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Tuesday 21 Nov 2017

अक्षर पर्व के जनवरी अंक की प्रस्तावना में वरिष्ठ कवि मलय के नए संकलन पर ललितजी की आत्मीय टिप्पणी मलय और उनकी कविता के निहितार्थ को समझने में मदद करती है।

अक्षर पर्व के जनवरी अंक की प्रस्तावना में वरिष्ठ  कवि मलय के नए संकलन पर ललितजी की आत्मीय टिप्पणी मलय और उनकी कविता के निहितार्थ को समझने में मदद करती है। कविता के बारे में ललितजी की जो अपनी समझ है, वह कविता को खोलकर रख देती है, यह एक तरह से कविता की पुनर्रचना है। पत्रिकाओं में ऐसे प्रयास अब विरल हैं। संपादकों के और भी दर्द हैं कविता के सिवा। नंद चतुर्वेदीजी का लेख वर्तमान भारत में बुद्धिजीवियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। इसे इस अंक की उपलब्धि कहा जा सकता है। बुद्धिजीवियों को इस लेख के आलोक में अपनी भूमिका तय करने में मदद मिलेगी। ऐसा पूर्वाग्रह रहित मार्गदर्शक लेख लिखकर चतुर्वेदीजी ने अपने बुद्धिजीवी होने का फर्ज निभाया है। अंक की कहानियां हमारे समाज का सच सामने लाती हैं। कहानियों के चयन में आपका संपादकीय विवेक भी झलकता है। कविताएं पूरी ताकत के साथ अपने समय से टक्कर लेती दिखाई देती है। श्याम सुंदर दुबे के नवगीत सचमुच नवगीत हैं। स्त्री विमर्शियों के लिए ये नवगीत बड़े काम हैं। घरेलू स्त्री के जीवन को शब्दों में उकेरते ये नवगीत  गहरी संवेदना व मानवीय चेतना से भरे हुए हैं। प्रभाकर चौबे का व्यंग्य भ्रष्टाचार हेल्प लाइन भ्रष्टाचार जैसे पुराने विषय को नए रूप में प्रस्तुत करता है। अशोक सेकसरिया पर दोनों स्मृति लेख उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है। उपसंहार में गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ का दर्जा देने के बारे में आपके विचार आपकी वैचारिक दृ्िरष्ट व दृढ़ता का परिचय देते हैं।
रामस्वरूप दीक्षित, सिद्धबाबा कालोनी, टीकमगढ़, म.प्र.