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Wednesday 22 Nov 2017

यात्राओं के भीतर यात्राएँ

राहुल राजेश
सहायक प्रबंधक, राजभाषा, भारतीय रिज़र्व बैंक
ला गज्जर चैंबर्स, आश्रम रोड, अहमदाबाद-380 009 गुजरात
मो. 9429608159
अगर घुमक्कड़ी खून में शामिल हो जाए तो फिर इस पर किसी का वश नहीं चलता, इस पर किसी का जोर नहीं चलता। क्या उम्र, क्या बंदिशें! घुमक्कड़ी की कशिश ही कुछ ऐसी होती है! जिसे इस कशिश का स्वाद लग गया, वह फिर अपने पैर पीछे नहीं करता, चाहे उम्र कितनी ही आगे क्यों न बढ़ जाए! कुसुम खेमानी की कहानियाँ सुनाती यात्राएँ पढ़कर मुझे तो ऐसा ही महसूस हुआ। अपने दो शब्द में वे स्वयं कहती हैं- यात्राओं ने मेरे जीवन की बुनावट के रचाव-बनाव में एक सार्थक भूमिका निबाही है और मुझे अत्यधिक आनंद दिया है। दरअसल, आदमी घुमक्कड़ी केवल अपने दो पैरों और दो आँखों के सहारे नहीं करता, बल्कि उसके कई-कई जोड़े पैर निकल आते हैं, कई-कई जोड़ी आँखें निकल आती हैं! उसकी आत्मा के पाँव उग आते हैं, उसके मन,हृदय,प्राण की आँखें उग आती हैं और वह चर-अचर, मूर्त-अमूर्त, दृश्य-अदृश्य, सुगम-दुर्गम, जल-थल-नभ सबमें समान रूप से सहज ही विचरण करने लगता है!
कुसुम खेमानी के साथ भी ऐसा ही घटित हुआ जान पड़ता है। तभी तो वह हर बात, हर प्रसंग, हर अवसर में घुमक्कड़ी की गुंजाइश तलाश लेती हैं। अगर गुंजाइश न मिले तो वे गुंजाइश बना लेती हैं। कभी मान-मनौव्वल से, कभी रार-इसरार से, कभी अपने संपर्कों से, तो कभी अपने साधनों से! और घुमक्कड़ी के अपने इसी जज्बे, इसी जुनून की बदौलत वह धरती पर उत्तर-दक्खिन, पूरब-पश्चिम नाप लेती हैं! कभी वह हिमालय की ऊंचाइयों पर पहुँच जाती हैं, तो कभी कश्मीर की घाटियों में। वह कभी गोवा के सागर-तट पर पहुँच जाती हैं, तो कभी पृथ्वी के सुदूर उत्तरी ध्रुव पर। कभी गाँधी के कदमों की निशां तलाशती वह जोहान्सबर्ग पहुँच जाती हैं, तो कभी महाकाल के दर्शन को उज्जैन पहुँच जाती हैं! और ऐसा करते हुए वह केवल वहाँ के भूगोल, वहाँ के समाज, वहाँ की संस्कृति, वहाँ के लोक, वहाँ के इतिहास की कथा नहीं सुनाती हैं, बल्कि इसी के समानांतर वह अपने बचपन, अपने जीवन, अपनी स्मृतियों से जुड़ी कई-कई कहानियाँ सुनाती चलती हैं, जो किसी महाआख्यान में विराम की तरह लगती हैं, क्षेपक की तरह लगती हैं।
 राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली से वर्ष 2012 में पहली बार प्रकाशित और वर्ष 2013 में पुनर्मुद्रित यह यात्रा-पुस्तक यानी कहानियाँ सुनाती यात्राएँ कुसुम खेमानी द्वारा की गई अनेक यात्राओं और आँकड़ों में कहें तो बाईस यात्राओं के अनुभवों और वृत्तांतों का संग्रह है, जो देश के भीतर और देश के बाहर, कई स्थानों, कई नगरों-महानगरों तक फैला है और जिसे चार सौ रुपए के इस हार्डबाउंड संस्करण में एक सौ बयानबे पृष्ठों में समेटा गया है। कुसुम खेमानी के साथ-साथ इस पुस्तक के उडऩ-खटोले पर सवार होकर हम जैसे-जैसे हरिद्वार, कश्मीर, कोलकाता, शिलांग, शांति निकेतन, गोवा, उज्जैन, हैदराबाद से लेकर रोम, डर्बन, बर्लिन, प्राग, मास्को, मिस्र, मॉरिशस, त्रिनिनाड, भूटान, स्विट्जरलैंड, अलास्का, वैंकूवर जैसे निकट-सुदूर स्थानों की यात्राओं के रोमांच से आनंदित-आह्लादित होते जाते हैं, वैसे-वैसे ही हम इस पुस्तक में पर्याप्त से भी अधिक व्याप्त मुद्रण-त्रुटियों की कंटीली-कसैली मार से खिन्न होते जाते हैं! वह तो इन यात्राओं के वर्णनों और रोमांचकारी आवेगों का ही कमाल है कि हम इस पुस्तक को शुरू से अंत तक पढ़ जाते हैं। वरना पुस्तक की पृष्ठों की गुणवत्ता भी पुस्तक की कीमत से कतई मेल नहीं खाती! खैर, चलिए, हम पुस्तक की देह से संबंध-विच्छेद कर पुस्तक की आत्मा की ओर लौटते हैं।
इस पुस्तक की भूमिका में एकांत श्रीवास्तव ने लिखा है पाठक इन यात्रा-निबंधों को पढ़ते हुए यह अनुभव करेंगे कि ये यात्राएँ जितनी बाहर की हैं, उससे कहीं अधिक भीतर की भी हैं। भौगोलिक धरातल पर लेखिका सौ कदम चलती हैं तो आनुभूतिक धरातल पर हजार कदम। इस बात से सहमत होते हुए मैं यह जोडऩा चाहता हूँ कि देश और देश के बाहर की गई इन यात्राओं में लेखिका का आनुभूतिक धरातल देश के भीतर की गई यात्राओं में अपेक्षाकृत ज्यादा सघनता से विस्तार पाता है और लेखिका भी इन यात्राओं के समानांतर अपेक्षाकृत ज्यादा सघनता के साथ अपनी अंतर्यात्रा कर पाती हैं। देश के भीतर की गई यात्राओं के वर्णन में भी उनकी भाषा ज्यादा प्रांजल, ज्यादा सहज और ज्यादा स्वत:स्फूर्त हो पाती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि व्यक्ति अपने देश, अपनी माटी, अपने लोक में पानी में नमक के ढेले और मिसरी की मिठास की तरह स्वत: घुलमिल जाता है और वह उस लोक, उस संस्कृति से अनायास ही एक आत्मीय संबंध बना लेता है। जबकि व्यक्ति किसी पराये देश, पराये लोक, परायी संस्कृति में ऐसा लाख कोशिशों के बावजूद भी नहीं कर पाता है और वह पानी में तेल की तरह अलग ही उपलाता रहता है!
हाँ, यहाँ इतना अवश्य कह सकता हूँ कि यूरोपीय देशों की तुलना में लेखिका भूटान, मॉरिशस, त्रिनिनाड जैसे एशियाई देशों में ज्यादा सहज महसूस करती हैं और वहाँ के यात्रावर्णनों के दौरान उनका अंत:प्रेक्षण भी ज्यादा सहज-स्वभाविक प्रतीत होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन देशों में होली,दीवाली, तुलसी-संझा-बाती, हिंदी-भोजपुरी जैसे कई देशी तत्व वहाँ की लोक-संस्कृति और बोली-बानी में पहले से ही रचे-बसे हैं और उन्हें वहाँ पाकर लेखिका स्वत:स्फूर्त ही, सहज ही, वहाँ का हिस्सा बन जाती है और उन्हें अपना हिस्सा मान लेती हैं। ऐसा इसलिए हो पाता है क्योंकि ये देश कमोबेश अपने देश के भौगोलिक-सांस्कृतिक-ऐतिहासिक विस्तार ही हैं। हम कह सकते हैं कि कुसुम खेमानी वहाँ-वहाँ का हिस्सा बन जाती हैं, जहाँ-जहाँ हमारा देश, हमारा लोक जीवंत है, जीवित है। लेकिन वह वहाँ-वहाँ केवल और केवल एक पर्यटक भर रह जाती हैं, जहाँ-जहाँ हमारा देश, हमारा लोक मौजूद नहीं है। इस लिहाज से भूटान, त्रिनिडाड, मॉरिशस के यात्रा-वृत्तांतों के साथ-साथ कोलकाता, उज्जैन, गोवा, शांति निकेतन, शिलांग के यात्रा-वृत्तांत विशेष तौर पर पढऩे लायक हैं। शेष स्थानों के यात्रा-वृत्तांतों में पर्यटन और सूचनाओं के पुट ज्यादा हैं, आत्मीयता कम, रोमांच ज्यादा है, जो स्वाभाविक है।
यह सच है कि इन यात्रा-वृत्तांतों की शैली बतरस की है और अंदाजे-बयां किस्सागोई का। प्राकृतिक सौंदर्य के वर्णनों को चाक्षुष-दृश्यमान बनाने के लिए कुसुम खेमानी बेहद प्रांजल भाषा और सहज-सुग्राह्य बिंबों का प्रयोग करती हैं और इससे वर्णनों की पठनीयता बढ़ गई है। एक उदाहरण देखिए, दरअसल पेड़ के पीछे छिपा, पश्चिम में ढलता सूरज अपने सुनहरे तेज से आकाश को, धरती को और चारों दिशाओं को तेजस्वी बनाना चाहता था। लेकिन ढलते यौवन में सौंदर्य की तीव्रता तो हो सकती है, पर जवानी की उत्तेजना नहीं। शायद इसलिए उस चौंध में उत्ताप नहीं था। यों लग रहा था कि जैसे सूरज अपनी नई नवेली नार प्रकृति को स्वर्णाभूषणों से इस प्रकार विभूषित कर रहा है कि उसका रोम-रोम ढँक जाए। हालाँकि इस स्वर्णिम आभा के बीच बार-बार लालिमा यों झाँकने लगती थी, मानो दुष्यंत (सूर्य) के प्रथम दर्शन से छुईमुई शंकुतला (धरती)अपने अनुराग को छिपा न पा रही हो! (गोवा, पृ.155-156) पुस्तक में ऐसे कई सम्मोहक वर्णन आपको मिलेंगे। लेकिन लेखिका द्वारा जगह-जगह विस्मयादिबोधक चिन्हों का जरूरत से ज्यादा प्रयोग किया जाना अवश्य अखरता है।
हिंदी साहित्य के एक ऐसे दौर में, जब गद्यलेखन में उपन्यासों और कहानियों का ही बोलबाला हो और ललित-निबंधों, यात्रा-संस्मरणों, अनुभव-वृत्तों, डायरियों और पत्रों का दायरा लेखन और प्रकाशन के स्तर पर लगातार सिकुड़ता ही सिकुड़ता जा रहा हो, कुसुम खेमानी की यह यात्रा-पुस्तक कहानियाँ सुनाती यात्राएँ निश्चित ही एक सकारात्मक और आशादायी उपस्थिति है। बेहद ऊँची कीमत और बेशुमार मुद्रणत्रुटियों के बावजूद यदि पाठक इस पुस्तक को पढऩे के लिए उठा लेंगे तो इसे पूरा पढ़े बिना रह नहीं पाएँगे। इस पुस्तक के बैककवर पर छपा वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह का पत्र भी तो यही कहता है!