Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

अँधेरे में उजाले के गीत

हरेराम समीप
फरीदाबाद-121006 (हरियाणा)
मो. 09871691313
कवि, गज़़लकार एवं गीतकार विनय मिश्र का सद्य:प्रकाशित समकालीन गीत संग्रह 'समय की आँख नम हैÓ के गीत हमें अपने वर्तमान की पीड़ा, दुख और अन्यान्य मानवीय संवेदनाओं से परिचित कराते हैं। पुस्तक के शीर्षक की सार्थकता इस बात से प्रमाणित हो रही है कि यह शीर्षक वाक्य अपने समय के प्रति न केवल आत्मीयता दिखाता है बल्कि एक प्रश्नाकुलता भी जगाता है कि आखिर समय की आँख क्यों नम है। इन गीतों का अध्ययन करते हुए मुझे अनुभव हुआ कि ये गीत विनय मिश्र की समकालीन संवेदना और समझ की मुखर प्रतिध्वनि होकर सामने आए हैं।
नवगीत या समकालीन गीत या कहूँ आज का गीत, एक महत्वपूर्ण काव्य विधा है जो जनपक्षीय सरोकारों से जुड़कर अपने समकाल को पूरी मुखरता से उजागर कर रहा है। इस 150 पृष्ठीय पुस्तक में संग्रहीत 105 गीत समकालीन विडम्बनाओं और विद्रूपताओं को लेकर हमारे सामने आते हैं। विनय मिश्र समकालीन गीतों के सच्चे साधक के रूप में यहाँ उपस्थित हुए हैं। विषय और भाव की दृष्टि से विनय मिश्र के गीत बहुआयामी हैं। इस संग्रह के गीतों के माध्यम से उन्होंने समकालीन संवेदनाओं को नया स्वर दिया है। इस संग्रह में गीतकार की विचार-दृष्टि और उसका परिवेशगत विश्लेषण उल्लेखनीय है। यहाँ विनय मिश्र की काव्यचेतना ने वर्तमान की इन विसंगतियों के प्रति जो बेबाक प्रतिवाद किया है वह उल्लेखनीय है। उदाहरण के तौर पर एक गीत 'सात समंदरÓ की ये पंक्तियाँ देखें:
लगा छलांगें पार हो गए/सात समंदर
शिक्षा के बेढंगेपन ने ऐसा पीसा/गले में टाई/होठों पर हनुमान चलीसा
किसी युक्ति से जो जीता है/वही सिकंदर
अपराधी पहुँचे संसद में/अच्छे खासे
आजादी का तांडव देखा/लाल किले से/
गए काम से/गांधी जी के तीनों बंदर
धन बल से अब/कद जीवन का/लगा है नपने
दूर दूर तक/जीभ निकाले/फिरते सपने
यही प्रगति है/बाहर हंसते रोते भीतर
यही नहीं उनकी यह असहमति इन गीतों में सर्वत्र मिलती है और उनके अनेक गीतों में उपरोक्त बाजारवाद व अपसंस्कृति से उपजी शोषण-संस्कृति के विरूद्ध तीक्ष्ण स्वर उभरा है:
घंटाघर की घड़ी रूकी है
लगता कालातीत समय है
 ये गीत उनकी सहज और समकालीन अभिव्यक्ति के सशक्त उदाहरण हैं जो वास्तव में समय के प्रति उनकी जागरूकता का प्रमाण देते हैं। इस संग्रह का गीतकार व्यवस्था की कमियों को उभारकर लोक को सचेत करने का काम करता है। ये सभी बड़े विषय पर लिखे हुए गीत हैं जो अनेक प्रसंगों व संदर्भों के माध्यम से चित्रित हुए हैं। इन गीतों में विनय मिश्र अपने समय, समाज और संस्कृति से बड़ी सहजता के साथ अपना रिश्ता कायम करते हैं:
इस आँधी में
जो बच जाए वही बहुत है
मूल्यों के क्षरण के दौर में उपरोक्त पंक्तियाँ कितना संबल देती है। यहाँ जीवन के प्रति आश्वस्ति और संघर्ष चेतना पूरी ताकत के साथ मुखरित हुई है।
विनय मिश्र के गीतों की मूल संवेदना है आमजन की पीड़ा इसलिए इन गीतों में समकालीन परिवेश की ताजगी सतत बनी रहती है। इन गीतों में लोकसंवेदना सर्वत्र विद्यमान है। यहाँ कवि अपनी पीड़ा प्रस्तुत करते हुए जैसे सम्पूर्ण भारतीय लोक मानस की पीड़ा को अभिव्यक्ति देता है। उन्होंने अपनी गहरी पीड़ा और व्यथा को अपने गीतों में बेहद सजीव ढंग से प्रस्तुत किया गया है जो हृदय को दूर तक उद्वेलित करते हैं जैसे देखें:-

घर में
दुनिया भर के चलते हरदम झगड़े
षड्यंत्रों की बिल्ली
काट गई है रस्ता
बच्चों से भारी है अब, बच्चों का बस्ता
जेब काटने शातिर कुछ/मेले में उमड़े
नहीं घोलती कानों में रस,
कोयल की कूक
संबंधों के बीच हाथ में, आया चाकू
किस सुनाएँ इस घायल मौसम के दुखड़े
इन पंक्तियों में भारतीय जन की त्रासद स्थिति का खुलासा किया गया है। इस तरह 'कंचन मृगÓ में वे यहाँ हमें अपने समय का आँखों देखा हाल सुना रहे हैं जैसे यह सब कुछ हमारे सामने ही घटित हो रहा हो जिसमें सर्वत्र उलझन, उदासी, दुख और बेचैनी का घटाटोप दिखाई देता है:
कंचन मृग के पीछे भागे, लौटे अब तक राम नहीं
जहाँ कहीं ऐसे अवतरण हैं या ऐसे चित्रण हैं वहाँ पर गीत समाज का गान बन जाता है। इस संग्रह के गीतों में भाषा का सारल्य देखते बनता हैं। पहले गीत से अंतिम गीत तक न कहीं संरचना में झोल मिलता है और न ही भाव-सामथ्र्य में। यद्यपि उन्होंने यहाँ जो शिल्पगत प्रयोग किए गए हैं वे उनके समकालीन गीत के प्रति आत्मीय लगाव और वैचारिक परिपक्वता का प्रमाण देते हैं। साथ ही न्यूनतम शब्दविन्यास में गीतात्मक प्रस्तुतियाँ दर्शनीय हैं। इन गीतों में एक मुखड़ा और दो या तीन अन्तरों में गीत की अभिव्यंजना अत्यंत प्रभावपूर्ण है। इन पंक्तियों में जो नगर-बोध की उपस्थिति मिलती है वह उनके जीवन अनुभव की ही अभिव्यक्तियाँ हैं। यहाँ इन पंक्तियों की भावभूमि को समझने की आवश्यकता है।
अमन चैन की चादर ओढ़े,
हरदम फूटे दंगे
विनय मिश्र अपने समय की चिंताओं में निरन्तर डूबे हुए हैं। वे अपनी चिंता या अपनी बेचैनी को व्यक्त करने के लिए प्रकृति से आलम्बन लेते हैं। आधुनिक जीवन की समस्त विसंगतियों के चित्रण के ध्येय से विनय मिश्र अपने विशेष एवं नए प्रयोगों से नए अर्थों का उद्घाटन करने का प्रयास करते हैं उदाहरणार्थ युगीन संदर्भों को व्यक्त करती ये पंक्तियाँ गौरतलब हैं:
बाहुबली की बस्ती है ये, लाठी का बाजार गरम है
ठूठों की अब तानाशाही, मन की हरियाली पर चलती
एक राग दरबारी पर ही, आज दोमुँही संसद पलती
दुख की छतरी फौज उतरती, आँसू ही अब दीन धरम है
लाठी का बाजार गरम है
विनय मिश्र किसी भी तरह की खेमेबाजी से दूर रहकर किये गये सृजन में विश्वास रखते हैं और इसलिए उनकी गीत चेतना चिंतन प्रधान है और संवेदना मनुष्यता के भाव से सम्पन्न। विनय मिश्र के संवेदना लोक का प्रमुख आकर्षण है- उनके गीतों में उपस्थित जीवनधर्मिता और यही उनके गीतों की आत्मा भी है। इन पंक्तियों का भाव विचारणीय है-
एक भरोसा भर जो, बाकी है आँखों में
उतना भर पूरा हो जाए, यही बहुत है
इन गीतों में विषयगत भाव-सौन्दर्य के अनुरूप भाषा व शैली का संयोजन है। कवि ने यहाँ जिन बिम्बों का प्रयोग किया है वे नए और अनछुए हैं। यह कवि की सूक्ष्म संवेदना और उदात्त साधना का ही प्रतिफल है। प्रगतिचेता विचारक और वरिष्ठ गीतकार नचिकेता विनय मिश्र के संग्रह की भूमिका में कहते हैं कि ''इनके गीतों में दरहकीकत बिम्ब, प्रतीक और सांकेतिकता की द्वंद्वामक एकता दिखाई देती है और यही उनके गीतों की सच्ची कलात्मकता है।ÓÓ चुप्पी की आँच, काजली करवट, जुलाहे-सा मन, थकानों के शिविर, यादों की रबर जैसे प्रयुक्त अनेकानेक नए बिम्ब व प्रतीक इसके उदाहरण हैं। अंतिम गीत 'दृष्टि की भाषाÓ में तो अपनी गीत रचना का उन्होंने जैसे अभीष्ट ही उजागर कर दिया है:
इस विपदा में अश्रु ही। गहने हुए
निकष पर संवेदनाओं के चढ़े। गीत मेरे दिवस की खातिर लड़े।
एक भाषा दृष्टि की पहने हुए
रचनाकार, दिवस अर्थात उजाले के लिए अपने गीतों के जरिए संघर्षरत है अर्थात् इन गीतों की प्रासंगिकता इनके भीतर उपस्थित समकालीन चेतना का भाव बोध ही है जिनकी अभिव्यक्ति में मानवीय सरोकारों को सर्वत्र प्राथमिकता दी गई है। विनय मिश्र एक जगह कहते हैं:
मोल भावों का, शहर है मन
बस यहाँ, संदूक में है धन
मूल्य का नित, हो रहा है क्षय
यहाँ मन के उद्वेलन का सफल शब्दांकन है लेकिन अच्छी बात यह है कि भावुकता की जगह इनमें विचार-तत्व ज्यादा सचेत है। कहीं-कहीं गीत की संवेदना को गज़़ल का लहज़ा मिल गया है और वह शैली यहाँ अलग सौन्दर्य छटा प्रस्तुत कर देती है। जैसे 'बेकलीÓ शीर्षक गीत देखिए:-
सड़क बननी थी जहाँ कोई गली है
सबकी आँखों में अजब सी बेकली है...
जानते सब हैं कोई कहता नहीं है
कोई भी ईमान का पक्का नहीं है
महानगरीय यांत्रिकता पर निरन्तर कटाक्ष करते हुए विनय मिश्र अपने गीतों में अपनी यथार्थपूर्ण जीवनदृष्टि का निरन्तर परिचय देते हैं। खालीपन, खामोशी, अकेलापन आदि शब्दों की निरन्तर आवृति इसका प्रमाण है- जैसे ''खामोशी सांकल बजाती हैÓÓ। ''गीत का समकालीन स्वर अपनी परम्परा और अपने समय की समझ से विकसित हृदय की अंतर्लय की उपज है।ÓÓ विनय मिश्र के इस कथन के आइने में जब हम इस संग्रह को देखते हैं तो पाते हैं कि यहाँ गीतकार अपनी सृजनधर्मिता के शिखर पर है और उसके इन गीतों की भंगिमा अन्य गीतकारों से अलग नजर आती है। यहाँ वर्तमान का यथार्थ अपनी पूरी सत्यता और ताकत के साथ उपस्थित है और कवि अपने यथार्थ की विस्तृत झांकियाँ प्रस्तुत करने में पूर्ण सफल रहा है। विनय मिश्र की कलम ऐसी विदू्रपताओं को व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करने में संलग्न हैं क्योंकि उन्होंने समय के सच को कहने का जोखिम उठाया है। जिन्होंने उनकी गज़़लें पढ़ी हैं वे समझ जाएंगे कि इन गीतों में भावों की सहजता तथा विचारों की स्पष्टता उनकी गज़़लों की धार की तरह ही बेबाकी तथा निर्भीकता से आई है।
विनय मिश्र अपने इस गीत संग्रह में कथ्य, वण्र्य, प्रस्तुति, भाषा और छंद संयोजन के प्रति पूरी तरह सचेत हैं। उन्होंने अपने गीतों के शीर्षकों के नामकरण में भी जो सजगता दिखाई है वह प्रशंसनीय है। आम तौर पर सौ से अधिक गीतों के संग्रह में कथ्य का दोहराव आना स्वाभाविक है लेकिन आश्चर्य है कि यहाँ हर दूसरी रचना में गीत की अन्तर्वस्तु सर्वथा अलग है।     
विनय मिश्र इन गीतों में जिन अन्तर्विरोधों का खुलासा करना चाहते हैं वे सीधे-सीधे हमारे जीवन और व्यवहार के अंग हैं:
दौड़ धूप की तस्वीरें हैं/नई नई
फुर्सत से बतियाने की/हर बात गई
टूटी उम्मीदों की चप्पल
राहों में
दिन भी डूबा देखा यहाँ
गुनाहों में
इस संग्रह के गीत आधुनिक चेतना से सम्पन्न हैं तथा इनमें युगबोध मुखर होकर आया है। यह संग्रह गीतकार के प्रति अनन्त संभावनाएँ जगाता है क्योंकि संग्रह में संकलित गीत कृत्रिमता, दुरूहता और वैचारिक जटिलता से मुक्त हैं। गीत के लय और प्रवाह की कसौटी पर भी विनय मिश्र के गीत खरे और प्रभावी हैं। इस संग्रह के गीत लालित्य से ललकार तक की यात्रा करते हैं इसलिए ये जनता के कंठहार बनने का माद्दा रखते हैं।