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Saturday 18 Nov 2017

बिखरे हुए उजास को तलाशती कविता

संदीप राशिनकर
11 बी, राजेन्द्र नगर
इंदौर-452012 (म.प्र.)
मो. 0945314422
यह निर्विवाद सच है कि विपरीतताओं के इस घटाटोप में उजास की खोज एक कठिन एवं श्रम साध्य कर्म है। परन्तु यही तो है कवि और कविताओं का दायित्व कि वे न सिर्फ अपने परिवेश, अपने समाज व अपने आसपास घटती घटनाओं पर पैनी नजर रखें वरन् उससे उपजती विपरीतताओं के षड्यंत्रों से संघर्ष कर उन्हें नेस्तनाबूद करने का हौसला जगाएं।
प्रभा मुजुमदार की सद्य: प्रकाशित कृति 'अपने हस्तिनापुरों मेंÓ सार्थक काव्यकर्म की दिशा में कुछ ऐसी ही सकारात्मक पहल है। इस कृति में कवयित्री की यथार्थ को निष्ठुरता से खंगालती अड़सठ कविताओं का समावेश है। संग्रह की 'संवादÓ कविता की पंक्तियां-
अनुभूति, वेदनाएं, कवरेज क्षेत्र से बाहर हो गए हैं
या अनलिमिटेड टॉक टाईम के बावजूद बेधक है यहां सन्नाटा
संवेदनहीन होती मानसिकता की न सिर्फ पड़ताल है, वरन् समाज में पसरती संवादहीनता की विडंबना का अनावृत्त साक्षात्कार है। 'चुप हैं सबÓ में कवयित्री बेजां वार्तालाप की जगह चुप्पी को महत्ता देते हुए जब कहती हैं कि-
यूं बेमतलब भी / रहा जा सकता चुप/ बेमतलब ही कुछ
भी कहते रहने के बजाय...
में वो शब्दों और संवाद की सार्थकता की पैरवी करती नज र आती हंै, क्योंकि 'शब्दÓ कविता में वह कहती हैं-
मेरे लिए / शब्द एक औजार है / भीतर ही टूट-फूट उधेड़बुन / अव्यवस्था और अस्वस्थता की शल्यक्रिया के लिए
या- शब्द एक ढाल हैं / चाही अनचाही लड़ाइयों में/
अपनी सुरक्षा के लिए!
रचनाकार शब्दों की महत्ता, उसके गांभीर्य और उसके उचित प्रयोग के प्रति न सिर्फ सजग है वरन् शब्दों की तरफदारी में पूर्ण सामथ्र्य से खड़े हो वह कहता है-
वे रोकना चाहते हैं / किसी भुलावे और छलावे के तहत अपने गलत प्रयोग। / अर्थ मीमांसा और विवेचनाएं / संकीर्ण स्वार्थों के लिए अपनी तोड़-मरोड़!
इसलिए अपनी रचनाओं के शब्दों को आह्वान कर वह कहती हैं-
शब्दों / तुम कागज पर उकेरी गई / बेमतलब रेखाएं नहीं/
गढ़ो नई परिभाषाओं को!
संग्रह की रचनाएं अपने समय की विसंगतियों, छद्मों, छलाओं को निडरता से उद्घाटित करती हैं। हस्तिनापुर जो सत्ता का स्थायी प्रतीक है, के माध्यम से सत्ता द्वारा निरंतरता में चलाए जा रहे कुचक्रों, दमन व सामंती सोच के बरक्स, संग्रह की कविताएं चुनौती का शंख फूंकती नजर आती हैं।
प्रजा वर्ग की लाचारी, बेबसी के कोहरे में अपनी व अपने सामथ्र्य की पहचान खोती अंतर्मुख हो जहां पंक्तियां आती हैं-
अपने से ही नजरें चुराकर / जीने लगी हूं इन दिनों
या- संभव होगा क्या? लिख पाना एक ताजा अध्याय...
तभी रचनाकार विश्वास के पक्ष में खड़ा हो बोल पड़ता है-
जब तक/एक पत्ता भी / खड़कता है अंधेरे में, /सन्नाटे को / मिल रही है चुनौती/
विपरीतताओं/ विलोम / विध्वंस के इस कठिन समय में भी रचनाकार निराश नहीं है क्योंकि वह जानता है कि 'जड़ें जिन्दा हैंÓ (श्रृंखला) / तभी वह कहता है-
उग आती है... थोड़ी सी नर्म घास / जिन्दा हो जाता है/
तब अपने जीने का अहसास!
आज के समय की संवादहीनता/ प्रतिस्पद्र्धा/ निर्ममता और छद्म को कवयित्री ने न सिर्फ सजगता से उद्घाटित किया है वरन् उसमें निहित व उससे निर्मित हो सकने वाले खतरों को भी उसने निडरता से रेखांकित किया है। विद्रूप यथार्थ को व्याख्यायित करती उनकी कविताओं में मानवीय सरोकारों के आह्वान को बड़ी शिद्दत से महसूस किया जा सकता है। गुरुमंत्र / जंगलीघास / निष्कासित होने पर / वे जो राजकुमार नहीं हैं / एक मामूली आदमी / अपने तहखाने में वह महायुद्ध जैसी रचनाएं कवयित्री की वैचारिक समृद्धि व रचनात्मक सरोकारों से साक्षात कराती हंै।
कवयित्री मानवता की महत्ता को स्थापित करते हुए जब कहती हंै कि-
जरूरी है यह भी कि / दुश्मन की मरूभूमि में /
बोये जा सकें / मित्रता के अंकुर
तब मानवता के पक्ष में खड़ी उनकी पक्षधरता विश्व बंधुत्व की विराट कल्पना को आलोकित करती है व सृष्टि की निरंतरता की आश्वस्ति के लिए कहती हैं-
बचा कर रखने होंगे / कुछ अंकुर / सृष्टि के अंत तक / फिर
नए जीवन की / संभावना के लिए!
संभावनाओं को चीन्हने की सकारात्मकता ही लेखन की सार्थकता है तभी तो वह कहती हंै-
ढूंढना होगा खुद / अपने ही प्रयासों से, / अंधेरी काल कोठरी / के बाहर / बिखरा हुआ उजास
और इसी बिखरे हुए उजास की सार्थक तलाश है यह कृति 'अपने हस्तिनापुरों मेंÓ । रोहित रुसिया के अर्थपूर्ण आवरण चित्र के साथ सुरुचिपूर्ण तरीके से प्रकाशित यह कृति अपने कथ्य व प्रस्तुति से प्रभावित करती है।