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Wednesday 22 Nov 2017

सजग और सतर्क आलोचक कृष्णदत्त पालीवाल

डॉ. रेशमी पांडा मुखर्जी
2-ए, उत्तरपल्ली, सोदपुर, कोलकाता-700110
मो. 09433675671  
एक आलोचक साहित्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य को साथ लेकर सामने आता है। वह विद्वानों को देश, जाति या समय के आधार पर नहीं बांटता बल्कि उनकी विद्वत्ता के प्रभावस्वरूप उनका महत्व स्वीकारता है। आलोचक साहित्य को दिशा देने में कितना सफल होता है, यह उसके चिंतन की गहराई साबित करती है। पिछले दिनों आलोचकवर शंभुनाथजी के संपादन में कोलकाता स्थित भारतीय भाषा परिषद के कार्यालय में निर्माणाधीन हिंदी साहित्यकोश के विषय में बातचीत के दौरान वे हठात उदास मन से बोले, ''कृष्णदत्त पालीवालजी का देहांत हो गया। मन बहुत दुखी है। हफ्ते-डेढ़ हफ्ते में उनसे बात होती रहती थी। पता है तुम्हें, इस साहित्यकोश के लिए पालीवालजी ने लगभग पचास प्रविष्टियां लिखीं। उनका सारा काम वे पूरा कर गए। ÓÓ मैंने मन ही मन सोचा कि जिम्मेदार व्यक्ति संसार से हमेशा के लिए कूच करने से पूर्व भी अपना दायित्व निभा कर ही जाता है।
1943 में फर्रूखाबाद, उत्तरप्रदेश में जन्मे कृष्णदत्त पालीवालजी की आलोचना संबंधी लगभग 35 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं। मैथिलीशरण गुप्त व अज्ञेय रचनावली का संपादन पूरी कर्मठता से उन्होंने किया। उन्हें राममनोहर लोहिया पुरस्कार, सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। वे दिल्ली के सस्ता साहित्य मंडल के मंत्री थे। उन्होंने बड़ी तन्मयता व सजगता से हिंदी आलोचना के क्षेत्र को विस्तारित किया, उनके निधन के बाद जो रिक्तता आ गई है, अब लगता है कि क्या भावी पीढ़ी उसे पूरी कर पाएगी।
पालीवालजी अपने लेखन में प्रश्नों को केवल उछालने में अपनी कार्यसिद्वि नहीं मानते थे बल्कि उनमें विचार-मंथन का आग्रह बराबर बना रहा। वे ऐसे मुद्दों को प्रश्नों के घेरे में लाते जो शुष्क व सुप्त मानस में भी हलचल पैदा कर दें। जैसे वे लिखते हैं -
    हमारी परंपराओं की वर्तमानता ही लोक में सनातनता है। क्या कोई वैष्णव, बौद्ध, शैव-शाक्त परंपराओं को गिनकर इन्हें समझ सकता है?
    इस सेक्यूलरवाद ने बड़े-बड़े तमाशे किए और धार्मिक तथा सांसारिक मनुष्य के बीच विभाजन को पक्का कर दिया। सेक्यूलर का ऐतिहासिक संदर्भ क्या किसी 'सबाल्र्टन हिस्ट्रीÓ में मिल सकता है? (लेख - स्मृतिलोक और शास्त्र के अंत:पाठ के बहाने)
     क्या हमारे अपने सांस्कृतिक मिथक, आख्यान, प्रतीक बीत गए हैं? (लेख -सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण के बीच)
    धूमिल के लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है, जो मरम्मत के लिए खड़ा है। प्रश्न है इस आदमी की मरम्मत कैसे हो? कौन करे? (लेख - हिंदी कविता के पचास वर्ष)
पालीवालजी के लेखन में गज़़ब का आत्मविश्वास और दृढ़ता मिलती है। उन्होंने तर्क किया है पर सटीक तथ्य के आधार पर। उनकी तार्किक क्षमता बिना लाग-लपेट के पाठक के पूर्वाग्रहों को ध्वस्त कर देती। वैचारिक कुहरे को उनकी बुद्धि की तीक्ष्णता छिन्न-भिन्न कर देती है। उदाहरण के लिए - 'दही में शराब मिलाकर लस्सी पी जा रही है- इनका विज्ञापन ही अपना झंडा फहरा रहा है। लोगों को नौकरियां मिल रही हैं, भारत जैसा भिखारी भूखा देश उधर लपक रहा है। अंग्रेज़ी से भारतीय भाषाओं के साहित्य को सूली पर चढ़ाया जा रहा है। हर जगह बच्चे टाई लगाकर अंग्रेज़ी बोल रहे हैं, लोक-भाषाओं को चूहामार दवाई खिलाने का यह नया तरीका है।Ó (लेख - लोक और शास्त्र के अंत:पाठ के बहाने)
'हिंदी नवजागरण: प्रश्नाकूलताएं और समस्याएंÓ नामक लेख में वे दृढ़तापूर्वक स्थापित करते हैं - 'आप कितनी ही बहस कीजिए, अंतत: आपको मानना पड़ेगा कि हमारा नवजागरण पश्चिम की देन नहीं है। वह हमारी भीतरी स्थिति-परिस्थिति, तनाव, द्वंद्व, संघर्ष, युद्ध, विषमताओं के भीतर से फूटा है। हमारे यहां तो कभी अंधकार काल रहा ही नहीं।Ó
'समकालीन हिंदी कविता में आत्मसंघर्षÓ के अंतर्गत वे लिखते हैं - 'आजादी के बाद का मोहभंग नेहरूवादी आधुनिकतावाद से भी मोहभंग सिद्ध हुआ जिसमें 'सेकुलरवादÓ की राजनीति के तले सांप्रदायिकतावाद जातिवाद-धर्मवाद को पाला गया। नतीजा यह हुआ कि देशप्रेम, देशभक्ति जैसे शब्द अपशब्द हो गए। इनका ऐसे प्रयोग होने लगा मानो यह गाली हो।Ó
उनका लेखन इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि झूठ और पिछलग्गूपन को धिक्कारना शब्द-कर्म का दायित्व है। आलोचक अपने कर्म के साथ तब तक न्याय नहीं कर सकता जब तक वह साहित्य क्षेत्र में विराजमान मठाधीशों की पैरवी करना अपना धर्म समझे।। पालीवालजी ने साहित्यिक गलियारों में पनपे झूठ का सिरे से पीछा किया और पूरी निर्भीकता से उसकी धज्जियां उड़ाई है। जैसे 'साहित्य में स्वाधीनता की खोजÓ में वे लिखते हैं - 'अज्ञेय का ही यह कलेजा था कि अपने समय में तमाम झूठे अभियोगों के बावजूद वे 'नट की अनझिप आंखोंÓ में नारायण की व्यथा खोजते रहे। Ó
'समकालीन हिंदी कविता में आत्मसंघर्षÓ में वे पूरी सजगता का परिचय देते हुए लिखते हैं -'पूरा समय का पेपर लड़कियों के गैंगरेप से भरा होता है। यौन-शोषण, यौन-भूख, यौन-तृप्ति का नया माहौल बना है। भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद के मोरपंख कृष्ण बनकर लीला कर रहे हैं। ज्यादातर नेताओं के 'रखैलवाद ने नए किस्म की हिंसा का तांडव मचा रखा है। गली-मुहल्लों के रावणों से बच्चेे सुरक्षित नहीं रहे। पूरा समाज आतंक से पीपल के पत्ते की तरह कांप रहा है। Ó
प्रसिद्ध निबंधकार डॉ. कृष्णबिहारी मिश्रजी पालीवालजी को याद करते हुए मुझसे कहने लगे, '' उनका हठात जाना बहुत ट्रैजिक है। काफी काम किया है उन्होंने हिंदी के क्षेत्र में। बिना शोर मचाए, बिना ढिंढोरा पीटे। अकेले अज्ञेयजी की ग्रंथावली का संपादन करना ही क्या कम बड़ा काम है। साथ में उन्होंने और भी बेहतरीन पुस्तकें लिखीं। पर वे हिंदी जगत की राजनीति से दूर रहते थे। तुमने उन्हें कभी बोलते हुए सुना। गज़ब का सुंदर बोलते थे। उनकी स्मृति बहुत तेज़ थी। बहुत सारी कविताएं उन्हें याद रहती थीं। वे धारा-प्रवाह बोलते थे और श्रोता मंत्रमुग्ध।Ó
पालीवालजी को ठोस मुद्दों पर बहस करने की आदत थी। उनके वैचारिक आलेख आरंभ से ही एक के बाद एक महत्वपूर्ण प्रश्न को उकेरते हुए अपने निष्कर्षों तक पहुंचते। उनकी भाषा की संजीदगी भी सभी विद्वानों की सराहना का विषय बनी। एक तरफ उनकी भाषा विषयानुकूल और बहस पर आलोकपात करने का साधन बनी वहीं दूसरी तरफ  उसमें पाठकों के दिल में दस्तक देने की काबिलियत भी बनी रही। 'आनंदवर्धन और उनका ध्वनि तात्पर्यÓ में वे लिखते हैं - वस्तुत: आनंदवर्धन का प्रस्थान था - काव्य मीमांसा। इसलिए उन्होंने काव्य में 'संकेतÓ के महत्व को कई तरह से रेखांकित किया। ध्वनि सिद्धांत ने अर्थ-मीमांसा दर्शन से यह बात निभ्रांत रूप में जोड़ दी कि अर्थ भी दूसरे अर्थ का संकेत करता है। यह संकेत ओट में छिपाकर किया जाता है - जैसे लोक में प्रेमियों के संकेत, कूटभाषा की राजनीति में संकेत।
भूमंडलीकरण की आंधी से वे अंत तक जूझते रहे। ग्लोबल थॉट की झिलमिलाती अवधारणा के पीछे का कटु सत्य उनसे छिपा हुआ नहीं था। भारतीय संस्कृति के प्रचण्ड हिमायती होने के कारण उनके लेखन में भारतीय सांस्कृतिक विरासत की छाप बराबर बनी रही।
पूर्वग्रह पत्रिका के 133 वें अंक के अतिथि संपादक के रूप में उन्होंने संपादकीय में लिखा - 'हमारे युग का पूरा परिदृश्य ऐसा है जिसमें आस्था, कर्मठता, बुद्धि और विवेक पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। धर्म और अध्यात्म की शरण में गया मनुष्य अपनी आत्मा में उस तड़प को महसूस कर रहा है, जिसे बाज़ारवाद, उपभोक्तावादी संस्कृति और भूमंडलीकरण ने जन्म दिया है।... उपभोग की संस्कृति के वर्चस्ववाद का यह आलम है कि संस्कृति-बिक्री उद्देश्य से निर्मित उत्पादों से पट गई है। इन वस्तुओं के प्रति ललक या आसक्ति का भाव चरम पर है।Ó
विजयबहादुर सिंहजी से लिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने मुझसे कहा था 'मूल्यों पर विमर्श होना चाहिए। आलोचक को पांडित्य प्रदर्शन से बचना चाहिए।Ó पालीवालजी का लेखन इस कसौटी पर भी खरा उतरता है। उन्हें एक आलोचक के रूप में अपनी जिम्मेदारी का पूरा एहसास था इसलिए जीवन मूल्यों को अपने विमर्श का विषय बनाते हुए वे लेखक के लेखन-जगत में प्रवेश करते थे। जीवन के प्रति पालीवालजी का लेखन आशा की नई किरण बिखेरता रहा। वे वर्तमान पीढ़ी के लिए सोच के नए झरोखे खोल गए। वे आलोचना के दौरान उन बिंदुओं को स्पर्श करते हुए गुजऱे जिन पर विचार-विमर्श के लंबे दौर चल सकते हैं। वे कवि की आत्मा की परख करते हुए उसे अपने लेखन का विषय बनाते। जैसे - 'भारत-भारतीÓ में खड़ी बोली को गुप्तजी पैदल चलना सिखा रहे थे। उसके निखार-परिष्कार से यह सिद्ध कर रहे थे कि काव्य भाषा के रूप में खड़ी बोली में अनंत सर्जनात्मक शक्ति मौजूद है। क्या यह सच नहीं है कि गुप्तजी के कंधों पर बैठकर ही छायावाद के कवि पंत-प्रसाद-निराला महादेवी आए। (लेख - आधुनिक भारत की गीता: भारत भारती) इसी प्रकार उन्होंने 'कविता समग्र: बलदेव वंशीÓ में कवि के समस्त काव्य संसार का पूरी तन्मयता से संपादन किया है।
अत: एक आलोचक के रूप में उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में जमने वाले दलदल और काई की सफाई का बीड़ा उठाते हुए हिंदी साहित्य के निर्मल, स्वच्छ जलप्रवाह को गति देने में यथेष्ट महत्वपूर्ण व दायित्वपूर्ण भूमिका निभायी है।