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Friday 17 Nov 2017

राष्ट्रीय विकास

रामनिहोर विमल
49-एच.ए. विहार, इंदिरा नगर सेक्टर-9
लखनऊ-226016
मो. 8896862769

मनोज, आज भी, शाम को खाली हाथ ही घर लौटा था; चेहरे पर भूख प्यास के साथ, काम न मिल पाने से निराशा के चिन्ह लिए हुए...।
मनोज, पहले सीमेंट फैक्टरी में क्लर्क था, जिन्दगी मजे से चल रही थी, मां-पत्नी-बेटे और बेटी के साथ। नौकरी में अभी अठारह साल ही बीते थे कि अचानक वैश्वीकरण-निजीकरण-उदारीकरण की जोरशोर से चर्चा होने लगी। उसके पक्ष और विपक्ष में, अच्छाइयों एवं बुराइयों पर तमाम लोग, तमाम तरह के तर्क दे रहे थे।
कुछ लोग कह थे- 'इससे औद्योगिक विकास के सारे अवरोध हट जाएंगे, उद्योग-धंधे तेजी से बढ़ेंगे, विकासदर बढ़ जाएगी, देश की कुल परिसंपत्ति में बढ़ोत्तरी हो जाएगी और देश तेजी से, सचमुच में इक्कीसवीं सदी में पहुंच जाएगा।Ó
इसके विपरीत कुछ लोग कह रहे थे- 'कम्प्यूटर को उत्पादन का औजार बना देने से, उद्योग जगत में एक गुणात्मक परिवर्तन आ गया है, क्योंकि कम्प्यूटर, गुणात्मक रूप से मशीनों से भिन्न है। वैसे ही जैसे मशीन, गुणात्मक रूप से, हल-बैलों से भिन्न है। कम्प्यूटर मशीन नहीं, बल्कि मशीन और मनुष्य के बीच की कड़ी है। कम्प्यूटर में, मनुष्यों जैसी ही स्मृति (मेमोरी) होती है, जो मशीनों में नहीं होती। इस स्मृति (मेमोरी) के कारण ही, कम्प्यूटर ने हजारों-लाखों मनुष्यों के मानसिक श्रम को विस्थापित किया था। यह मानी हुई बात है कि उत्पादन के औजारों में गुणात्मक परिवर्तन हो जाने पर, समाज और दुनिया में भी गुणात्मक परिवर्तन होने लगते हैं। आज यही हो रहा है। इस वैश्वीकरण के साथ अनिवार्य रूप से छंटनी, तालाबंदी, बेरोजगारी आदि इस गुणात्मक परिवर्तन के ही परिणाम हैं।Ó
... और कुछ लोग तो अतिवादियों की तरह घोषणाएं ही करने लगे-'हम फिर से गुलाम और बेरोजगार होने जा रहे हैं।Ó
इस तरह फैक्ट्री परिसर में ऊहापोह की स्थिति बनी हुई थी। यूनियन के प्रतिनिधि और पदाधिकारी भी असमंजस में थे।  भविष्य की कोई स्पष्ट तस्वीर नजर नहीं आ रही थी। आम मजदूरों के सवालों को, वे लोग भी, दिल्ली के बड़े नेताओं और उनके वक्तव्यों का हवाला देकर टालते जा रहे थे। किन्तु टाल-मटोल कब तक चलता?
सवालों के दबाव से स्थानीय उपाध्यक्ष और वरिष्ठ सचिव दिल्ली जाकर, यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष को आने के लिए राजी कर आए।
यूनियन कार्यालय में तीन बजे मीटिंग रखी गई, इसके लिए आवश्यक सेवाओं को छोड़कर, शेष सभी मजदूरों एवं बाबुओं को, प्रबंधन की तरफ से कार्यमुक्त कर दिया गया था।
यूनियन कार्यालय में जब श्रमिक लोग पहुंच गए तो वरिष्ठ सचिव ने राष्ट्रीय अध्यक्ष को माला पहनाकर उनका स्वागत करने के बाद, मजदूरों के मन में उठ रहे सवालों को रखते हुए, उनके समाधान का आग्रह किया था।
राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपने उद्बोधन में कहा था- ''मजदूर वर्ग ने हमेशा ही देश के लिए कुर्बानी दी है। देश और देश के विकास के लिए ही जिया है। उसी के लिए मरा है। देश और देश का विकास उसके जीवन के सर्वोपरि उद्देश्य रहे हैं। देश का विकास मजदूरों के खून-पसीने से ही हुआ है। हमारी सरकार भी इसे समझती है। इसलिए हमारी सरकार भी, हमारे हितों के खिलाफ नहीं जाएगी। हम नहीं जाने देंगे। हरगिज नहीं जाने देंगे।ÓÓ
इस पर जोरदार तालियां बजी थीं। जोरदार तालियों ने अध्यक्ष को थोड़ा दम लेने का मौका दे दिया। दम लेने के बाद अध्यक्ष ने आगे कहा- ''लेकिन हमें समय के साथ कदम मिलाकर भी चलना पड़ेगा। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो विकास की दौड़ में पीछे छूट जाएंगे। इसके लिए हमारी सरकार ने कुछ चुनिंदा उद्योगों को, जो घाटे में चल रहे हैं, निजी हाथों में सौंपने का निर्णय लिया है। सरकार यदि घाटे वाले उद्योगों को, निजी हाथों में देकर, उनमें सुधार लाना चाहती है तो हमें राष्ट्रीय विकास को ध्यान में रखकर, सरकार का साथ देना चाहिए। सरकार हमें बार-बार आश्वासन दे रही है कि मजदूर भाइयों के हितों की अनदेखी नहीं की जाएगी। सरकार जब बार-बार कह रही है तो हमें उसका विश्वास करना चाहिए। हमें नुकसान नहीं होगा। हम इसी बात का आपको विश्वास दिलाना चाहते हैं। धन्यवाद।ÓÓ
भाषण समाप्त कर अध्यक्ष जी बैठ गए, तालियां इस बार भी बजीं किन्तु ये औपचारिकतावश बजाई जाने वाली ठंडी तालियां थीं क्योंकि इस दूसरी बात पर मजदूरों को विश्वास नहीं हो पाया था। इसे राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ स्थानीय उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ सचिव ने भी अनुभव किया था।
राष्ट्रीय अध्यक्ष के आश्वासनों और मजदूरों द्वारा ठंडे-अनमने ढंग से बजाई गई तालियों के बीच बनी खाई से वरिष्ठ सचिव भी संतुष्ट नहीं लग रहे थे, क्योंकि स्थानीय होने के कारण वह मजदूरों की शंकाओं एवं भावनाओं से भलीभांति परिचित थे। अत: उन्होंने मजदूरों को खुश करने का एक और प्रयास करते हुए, खुशामदी लहजे में कहा- ''मजदूर भाइयों के मन में, अगर कोई सवाल हो तो पूछें- मैं राष्ट्रीय अध्यक्ष जी से अनुरोध करूंगा कि वे उन सवालों का समाधान करें।ÓÓ
तब मनोज ने ही सवाल पूछा था- ''सर, सेठ लोग तो मुनाफा और केवल मुनाफा कमाने के लिए ही उद्योग-धंधे चलाते हैं और जब घाटा देने लगते हैं तो इन्हें बंद कर देते हैं। फिर पहले से ही घाटा देने वाले उद्योगों को, वे सरकार से क्यों खरीदेंगे?ÓÓ
राष्ट्रीय अध्यक्ष ने जवाब दिया- ''देखिए, ऊपर से देखने पर आपका सवाल सही लग सकता है किन्तु यह सवाल, बहुत ही पुराने नजरिए से उठाया गया सवाल है। अत: हमें सबसे पहले अपना यह पुराना नजरिया बदलना पड़ेगा। हमारे निजी उद्योग और निजी घराने भी, हमारे राष्ट्रीय विकास और समाजवाद के अनिवार्य अंग हैं। इन पर अविश्वास  करके, हम विकास नहीं कर सकते। इन पर शंका करके, हम आगे नहीं बढ़ सकते। अत: हमारी सरकार ने राष्ट्रीय विकास के लिए आम सहमति के आधार पर, निजी घरानों को साथ लेकर चलने का फैसला किया है। सरकार साफ-साफ अपनी बात कह रही है कि घाटे में चल रहे उद्योगों के घाटे का भारी बोझ, केवल सरकार ही क्यों उठाए? इस बोझ को उठाने के लिए, अब निजी घरानों को भी आगे आना चाहिए। निजी घराने तैयार भी हैं। तो सरकार भी उन्हें छूट देगी, रियायतें देगी। तो यह एक प्रयोग है। हमें निजी घरानों को अब केवल अपना शोषक और दुश्मन ही नहीं समझना चाहिए बल्कि मित्र और शुभचिंतक भी मानना चाहिए। अपना हमसफर भी मानना चाहिए। हमें उन पर विश्वास भी करना चाहिए। हमारे राष्ट्रीय विकास में, क्या उनका योगदान नहीं है।ÓÓ
मनोज और उसके तमाम साथियों को विश्वास तो नहीं हुआ किन्तु विश्वास कर लेने की औपचारिकता निभाते हुए बैठना पड़ा क्योंकि मनोज को मालूम है कि अधिक सवाल पूछने पर ये पदाधिकारीगण उसे यूनियनविरोधी कह देंगे। हां यूनियन-विरोध यानी अंत में मजदूर-विरोधी और फिलहाल कोई भी मजदूर, मजदूर-विरोधी कहा जाना पसंद हरगिज नहीं करेगा। इस अविश्वास भरे वातावरण के कारण, आगे किसी दूसरे मजदूरों ने कोई सवाल नहीं पूछा और इस तरह अंत में मीटिंग समाप्त हो गई।
... और इस मीटिंग के एक महीने बाद ही, खबर आई कि  इस कंपनी को गणपत लाल को आधी-अधूरी कीमत पर ही बेचने की कार्यवाही शुरू हो गई है।
मनोज के साथियों ने पुन: सवाल उठाया- बात तो थी कि घाटे में चल रहे उद्योगों को ही सरकार बेचेगी। फिर मुनाफा देने वाली इस सीमेंट कंपनी को क्यों बेचा जा रहा है? बेचने की बातें तो बाजार-भाव पर की जा रही थीं। फिर इसे आधी-अधूरी कीमत पर क्यों बेचा जा रहा है?
सवाल जायज थे। इसमें स्पष्ट रूप से, सरकार को मजदूरों के साथ धोखा और विश्वासघात दिखाई पड़ रहे थे, किन्तु अब इन्हें सुनने वाला कोई पदाधिकारी मौजूद नहीं था। अत: इस तरह के सारे सवाल राष्ट्रीय विकास के नाम पर दब गए।
कार्यवाही बड़ी तेजी से चल रही थी। अत: जल्दी ही यह खबर भी आ गई कि कंपनी बिक गई। आगामी अप्रैल में यह सेठ जी की हो जाएगी। उसके पूर्व सेठ जी ने सरकार से एक शर्त रखी है- मजदूरों की संख्या में, बीस प्रतिशत कटौती की।
डरे-सहमे मजदूर इस खबर से उबर भी नहीं पाए थे कि छंटनी का आदेश भी आ गया। इस छंटनी को एक अच्छा सा कानूनी नाम दिया गया- स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति।
सेठ जी पाप और कलंक अपने सिर नहीं लेना चाहते थे. अत: उनकी बात मानकर, सरकार खुद ही, छंटनी अर्थात् स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को निबटा देना चाहती थी। जिससे कि बाद में कोई कानूनी, गैर-कानूनी झंझट न खड़ा होने पाए। पहले यही प्रचारित किया गया कि कोई जबरदस्ती नहीं है। सब कुछ स्वैच्छिक ही है। अत: पहले सप्ताह में, कुछ लोगों ने ही, जो चार-पांच सालों में वैसे ही सेवानिवृत्त हो जाने वाले थे, फार्म भरे और यह गति बहुत धीमी ही रही।
किन्तु, प्रबंधन को इस एक सप्ताह में आभास हो गया कि ऐसे में बीस प्रतिशत की छंटनी नहीं हो पाएगी। तब शीघ्र ही दूसरा तरीका अपनाया गया। वरिष्ठ सचिव ने खुद सेवानिवृत्ति की घोषणा कर दी। अपनी घोषणा के अगले दिन से ही वह लोगों को समझाने लगे- ''क्या पता, निजी प्रबंधन कैसा हो। हमारी सुने, न सुने। इसलिए अपनी इज्जत इसी में है कि मैं भी सेवानिवृत्ति ले लूं। बाद में, संगठन की यदि इच्छा हुई तो आप लोगों की सेवा करता रहूंगा। मैं तो कह रहा हूं कि आप लोग भी इस बारे में सोचिए।ÓÓ
स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के प्रचार में, वरिष्ठ सचिव के उतर आने पर अधिकांश मजदूर, उनके आचरण को समझ गए। मनोज और उसके साथियों, जो विरोधी गुट के माने जाते थे, अब खुलकर अपना गुस्सा उतारना शुरू कर दिए- ''सालाÓÓ खुलकर दलाली पर उतर आया। इसीलिए प्रबंधन ने उसके बेटे और बेटी को नौकरी पर लगाया था। अब मामला साफ हो गया। पैसा भी लिया ही होगा।
साल भर पहले ही प्रबंधन ने, नियमों को ताक पर रखकर वरिष्ठ सचिव के पुत्र और पुत्री को नौकरी पर रखा था। इस बात को लेकर यूनियन में, काफी खुसर-फुसर हो गई थी। जब यह खुसर-फुसर खुलकर होने लगी तो प्रबंधन ने दूसरे यूनिट में उनका स्थानांतरण कर दिया था। यह स्थानांतरण भी नियम विरुद्ध था, क्योंकि दूसरी यूनिटों में स्थानांतरण केवल अधिकारियों के ही हुआ करते थे अथवा प्रमोशन के बाद, उन श्रमिकों के, जो श्रमिक से अधिकारी कैडर में प्रमोट होते थे। अत: शुरू में इस स्थानांतरण पर भी बहस हुई थी, किन्तु बाद में यह सब दब गया था।
किन्तु अब मनोज और उसके साथियों ने पूरा मामला उभार दिया है। वे सारी बातें, मजदूरों को, फिर से याद दिलाकर कहने लगे- ''जब हमारे बड़े प्रतिनिधि ही इस तरह के हों, तो निजीकरण, छंटनी, बेरोजगारी, बदहाली-तबाही और गुलामी को कौन रोक सकता है?ÓÓ
मनोज एवं उसके साथियों की इन बातों को, अब अधिकांश मजदूर समझ गए। पहले ऐसी बातों को, एक पक्ष की बात मानकर उसे दूसरे पक्ष की बातों के साथ तौला जाता था और मजदूरों की अंतिम प्रतिक्रिया मिलीजुली ही हुआ करती थी, किन्तु वरिष्ठ सचिव की घोषणा एवं उसके आचरण को समझ लेने के बाद उनकी बातें, विरोधी पक्ष की जगह अब सच्ची और यथार्थ लगने लगीं।
इन बातों को देखने-सुनने-समझने के बाद, कुछ अति उत्साही मजदूरों ने वरिष्ठ सचिव की पिटाई भी करनी चाही किन्तु अनुभवी मजदूरों ने उन्हें समझाया- ''हम सबके साथ, उसने धोखा और विश्वासघात तो किया है, किन्तु अब, वह नौकरी से विदा हो रहा है। इसलिए अब गुस्सा करना ठीक नहीं है। अपने गुस्से को नियंत्रित करके, हमें उसे, उसी तरह विदाई देनी चाहिए, जिस तरह एक मरने वाले व्यक्ति को, सभी गिले-शिकवे भुलाकर, अंतिम विदाई दी जाती है। वह तो जा रहा है और चला जाएगा। लेकिन हम अगर गुस्सा करते हैं तो उसका सारा खामियाजा हमें ही भुगतना पड़ेगा क्योंकि स्थिति अचानक बदल गई है। प्रबंधन बहुत मजदूर विरोधी हो चुका है। छंटनी के लिए दबाव बढ़ाया जा रहा है। अत: प्रबंधन को हमारे गुस्से की भनक लगने पर किसी को भी नौकरी से निकाला जा सकता है अथवा सेवानिवृत्ति के लिए मजबूर किया जा सकता है। सी.आर. और आचरण का बहाना बनाया जा सकता है। काम न करने का या न करने देने का आरोप मढ़ा जा सकता है। किसी के विरोध में किसी से, कुछ भी कहलवाया जा सकता है।ÓÓ
अनुभवी एवं अपने वरिष्ठ साथियों की बात मानकर, उत्साही युवक मजदूरों ने, वरिष्ठ सचिव की पिटाई का ख्याल तो छोड़ दिया, किन्तु प्रबंधन अपनी पूर्व निर्धारित योजना से बाज नहीं आया। सेवानिवृत्ति फार्म भरने के आखिरी दिन, अचानक सुरक्षा कर्मियों की संख्या बढ़ा दी गई और बीस प्रतिशत का कोटा पूरा करने के लिए, सैकड़ों मजदूरों को, उन सुरक्षा कर्मियों की मदद से, कार्मिक विभाग में बुलवाकर, उनसे छपे हुए फार्मों एवं प्रारूपों पर दस्तखत करवा लिए गए।
मामला कोर्ट में न जाए, इसलिए प्रबंधन ने, एक अतिरिक्त प्रार्थना पत्र भी छपवा रखा था... ''मैं कंपनी की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना का लाभ लेना चाहता हूं। अत: इस योजना का लाभ उठाने हेतु मुझे, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का प्रारूप पत्र देने की कृपा की जाए।ÓÓ प्रार्थी के हस्ताक्षर के बाद दो गवाहों की साक्षी भी छपी थी- ''अमुक : ...एम्प्लाई सं... पाली संख्या...... को मेरी उपस्थिति में, उसकी मांग-प्रार्थना के बाद उक्त प्रारूप-पत्र दिया गया। प्रारूप-पत्र देने में प्रबंधन का कोई पूर्वाग्रह या अनुचित दबाव नहीं है।ÓÓ
प्रारूप पत्र तो पहले से ही भरे थे। टंकित थे. इस कार्य में कई दिनों से कार्मिक विभाग के बाबू ओवर-टाइम पर लगे थे। श्रमिकों के सारे डाटा भी कार्मिक विभाग में रहते ही हैं। अत: सब कुछ आसानी से हो गया।
प्रारूप पत्र में भी, दो गवाहों के फिर वही वक्तव्य- ''श्री .............. कर्मचारी संख्या........... ने मेरी उपस्थिति में, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना का लाभ लेने हेतु, स्वेच्छा से फार्म भरा है। उन पर प्रबंधन का कोई पूर्वाग्रह या अनुचित दबा नहीं है। गवाह संख्या- एक और गवाह संख्या-दो।ÓÓ और अगले ही दिन, सैकड़ों मजदूर, जिसमें मनोज एवं उसके पांच साथी भी थे, कंपनी की सेवा से स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्त हो गए। मनोज हारे हुए योद्धा की तरह, परिवार सहित वापस घर आ गया। कुछ पैसे भी मिले थे। किन्तु परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और बढ़ती जा रही महंगाई, पेंशन भी नहीं। यह पैसा कब तक साथ देता?
इसलिए वापस आते ही, मनोज नौकरी की तलाश में जुट गया। महीनों जुटा रहा। दर-दर की खाक छानता रहा, किन्तु आज भी वह, खाली हाथ ही घर लौटा था..., चेहरे पर भूख-प्यास और काम न मिल पाने से निराशा के चिन्ह लिए हुए...।  और दूसरे दिन सुबह ही, चारों तरफ खबर फैल गई- ''छंटनी के शिकार, एक और मजदूर, मनोज ने आत्महत्या कर ली।ÓÓ
उस दिन अखबारों की सुर्खियां केन्द्रीय वित्त मंत्री के हवाले से थीं- ''राष्ट्रीय विकास दर अभूतपूर्व है।ÓÓ