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Sunday 19 Nov 2017

गज़़ल

 

कुमार विनोद
प्रोफ़ेसर
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र - 136119 (हरियाणा)
(1)
ज़रा-सी बात का उसने बुरा कितना मनाया था
कहा कुछ भी नहीं, मैंने तो बस दर्पण दिखाया था

वो अब पहचानने से भी तुम्हें इनकार करते हैं
सिंहासन पर जिन्हें तुमने अभी कल ही बिठाया था

झुलसती तेज़ गर्मी में वो बादल एक आवारा
फ़रिश्ता बनके मेरे ही लिए मानो वो आया था

वो बच्चे भी किसी इन्जीनियर से कम कहां थे जी
घरौंदा रेत का कोई, जिन्होंने भी बनाया था

समन्दर 'शर्म से पानी हुआ है याद ये करके
नदी की याद में उसने कभी ख़ुद को रुलाया था

(2)
अंधेरी रात में जुगनू कहीं जब टिमटिमाता है
उम्मीदें सांस लेती हैं यक़ीं भी मुस्कुराता है

लुभाने की कला में तो नहीं इसका कोई सानी
बदलते वक़्त में बाज़ार आंखें भी दिखाता है

है डूबी सोच में कोयल मिलेगी नौकरी कैसे
सिवा गाने के इसको और कुछ भी तो न आता है

पतंगों के हुआ करते थे दीवाने कभी बच्चे
उन्हीं बच्चों को सूना आसमां फिर से बुलाता है

असम्भव तो नहीं मुश्किल है ऐसे 'शख़्स का होना
मुसीबत के दिनों में भी जो हरदम मुस्कुराता है

(3)

वो बहरे हैं मगर उनको सुनाना भी ज़रूरी है
हमें हक़ चाहिए अपना, जताना भी ज़रूरी है

कोई भी दासताँ कहनी हो बस इतना समझ लीजे
हक़ीक़त ही नहीं काफ़ी फ़साना  भी ज़रूरी है


बला की तेज़ आँधी में, बचाने के लिए ख़ुद को
घड़ी भर के लिए सिर को झुकाना भी ज़रूरी है

हक़ीक़त में बदलने से, है कब इनकार सपनों को
मगर इसके लिए ख़ुद को जगाना भी ज़रूरी है

कि़ताब-ए-जि़न्दगी ने पाठ ये हम को पढ़ाया है
बनाने के लिए ख़ुद को मिटाना भी ज़रूरी है

ज़बानी ख़र्च बच्चों पर, नहीं कुछ काम आएगा
कि सीने से उन्हें अपने लगाना भी ज़रूरी है  

(4)

आइना यह देखकर हैरान है
किस क़दर अब खोखली मुस्कान है

योग्य आदर के सभी कठपुतलियाँ
फिर किया राजा ने यह ऐलान है

उनकी बातों का असर तो देखिए
चाय की प्याली में भी तूफ़ान है

क्या तिजारत और क्या तालीम अब
डिगरियों  की  हर तरफ़  दूकान है

एक  टॉफ़ी  से  मना  लूँगा  उसे
यूँ  तो  बच्चा  वो  बहुत  शैतान है

ख़्वाहिशें  खऱगोश  के  मानिन्द  हैं
इनको  छू  पाना  कहाँ  आसान  है

आज तक सिर को झुकाया ही नहीं
क्या  निराली  आसमाँ  की  शान है!

है  कहाँ  पहचान उसकी एक भी !
इक  अदद  उसकी यही पहचान है