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Monday 21 May 2018

मुखिया

 

सूर्यप्रकाश मिश्र
बसन्त कटरा, गांधी चौक
खोजवां (दुर्गाकुण्ड) वाराणसी
मो. 09839888743

मुखिया
सुखिया मरा पड़ा है
उसकी बीवी की आंखों के आंसू
उसके जीते जी ही खत्म हो गए थे
अब तो सिसकियों पर भी
ताला जड़ा है

क्योंकि
जीने की जद्दोजहद में
लिया गया कर्ज
अब भी जिन्दा खड़ा है

सारे छोटे लोग आए और
चले गए
मुखिया बहुत बड़ा है
इसीलिए
दरवाजे पर अब भी खड़ा है

उसकी आंखों में दया का
सागर भरा है
या शायद
सुखिया की जमीन का
छोटा सा टुकड़ा
गड़ा है।

लछमिनिया

घर से निकल गई लछमिनिया
जैसे कोई वीर बहूटी

कांधे पर है काला बोरा
बीन रही प्लास्टिक का झोरा
धीरे-धीरे दिन चढ़ आया
लेकिन बोझा लगता थोड़ा

कहां मिलेगी उम्मीदों की
ऐसी चलती फिरती खूंटी

हुनर नहीं आंके जाते हैं
भाग्य नहीं बांचे जाते हैं
इनकी बस्ती में पेटों के
भ्रूण नहीं जांचे जाते हैं

इनसे खुश न हुई जिन्दगी
और कभी न लगती रूठी

कैसी होली कहां दीवाली
किस्मत उसकी उससे काली
मां उढर गई बाप मर गया
कौन करे उसकी रखवाली

काली देह छोड़ती कल्ले
जाने कितने आंखें फूटीं

घूरे-घूरे फिरती मुनिया
खुली हुई लावारिस कनिया
फिर से सड़ा मजाक करेगा
फिर घूरेगा मोटा बनिया

जितनी बातें हैं विकास की
इसे देखकर लगतीं झूठी