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Tuesday 21 Nov 2017

व्यक्ति मरते हैं, विचार नहीं

सर्वमित्रा सुरजन
बांग्लादेशी मूल के अमरीकी ब्लागर अविजित रॉय की नृशंस हत्या से लेखक समुदाय और साहित्यिक बिरादरी स्तब्ध है। इंटरनेट के कारण दुनिया तेजी से सिमट रही है और ऐसा आभास होता है कि उसके इस सिमटने में संकीर्णता का दायरा विस्तृत होता जा रहा है। विचारों में खुलापन आ रहा है, किंतु परस्पर विरोधी विचारों को खुलेपन और बड़े मन के साथ स्थान देने में कृपणता दिखाई जा रही है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स या ब्लाग आदि के जरिए त्वरित अभिव्यक्ति आसान हो गई है, लेकिन अपनी नापसंदगी को बर्दाश्त करना लोगों के लिए कठिन होता जा रहा है। शायद यही वजह है कि असहिष्णुताा, अनादर, अनैतिकता बढ़ रही है, साहित्य का क्षेत्र भी इससे बच नहींपाया। राजनीति, व्यापार इन क्षेत्रों में तिकड़में होंगी, छल-प्रपंच होंगे, फायदे के लिए विरोधियों को खत्म करने के अनैतिक तरीके आजमाए जाएंगे, ऐसी सामान्य धारणा बन गई है। किंतु विचार, अभिव्यक्ति और साहित्य के क्षेत्र भी इससे अछूते नहींरह गए हैं। यह प्रवृत्ति अंतत: मानवता के लिए खतरनाक और आत्मघाती साबित होगी। साहित्य समाज का दर्पण ही नहींहोता, वह उसका मार्गदर्शक भी होता है। साहित्य समाज की अच्छाई और बुराई दोनों को समान भाव से दर्शाता है, फिर यह समाज की जिम्मेदारी होती है कि वह बुराइयों का परिमार्जन करे, अच्छाइयों को और प्रसारित करे। लेकिन जब आलोचना को सहन करने और आत्ममंथन करने की जगह बदला लेने की भावना हावी हो जाए तो फिर हत्या करने जैसे अतिरंजित कदम उठाने में झिझक नहींहोती। बांग्लादेश में अविजित रॉय की हत्या ऐसी ही एक घटना है। अमरीका में रहने वाले अविजित इंजीनियर थे, और धार्मिक कट्टरता के खिलाफ खुलकर अपने ब्लाग पर लिखते थे। मुक्तमन नामक उनका ब्लाग काफी चर्चित था। इसमें वैज्ञानिक नजरिए को बढ़ावा देते हुए धार्मिक कट्टरता की मुखालफत की जाती थी। अविजित रॉय ने कोई नया काम नहींकिया था। उनके पहले भी अनेक लेखक, विचारक ऐसे हुए हैं जो किसी भी किस्म की धर्मांधता, अनैतिकता, अन्याय, अनाचार के खिलाफ थे और लोगों को उसकी बुराइयों से अवगत कराते हुए इंसानियत के धर्म पर चलने की सलाह देते थे। इन लोगों को भी हमलों का शिकार होना पड़ा। हरिशंकर परसाई, हबीब तनवीर, मकबूल फिदा हुसैन, सब किसी न किसी तरह हमले के शिकार हुए। सफदर हाशमी की तो सरेआम हत्या ही कर दी गई। तस्लीमा नसरीन, सलमान रूश्दी अपने-अपने देशों से बाहर हैं। फ्रांस में शार्ली एब्दो पर हमला होता है, तो सुष्मिता बनर्जी अफगानिस्तान में तालिबानियों द्वारा मार दी जाती हैं। बांग्लादेश में ही एक अन्य ब्लागर अहमद रजीब हैदर की उनके घर पर हत्या कर दी गई और उससे पहले हुमायूं आजाद पर कातिलाना हमला हुआ था। अविजित रॉय को भी लंबे समय से कट्टरपंथियों की धमकियां मिल रही थीं। उन्हें ढाका में पुस्तक मेले में न शामिल होने की सलाह भी शुभचिंतकों ने दी। लेकिन वे न डरे, न रुके। अमरीका से सपत्नीक ढाका विश्वविद्यालय के पुस्तक मेले में शामिल होने आए। रात को जब वे पुस्तक मेले से वापस लौट रहे थे, तब कुछ लोगों ने मांस काटने वाले बड़े चाकू से उन पर और उनकी पत्नी रफीदा अहमद पर हमला किया। अविजित की मृत्यु हो गई, जबकि रफीदा गंभीर रूप से घायल हा गईं । कट्टरवादी जमात अंसार बांग्ला 7 ने ट्वीट करके इस हमले की जिम्मेदारी ली है। अविजीत रॉय के पिता अजय रॉय ने सरकार से न्याय की गुहार लगाई। उन्होंने कहा, कि यह बांग्लादेश जो शहीदों के खूनी बलिदान से बना था अब चरमपंथियों के अड्डे में बदल गया है। मैं सरकार से मांग करता हूं कि वो चरमपंथी गतिविधियों को रोके, और चरमपंथियों को अदालत में लाकर उनके लिए कठोर सज़ा सुनिश्चित करे। अपने बेटे की मौत और बांग्लादेश के बदले चरित्र पर उनकी पीड़ा स्वाभाविक है। सवाल यह नहींहै कि किस व्यक्ति या संगठन ने हमला करवाया और जिम्मेदारी ली। सरकार इस पर क्या प्रतिक्रिया देती है और कितनी कड़ी कार्रवाई करती है, यह भी उतना महत्वपूर्ण नहींहै। महत्वपूर्ण यह है कि समाज ऐसे हमलों को किस रूप में देखता है और इसमें जो उसका अहित हो रहा है, उसे कितना समझता है। जिस दिन समाज अभिव्यक्ति पर पाबंदी के खतरों से रूबरू होगा, उस दिन आलोचना प्रिय लगने लगेगी, व्यक्ति पर अभिव्यक्ति को तरजीह मिलने लगेगी, और शायद ऐसी हत्याएं रुक जाएंगी। हत्यारों को समझना होगा कि व्यक्ति मरते हैं, विचार नहीं।