा ही                             
चुप हो जाता है
आदमी !              

बेकारी के दिन
सवालों के दिन होते हैं

जिसके जवाब की
तलाश में
सर झुकाये
भटकना पड़ता है

यहां से वहां ।                                               
 
  5

बेकारी के दिन
घृणा भरे से दिन होते हैं

हर किसी की नजर
इस तरह
देखती है चेहरे को
जैसे कोई
अपराध कर दिया हो

गंभीर !                                                      

  6

बेकारी के दिनों में
सबसे अकेला होता है आदमी

इतना अकेला
कि रास्ते पर पड़ा
पत्थर भी

उसे
दिखाई नहीं देता !