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Monday 20 Nov 2017

हलजोता

इश्तियाक़ सईद
177/1, आएशा मंजिल, पाइप रोड, कुरला, मुंबई- 400070,
मो. 09224799971
'जोखुआ........ए जोखुआÓ ठाकुर रामपाल खेत की मेड़ पर खड़ा चमरोटी की ओर मुंह किए जोखू हलजोते को हांक लगा रहा था। आवाज़ सुनते ही जोखू झट झोपड़ी से बाहर निकल आया। अधेड़ उम्र, मरियल सा, आँखें भीतर को धंसी हुई थी, काले भुजंग शरीर की नग्नता को गमछा से ढांके हुए था। माथे पर हथेली का छज्जा बनाकर चुंधियाई आँखों से आवाज़ की ओर देखा। ''अरे दद्दा हो दद्दा ..... बाबू साहेबÓÓ उसके अधर फडफ़ड़ाये तथा शरीर थरथर कांपने लगा।
''रे जोखुआ'' आवाज़ दोबारा उसके कानों से टकराई, वह कांपते स्वर में चिल्लाया ''आवत हूं बाबू साहेब'' और सरपट दौड़ पड़ा। खुश्क, कंटीली झाडिय़ों और खेत की मेड़ों को लांघते-फलांघते ठाकुर रामपाल के समक्ष पहुंच कर बैल की भांति हांफने लगा। ठाकुर आपे में न था, खींच के एक ज़ोरदार थप्पड़ उसके सूखे पिचके गाल पर जड़ दिया ''का रे हरमजादा, ई बेला भय गई, घाम कपार (सिर) पे चढ़ आवा बकिन अब तक खेत मा हल नहीं पड़ा, जांगरचोर कहीं का ! खाये के तो अढ़ाई सेर चाही आउर काम...?''
ठाकुर के इस बरताव से उसकी आँखें भर आयीं और गला रुंध गया ''बाबू साहेब बलिया की महतारी बहुत बेमार होÓÓ
''बेमार है तो का भवा ..... मरी तो नही नां ? चल जल्दी से बरधा नाध, आज अठवारन भयगवा सिंचाई भयेÓÓ
''आज भर आवुर जाये देव बाबू साहेबÓÓ
''धत सारे ..... खेतवा टनक जाई तब जोतबे ?ÓÓ
''ना ही बाबू साहेब, बस आज.....ÓÓ
''चुप....अब हम कुछ नहीं सुने चाहित.....बस हम यतना जानित है कि, चाहे जो हो आज हमार खेत जोता जाये चाही, चाहे बलिया की महतारी जिये या मरेÓÓ
    ठाकुर तो अपना फरमान जारी करके चला गया किन्तु जोखू की आँखों की नहर सूखे पचके गालों के खेत सींचने लगी तथा सीने पर बेबसी के न जाने कितने हल एक साथ चलने लगे। वह सोचने लगा हलजोताई का जीवन भी कोई जीवन है! बैलों के संग काम करते-करते शायद हम भी बैल हो गये हैं, तभी तो जेठ-बैसाख की चिलचिलाती धूप, पूस-माघ का जाड़ा और सावन-भादों की बरसात की परवा किये बिना हम अपने शरीर को कष्ट देते हैं, बदले में पाते क्या हैं ? गाली, लात और घूंसा.....हाय रे कि़स्मत !
    कहते हैं बारह बरस बीते घूरे के भी दिन फिरते हैं......आखिऱ देखते ही देखते हलजोतों के भी दिन फिरे, समय ने करवट बदला तथा एक-एक कर हलजोते रोटी उगाने शहरों की ओर कूच करने लगे। फिर क्या था धीरे-धीरे ख़ुशहाली उनका मुकद्दर बनती गयी और वह मुकद्दर का सिकन्दर बनते गये। फिर उन्हींकी देखा-देखी नाई, धोबी, कहार, बढ़ई, लोहार और अन्य छोटी जातियों के लोग भी शहर सिधारने लगे। हलजोतों में से जो गाँव में रह गये थे वह भी हलजोताई छोड़ कर मजदूर बन गये अर्थात जजमानी समाप्त करके दिहाड़ी पर हल जोतने लगे। इस कारण धीरे-धीरे बैलों के गले की घंटियां बजना कम हो गयीं तथा रहट के संगीत भी शांत होते गये। फिर इन की जगह पम्पिंग सेट, थ्रेशर, क्रेशर और ट्रेक्टर ने ले ली। इस प्रकार हलजोतों की कमी की भरपाई हुई और काम समय से पहले होने लगा। इसी के साथ-साथ खादी ग्राम उद्योग ने भी पाँव पसारे, जगह-जगह हथकरघे गड़ गये, दरियां और चादरें बीनी जाने लगीं, ग्रामपंचायत का बोलबाला हुआ, गाँव की तरक्क़ी के लिए ग्रामप्रधानों को सरकारी धन राशि मुहैया की जाने लगी। रोजग़ार गारन्टी योजना अथवा महात्मा गांधी रोजग़ार गारन्टी योजना के तहत साल में सौ दिनों की दिहाड़ी पक्की कर दी गई, साथ ही साथ बैंकों से पशु-पालन और मछली-पालन हेतु कजऱ् मँज़ूर होने लगे। ब्लॉक से किसानों को बीज और खाद रियायती दामों पर उपलब्ध कराया जाने लगा। कहने का तात्पर्य यह कि गाँव में पिछड़ी जातियां तथा मेहनतकश वर्ग ख़ुशहाल होने लगा जबकि उच्च वर्ग के लोग अपनी काहिली तथा कायरता का शिकार होने लगे।
    ठाकुर रामपाल की भी दशा कुछ यही हुई। कहते हैं कि हाथी मरा भी तो सवा लाख का! बाप दादा की ज़मीनें थीं, कुछ पुरानी अशरफियां और रुपये भी थे इसलिए साल दो साल बिना किसी आवक के खाते-पीते रहे। जबकि हलजोताई टूटने के बाद सारे के सारे खेत परती ही रहे, कभी जोता तक न गया। हालाँकि कुछ लोगों ने ठाकुर साहब से कहा भी कि यदि खेत ऐसे ही परती रहे तो उसर हो जायेंगे, झाडें़-झंखाड़ें तो उग आई हैं......कुछ नही तो दो तीन बाँह जोतवा कर चरी ही बोवा देना चाहिए ताकि खेतों का जोबन बना रहे। किन्तु ठाकुर साहब ने सब सुनी-अनसुनी कर दी, क्योंकि वह वज़ादारी की बुलन्दी से खाई देखने वालों में से नहीं थे, वह हलजोतों को दृष्टि के जिस कोण से देख रहे थे हालात के गोलाकार में भी वही कोण चाहते थे। परिणाम स्वरुप कई बीघा ज़मीनें मदिरा में डूब गयीं। जगपाल ने पिता की यह गत देखी तो उसे पुरखों की मान-मर्यादा लडख़ड़ाती और भविष्य अंधकार में डूबता मालूम हुआ अत: उसे बंजर होते खेत और कुछ आमदनी की चिंता सताने लगी। पहले तो उसने सोचा क्यों न खेत बटाई पर दे दिया जाय, न जोतने बोने का झंझट न फसल काटने का पचड़ा! घर बैठे आधा अनाज मिल जाया करेगा। फिर अचानक उसकी सोच बदल गई, ''नहीं-नहीं यह ठीक नहीं रहेगा....ऐसे तो वह लोग भी जो हमसे डरते और दबते हैं बराबरी करने लगेंगे....न.....कुछ और सोचना चाहिए...''     
बहरहाल काफी सोच-विचार के बाद ट्रेक्टर खरीदने की बात उसके दिमाग़ में समाई। फिर एक दिन डरते-डरते यह बात ठाकुर साहब के भी कानों में डाल दी गई। ठाकुर साहब सुनते ही आगबबूला हो गए, मारा भर नहीं बाकी सब पद कर दिया उसका। हालात की नज़ाक़त को समझते हुए उस समय तो जगपाल चुप रहा किन्तु इसके बाद मौक़ा बे मौक़ा ट्रेक्टर के लाभ से पिता को अवगत कराना न भूलता। कहते हैं पत्थर पर एक ही जगह बार-बार रस्सी की रगड़ से पत्थर भी घिस जाता है, ठाकुर साहब तो इन्सान थे, आखिऱकार एक दिन उन्होंने उसे ट्रेक्टर खऱीदने की अनुमति दे दी।
समस्या अब यह थी कि ट्रेक्टर आये तो आये कैसे ? रुपये तो पास थे नहीं। अत: ठाकुर साहब से विचार विमर्श हुआ फिर कुछ ज़मीनें बेची गयीं और ट्रेक्टर आ गया। फिर क्या था सूखी, बंजर होती ज़मीनों को नहर के पानी से सींचा गया और ट्रैक्टर से कई फेरा जोत कर मिट्टी को भुरभुरी करके खऱीफ की फ़सल बो दी गई। मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक जब उसके नथुनों में घुसी और हाथ पैरों ने मिट्टी की स्नेहयुक्त छुवन महसूस की तो जगपाल को खेती से लगाव हो गया और वह फ़सल का ख़ूब-खूब ख्याल करने लगा, आवश्यकतानुसार खाद, पानी तथा कीटनाशक दवायें मुहैया करता रहता। फलस्वरुप मेहनत रंग लाई, फसल दूसरों की बनिस्बत अच्छी हुई, इतनी अच्छी कि सारा गाँव उस पर रश्क करने लगा। फिर क्या था देखते ही देखते वह लोगों की निगाहों में मेहनत और लगन की उपमा बनकर कुन्दन की भांति दमकने लगा...जहां-तहां बस उसी का चर्चा था। वह भी अपनी इस कामयाबी पर फूले न समाता था। किन्तु उसकी यह कामयाबी ओस की बूंद साबित हुई, क्योंकि बोआई तो जैसे तैसे हो गई थी परन्तु अब कटाई कैसे हो? मज़दूर तो सभी अपने-अपने खेतों की कटाई में जुटे थे, दुगनी मज़दूरी पर भी राज़ी न होते थे। वह जिस किसी से कहता वह क्षमा याचना करते हुए कहता ''छोटके ठाकुर बदरी हर घड़ी छाई रहत है, कहूं पानी बरस जाई तो हमहन क कुल मिनहत पानी होई जाई, दौनी ओसौनी होई जाये दो.....दाना भुसा खरियान से उठ जाए तब आपो क कटईया कर दिहल जाई'' न जाने कैसे यह बात ठाकुर साहब के कानों तक पहुंच गई, वह सुनते ही आगबबूला हो गए ''उस की ई मजालÓÓ फिर आव देखा न ताव झट खेत जा पहुंचे और किसी अल्हड़ कुमारी की भांति झूमती-इठलाती फसलों को क्रोध की अग्नि दिखा दी और खड़ी फसल देखते ही देखते जल के स्वाहा हो गई। जगपाल पिता का तेवर जानता था इस लिए चुप्पी साधे रहने ही में भलाई जाना।
गाँव वाले जगपाल की फसल देखकर ट्रेक्टर की फायदामन्दी समझ चुके थे, अब वह भी अपने खेतों को हल की बजाय ट्रेक्टर से जोतने की तरकीब लड़ाने लगे थे। जब यह ख़बर जगपाल तक पहुंची तो उसे अपने बेकार होते ट्रेक्टर का उपयोग अथवा आमदनी का रास्ता दिखाई देने लगा अत: मौक़ा को गऩीमत जान कर झट किराये पर ट्रेक्टर से खेतों को जोतने का प्रस्ताव रख दिया। गाँव में ख़ुशी की लहर दौड़ गई, फिर क्या था एक-एक करके खेत ट्रेक्टर से जोता जाने लगा और घन्टों का काम मिनटों में होने लगा। इस से लोगों को इतनी आसानी मिली कि धीरे-धीरे सभी ने हल से खेत जोतना छोड़ दिया और ट्रेक्टर से जोतने के लिए जगपाल से सम्पर्क साधने लगे। इधर मज़दूर हलजोतों ने भी ट्रेक्टर की आवश्यक्ता को महसूस किया और वह भी मशीनी युग की क़तार में आ खड़े हुए। बहरहाल जगपाल का काम इस हद तक बढ़ गया कि उसे भोजन तक के लिए फुरसत न मिलती, जबकि वह ट्रेक्टर का किराया दुगुना और राशि पेशगी लेने लगा था, बावजूद इसके काम समय पर नहीं हो पाता था। लोग खेतों को सींच कर जोताई के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा करते।
जोखू हलजोते के बेटे बलिया ने भी अपना खेत जोतने हेतु पेशगी राशि जमा की थी, किन्तु उसकी बारी आती ही न थी। जो भी दिन उसके लिए तै होता उस दिन ट्रेक्टर किसी और के खेत में चलता, इस प्रकार तीन मरतबा खेत सींचने के बाद सूख चुके थे, चौथी दफा भी जब ऐसा ही हुआ तो उसे क्रोध आ गया और वह जगपाल को खोजता हवेली पहुंच गया। इन दिनों ठाकुर साहब बीमार थे, जगपाल उनकी देख-रेख और सेवा में लीन था। बलिया उसे पुकारता बेधड़क हवेली में घुस गया। उसे देखते ही जगपाल चौंक पड़ा फिर झट पिता की ओर देखा, उनके मुख पर घृणा व क्रोध की रेखायें फैलने तथा सुकडऩे लगी थीं। वह झट बलिया का गट्टा पकड़ उसे बाहर ले जाने के लिए खींचने लगा, किन्तु बलिया टस से मस न हुआ, अंगद के पाँव के भांति उसके भी पाँव धरती पर जमे रहे। जगपाल में इतना बल कहाँ था जो वह बलिया की काठी हिला देता, आखिऱ थक कर उसकी ख़ुशामद करने लगा.......पिता की बिमारी की दुहाई देते हुए उसे बहलाने-फुसलाने लगा परन्तु बलिया ने उसकी एक न सुनी, बस बार-बार वह एक ही वाक्य कहता ''चाहे जो हो छोटके ठाकुर, आज हमार खेत जोताय चाही ठाकुर साहब हैरान थे कि माजरा क्या है ?ÓÓ उनकी आँखों में विस्मय की छाया लहराने लगी थी और माथे की रेखायें प्रश्नचिन्ह का रुप धारण कर रही थीं। जगपाल पिता की भीतरी अवस्था ताड़ गया था, किन्तु करता भी तो क्या ? इस समय उसकी हालत साँप के मुंह में छछुन्दर जैसी थी, न उगलते बनती थी न निगलते। वह जब चिरौरी-विनती के बावजूद भी वहाँ से न टला तो जगपाल के भीतर का क्षत्रीय ख़ून खौल उठा और वह ठकुरई धौंस जमाते हुए शेर की भांति दहाड़ा ''अब तोरी भलमनसी यही में  है कि झट-पट निकल जा यहां से।ÓÓ                                                      
''नाही तो का करोगे ?ÓÓ बलिया की भी तेवरी चढ़ गई।
''पटक के लगब तोड़ै, हरमजादा कहीं का, बीस दफे कह चुके कि बाबा का जी अच्छा नाही त समझ में नही आवत........चल जा, कल परसों तक तोर  खेत जोता जाईÓÓ
इतना सुनते ही बलिया ने लपक कर उसका टेटुवा पकड़ लिया और आँखों में आँखें गाड़ के बोला ''ख़बरदार जो अब गरियाए.......माई कसम तालू से जीभ खींच लेब........अरे खेत सींचे में रुपया लागत है रुपया !........हमरे रुपया हराम का नही आवत, कान खोल के सुन लेयो, आज चाहे जो हो हमार खेत जोताये चाही.........चाहे ठाकुर जियें या मरेंÓÓ
यह सुनते ही जगपाल के पैरों तले से ज़मीन सरकती मालूम होने लगी, उधर ठाकुर साहब क्रोधित हो बिस्तर से उठने का प्रयास कर रहे थे कि धम से गिर पड़े और उनकी आँखों के आगे जोखू हलजोते का चेहरा नाचने लगा।