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Monday 20 Nov 2017

दीवार घड़ी


अंजन कुमार
सहायक प्राध्यापक - हिन्दी विभाग
कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय
सेक्टर-7, भिलाई नगर, दुर्ग, (छ.ग.)
मो. 8821800019
1.
रोज सुबह
आदत के मुताबिक
जब देखता हूँ दीवार की तरफ
तो याद आता है
अरे! यह तो बंद पड़ी है कई दिनों से
रोज सोचता हूँ
किसी अच्छे घड़ीसाज से सुधारवा लूँ इसे
और अक्सर भूल जाता हूं
अपनी व्यस्तता में

क्या करूँ
ऐसा लगता है मानो
किसी ने इसके कांटे
निकालकर
दिमाग में फिट कर दिए हों
ताकि इसे देखने की जरूरत
ही न पड़े
और चाबी अपने पास
रख ली हो
जैसे समय के कांटों पर
उसी का हक हो

कांटों से याद आया
घड़ी का सबसे सुंदर
वह छोटा सा सेकण्ड का कांटा
जो सबसे तेज चलता था
जिसके कारण ही
घंटे और मिनट के कांटे आगे बढ़ते थे
जिसके कारण
घड़ी के चलने का पता चलता था
जिसके चलने की आवाज से
लगता था मानो
घर की धड़कनें चल रही हो
रात घर की कोई पहरेदारी कर रहा हो
कोई खामोशी को तोड़
खालीपन को भर रहा हो
इसके यूं बंद पडऩे से
सन्नाटा-सा पसर गया है घर में
हर चीज जैसे ठहर सी गई हो घर की
यहां तक की हवा भी
इसकी आवाज के बिना
कितनी गहरी लग रही है रात
कितना वीरान लग रहा है घर
कितना खालीपन महूसस कर रहा हूँ मैं
दीवार पर
अनापेक्षित-सा टंगा होने के बावजूद  
एक जरूरी हिस्सा था यह घर का
जिसे यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता
इस हालत में

इसे ठीक करना ही होगा
ढूंढना ही होगा
कोई अच्छा घड़ीसाज।

   2.

जिस घड़ीसाज को
मैंने घड़ी ठीक करने के लिए दी थी
उसने बदल दिये हैं
मेरी घड़ी के कांटे

निकाल दिया है उसने
मेरी घड़ी से सेकण्ड का वह कांटा
जो सबसे छोटा था
पूछने पर बताया उसने-
कि बेकार हो गया था वह
और उसी की वजह से
बार-बार बंद पड़ जाती थी घड़ी
वैसे भी
जब उसके बिना भी देखा जा सकता है समय
तो क्या जरूरत है उसकी
बाजार में अब तो
ऐसी सैकड़ों घडिय़ां आ गई हैं
जिनमें सेकण्ड का कांटा होता ही नहीं

पर जिन्हें खरीदते हैं लोग
ले जाते हैं बड़े शौक से
देखते हैं समय

घड़ीसाज से
मैं अपनी घड़ी ले तो आया हूँ
पर जब भी देखता हूँ उसे
तो याद आता है मुझे
सेकण्ड का वह सबसे छोटा कांटा
जिसके बिना कितनी अधूरी लगती है यह घड़ी

यह घड़ी

जिसमें समय तो दिखता है
पर नहीं दिखता
वह कांटा
जो बिना रूके, बिना थके
लगातार चलता रहता है।            

हाथ
 
रोशनी चली जाये अगर
और अंधेरा हो जाये
अंधेरा इतना
कि रास्ता तक दिखाई न दे
चलना तक हो जाये मुश्किल

तब हाथ ही होते हैं
जो आँखों का काम करते हैं
जिसके सहारे ढूँढते हैं हम रास्ता
बढ़ते हैं आगे

अंधेरे में
ये हाथ ही होते हैं
जो ढूँढ निकालते हैं
हमारी खोई हुई रोशनी

बस ! हाथों को
रोशनी का पता होना चाहिए।