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Tuesday 21 Nov 2017

रावण और उसकी लंका का भव्य रूप

डॉ. शोभा निगम
मुकर्जी कम्पाउंड         
फौवारा चौक, बैरनबाजार
मो. 9826947776  
लोक: रोदयति अर्थात् लोक को रूलाने वाले दशमुख राक्षस रावण के विषय में सामान्य धारणा यह बनती है कि वह विद्रूप और भयानक रहा होगा। किंतु वाल्मीकि ने रावण को तेज और सौंदर्य से युक्त बतलाया है। पैदा वह अवश्य दस मुख के साथ हुआ था किंतु सहस्रों वर्षों तक ब्रह्मा की कड़ी तपस्या कर अपना एक-एक मुंड यज्ञाग्नि में समर्पित कर उसने ब्रह्मा को प्रसन्न कर लिया था। फलस्वरूप अपने दसों मुंड पुन: प्राप्त कर लिये थे ...साथ ही देव, दानव आदि से अजेय होने का वर भी पाया था। इसके साथ ही यह वरदान भी पाया था कि वह रूप बदल सकता था इसीलिये उसे रामायण में अनेक बार केवल एक मुख और दो बांहों वाला सुरूपवान बतलाया गया है। सीता की खोज में लंका पहुंचे हनुमान जब-जब उससे मिलते हैं उससे प्रभावित होते हैं। हनुमान ने पहली बार उसे लंका में रात्रि के समय सोते हुए उसके महल में देखा था। दिव्य आभूषणों से वह विभूषित था और सुरूपवान था। श्याममेघ के समान अंगकंाति वाले उस राक्षस के कानों में उज्ज्वल कुंडल प्रकाशित हो रहे थे और उसने अपनी विशाल देह पर सुनहरे झिलमिलाते वस्त्र पहन रखे थे। पहले तो वानरशिरोमणि हनुमान आश्चर्य से भरे हुए उसे निहारते उसके पास पहुंचे पर सहसा उद्विग्न हो डरे हुए से दूर हट गये थे और दूर से ही उसे देखा। वहां से उन्होंने उसकी बलिष्ठ और उत्तम लक्षणों वाली तथा सुंदर कंधों वाली दो बांहों को देखा जिसे रावण की पत्नियां दबा रही थी। उसका मुखारविंद मुक्तामणि से जटित सुवर्णमय आभा वाले कुछ तिरछे हो चुके मुकुट से और भी उद्भासित हो रहा था। उसकी छाती उभरी हुई और लंबी-चौड़ी थी जिससे राक्षसराज के संपूर्ण शरीर की बड़ी शोभा हो रही थी। (वा.रा.सुं.कां 10.12)
दूसरी बार हनुमान ने उसे अशोकवाटिका में देखा जब वे सीता को खोजते हुए वहां पहुंचे थे। यहां वाल्मीकि लिखते हैं -यद्यपि हनुमान भी बड़े उग्र तेज से संपन्न थे किंतु रावण को देखकर उसके तेज से तिरस्कृत होकर वे सघन पत्तों की आड़ में छिप गये। (वही 18.31) उस समय रावण सीता को तरह-तरह से अपमानित करता है और डराता है किंतु हनुमान मौन रहते हैं...वस्तुत: उस समय उनका मौन रहना आवश्यक भी था।
तीसरी बार दशकंठ से उसकी सभा में हनुमान से भेंट होती है जब अशोकवाटिका को उजाडऩे के बाद इन्द्रजित ब्रह्मास्त्र में बांधकर उन्हें वहां ले जाता है। यहां वायुनंदन ने उच्चसिंहासन पर रावण को विराजमान देखा और पहली बार उससे बातें भी की। इस समय रावण की शोभा का वर्णन करते हुए वाल्मीकि लिखते हैं-स्वर्णनिर्मित आभूषणों से विभूषित वह अत्यंत उद्भासित था। उसके आभूषण ऐसे लगते थे मानो मानसिक संकल्प से बनाये गये हों। सुंदर रेशमी वस्त्र उसके शरीर की शोभा बढ़ा रहे थे और कोयले की भांति काला उसका शरीर लाल चंदन से चर्चित हो विचित्र शोभा से युक्त था। अपने दस मस्तकों से सुशोभित वह नाना प्रकार के सर्पों से भरे हुए मंदराचल के समान प्रतीत हो रहा था। उसका आनन प्रात:काल के सूर्य से युक्त मेघ के समान सौंदर्ययुक्त था। उसके उस रूप पर मोहित हो हनुमान मन ही मन कहते हैं -अहो रूपमहो धैर्यमहो सत्त्वमहो द्युति:। अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता।। अर्थात अहो ! इस राक्षसराज का रूप कैसा अद्भुत है! कैसा अनोखा इसका धैर्य है! कैसी अनुपम शक्ति है! और कैसा आश्चर्यजनक तेज है! इसका संपूर्ण राजोचित लक्षणों से संपन्न होना कितने आश्चर्य की बात है!
इतना ही नहीं, हनुमान यहां तक सोचते हैं कि यदि इसमें अधर्म न होता तो यह राक्षसराज रावण इन्द्रसहित समस्त देवलोक का संरक्षक हो सकता था। इसके लोकनिंदित क्रूरतापूर्ण निष्ठुर कर्मों के कारण देवताओं और दानवों सहित समस्त लोक इससे भयभीत रहते हैं। यह कुपित होने पर समस्त जगत को एकार्णव में निमग्न कर संसार में प्रलय मचा सकता है। (वही सुं.कां.सर्ग 49)
रावण को देखकर केवल हनुमान प्रभावित हुए हों ऐसा नहीं है। युद्धभूमि में जब राम पहली बार रावण को देखते हैं तो विभीषण से कह उठते हैं- अहो दीप्तमहातेजा रावणो राक्षसेश्वर:। अहो! राक्षसराज रावण का तेज तो बहुत ही बढ़ा-चढ़ा और दैदीप्यमान है ! रावण अपनी प्रभा से सूर्य की भांति ऐसी शोभा पा रहा है कि इसकी ओर देखना भी कठिन हो रहा है। तेजोमण्डल से व्याप्त होने के कारण इसका रूप मुझे स्पष्ट नहीं हो रहा है। इसका शरीर तो जैसे सुशोभित हो रहा है वैसा तो देवदानववीराणां बपुर्नैवंविविधं भवेत् अर्थात् देव और दानव वीरों का भी नहीं होगा ! ...वह तो अचानक सीता का स्मरण आने पर राम के मन में रावण के प्रति क्रोध का उद्रेग आ गया अन्यथा संभवत: वे और भी रावण की प्रशंसा करते!
यहां उल्लेखनीय है कि रावण की शोभा का जैसा वर्णन वाल्मीकि ने किया है, तुलसीदास ने ऐसे वर्णन में कुछ कंजूसी से काम लिया है। उसकी वीरता के बखान में अवश्य कई बार तुलसी मुखर हुए हैं किंतु उसके रूप के वर्णन में उनकी लेखनी से रावण के लिये बस यही निकला है-  अंगद दीख दसानन बैसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें।।
भुजा बिटप सिर सृंग समाना।     रोमावली लता जनु नाना।।
 मुख नासिका नयन अरू काना।। गिरि कंदरा खोह अनुमाना।।
क्या विद्रूप कल्पना है लंकेश्वर की! प्राण युक्त काजल के पहाड़ सी देह! भुजाएं मानो वृक्ष और सिर मानो पहाड़ की चोटियंा! रोमावलियंा मानो नाना प्रकार की लताएं! मुख, नाक, कान और नेत्र मानो इस पहाड़ की नाना गुफाएं! ऐसा ही दिखा था अंगद को रावण जब उसने राम के दूत के रूप में पहली बार उसे उसकी सभा में देखा था। और हनुमान को तो उसमें कोई विशेषता ही नहीं दिखी जब पहली बार उसे उन्होंने उसके महल में सीता की खोज करते हुए देखा। यहां दशानन के केवल महल की शोभा का वर्णन है ,वह भी  अद्र्ध-पंक्ति में...रावण से तो हनुमान बिल्कुल प्रभावित नहीं हुए। तुलसी के शब्दों में उन्होंने उसे केवल उसे शयन करते देखा-
गयउ दसानन मंदिर माहीं । अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।
सयन किएं देखा कपि तेही।
मंदिर महुं न दीखि बैदेही।। (मानस, सुं.कंा. 5.3-4)
संभवत: तुलसी यह बताना चाहते हैं कि हनुमान का पूरा ध्यान वैदेही की ओर था जो उन्हें रावण के महल में कहीं नहीं दिखी।
वैसे अनेक अन्य रामकथाकारों ने रावण और उसकी लंका की भव्यता के वर्णन में कमी नहीं की है। तमिल कंब रामायण में रावण को देखकर हनुमान पहले तो उसके रंग को देख सोचते हैं -बहुत प्राचीनकाल से लेकर अब तक का सारा अंधकार इक_ा होकर आया हो, ऐसे रंग का है यह! किंतु आगे उसके रूप का भव्य वर्णन है...महल के अंदर विशाल क्षीरसागर के मध्य अनेक रत्नसहित फनों वाले नाग पर लंबे किनारे वाला बड़ा सा काला सागर फैला हो, ऐसे दर्शनीय आकर्षण के साथ रावण सो रहा था। (कं.रा.सुं.कां. 300-301) रावण का वक्ष आभरणों से युक्त था, जो उसको घेरे ऐसे लग रहे थे जैसे काले सागर के मध्य रहने वाले उदयाचल पर उगे सूर्य की आभा बिखेर रहा हो। उस वक्ष ने पूर्ण देवत्व के भागी तीनों देवों के परशु चक्र और कुलिष (वज्र) की सच्ची शक्ति को निकम्मा बना दिया था। उसके वैभव की प्रशंसा के साथ ही सीता के लुटेरे के प्रति क्रोध भी केसरीनंदन के मन में आया। सोचा, अभी इसके दसों सिरों को मरोड़ दूं ...पर फिर राम की आज्ञा न होने से उन्होंने क्रोध पर नियंत्रण रखा । (वही, 316 )
असमिया रामायण माधवकंदली में भी रावण की सभा और उसके विशाल व्यक्तित्व से हनुमान अत्यंत प्रभावित होते हैं। कवि माधवदेव लिखते हैं-रावण की दिव्य सभा में दशग्रीव दिव्य सिंहासन पर बैठा हुआ था जो मंत्रीगणों और शस्त्र-अस्त्रधारी सेवकों से वैसे ही घिरा हुआ था जैसे धरती चार समुद्रों से घिरी हुई हो। उसे देखकर मारूति को अत्यंत विस्मय हुआ और वे मन ही मन सोचने लगे कि यदि रावण किसी से भय नहीं करता तो यह उचित ही है। सूर्य के तले इसके समान कोई सुखी नहीं है। विधि की किस छलना से इसने सीता का हरण किया है ? (मा.कं.4468-69)
बंगला रामायण कृतिवास के अनुसार रावण ने जब रथ पर आरोहण किया तो पवन भी डरकर मंद-मंद बहने लगा, रवि का प्रकाश भी धीमा पड़ गया और स्वर्ग के समस्त देवता सशंकित हो उठे। युद्धभूमि में पहली बार राम उसको देखकर कहते हैं - शतकोटि रवि शशि की किरणों से अधिक दीप्तिमय यह कौन है जो आज संग्राम में आया है? इस पर विभीषण कहता है- यह  त्रिभुवनविजयी मेरा अग्रज है। यह जिस रथ पर बैठा है वह ब्रह्मा का रथ है जिससे निकलती हुई किरणें कितनी प्रखर और सौंदर्य से युक्त हंै! इसके सिर पर देवता छत्र पकड़े खड़े हैं। यह सुन राम कहते हैं - लंका के योग्य राजा जैसा इसका रूपरंग है। लेकिन इसमें ऐसी कुबुद्धि क्यों आ गई कि देवकन्याओं को पकड़कर लाता है और परनारियों का अपहरण करता है?(कृ.रा.लं.कां. 129)
 रावण के समान उसकी स्वर्णनगरी लंका भी अपने वैभव, सौंदर्य और चारों ओर से सुरक्षित होने के कारण विख्यात थी। इसकी भव्यता का वर्णन भी कवियों ने खुले दिल से किया है। वाल्मीकि के अनुसार त्रिकूट पर्वत पर प्रतिष्ठित आकाश को छूती रावण की लंका किसी सौंदर्यमयी नारी की भांति सुंदर थी। हनुमान जब सीता की खोज में पहली बार लंका पहुंचे तो देखते ही रह गये थे इसका सौंदर्य। सोने की दीवारों से बना परकोटा, हीरों से जड़े सोने के प्रवेशद्वार, नीलम के चबूतरे, शानदार चमचमाती सड़कें और सतमंजिले शुभ्र भवन...ऐसा लगा मानो आकाश में तैर रही हो लंका! पूर्णिमा के चन्द्रमा ने इसके सौंदर्य को और भी द्विगुणित कर दिया था। लंका के सौंदर्य को देखकर हनुमान जहां अभिभूत थे वहीं उसे हर ओर से सुरक्षित देख वे चिंतित भी थे। पहले तो लंका के चारों ओर विशाल खाइयंा थी। फिर चारों ओर विशालकाय राक्षसों का कड़ा पहरा था। राक्षस पहरेदार भी सशक्त, सतर्क थे। विशेषकर सीता-हरण के बाद रावण ने सतर्कता बढ़ा दी थी। इतना ही नहीं मतवाले हाथियों और विशाल नागों को भी सुरक्षा हेतु प्रवेशद्वार पर रखा गया था। इस तरह लंका न केवल भव्य और सौंदर्ययुक्त थी, हर तरह से सुरक्षित भी थी।
कंबर ने भी हनुमान के द्वारा लंकेश्वर के साथ ही लंका की भव्यता का ख्ूाब वर्णन करवाया है। हनुमान रात्रि में लंका पहुंचे थे किंतु रत्नों और स्वर्ण के प्रकाश से दिन सा उजाला था। यह देख हनुमान सोचते हैं ...शायद तभी राक्षस निशाचर बन गये हैं! (कं.रा.सुं.कां.194) वहां के प्रासादों की दीवारें नाना मणियों से जडि़त थी जो नक्षत्रों के समान प्रकाश बिखेर रही थीं। स्थल-स्थल पर प्रकाश पूंजीभूत था। उनके बीच से जाते हुए हनुमान कभी लाल कभी काले तो कभी श्वेत वर्ण के हो जाते थे। (वही 197) रावण के महल में वैभव देख हनुमान न केवल चमत्कृत वरन दुखी भी हुए। उनका मन पिघल गया। मन में वे सोचते हैं-हंत ! इस विशाल नगरी की सारी श्री, सारा वैभव रावण के कारण मिट जाएंगे ...पाप और पुण्य दोनों के कर्म सभी पर समान रूप से अपना प्रभाव डालेंगे ही।(वही, 300)
 वाल्मीकि रामायण में स्वयं राम ने समुद्र पार करने के बाद जब पहली बार लंका को देखा तो बोल पड़े थे कि यह लंका तो अपनी ऊंचाई में आकाश में रेखा खींचती हुई सी जान पड़ती है। लगता है मानो पूर्वकाल में विश्वकर्मा ने अपने मन से ही इस पर्वतशिखर पर इस लंकापुरी का निर्माण किया है। यह अनेक सतमंजिले मकानों से भरी हुई है। फूलों से भरे हुए चैत्ररथ वन के सदृश्य जो सुंदर पक्षियों की चहचहाट व्याप्त है। यह पुरी अद्भुत है।
उडिय़ा रामायण वैदेही विलास में लंका को देखकर हनुमान कहते हैं- क्या किसी सुनार ने पृथ्वी देवी के लिये सोने का कंगन बनाया है? लंका की हाट में वणिकों की संपन्नता देखकर वे सोचते हैं-कहीं कुबेर ही तो नवनिधियां लिए स्थल-स्थल पर नहीं बैठा है? ( वै.वि.34.117)
यहां एक प्रश्न उठता है कि रावण का बल, पौरूष और तपस्या तथा वैदिक ज्ञान के बाद आखिर उसमें क्या कमी थी जो वह और उसकी हेमनगरी नष्ट हुई? मराठी कवि श्रीधर ने अपनी रामायण रामविजय में इसका सुंदर उत्तर दिया है। यहां हनुमान राम से लंका से लौटने के बाद कहते हैं कि लंका में भौतिक समृद्धि तो है किंतु भक्ति भी है। यहां करोड़ों शिव मंदिर है। राक्षस उसमें तीनों कालों में रूद्रपठन करते हैं और भोग चढ़ाते हैं। असुरों के समस्त घरों में अग्निहोत्र ओैर वेदाध्ययन होता है। रूद्राक्ष माला रूपी अलंकार और विभूति लगाते हैं। रावण ने वेदों को खण्डों में विभक्त किया है। स्थान-स्थान पर असुर तप का घोर आचरण कर रहे हैं (रा. वि. 22.71-74) हनुमान से यह सुन राम उद्विग्न हो जाते हैं। सोचते हैं, ऐसी लंका तो पुण्यपरायण है, यह मेरे द्वारा कदापि वश में नहीं की जा सकती। जहां ऐसे सत्कर्म का आचरण होता है वहां सफलता, कीर्ति और कल्याण होता है। तदन्तर वे हनुमान से पूछते हैं-क्या राक्षसगण प्रतिदिन ऐसे कर्म करते हैं जिसमें दया, क्षमा, शुद्धि, शांति, विरक्ति और धर्म बुद्धि हो? इस पर हनुमान कहते हैं कि ये सब तो लंका में अणुभर भी नहीं है। ये राक्षस परम अधर्मी तथा निर्दय हंै। कपटपूर्ण आचरण तथा उग्रतप करते हैं। ये अत्यंत खल, दुराचारी, मद्यप और उन्मत्त हैं। यह सुन राम मुस्कुरा देते हैं...तब तो मैं लंका को क्षण भर में वश में कर लूंगा। अंत:करण में क्षमा और दया न हो तो फिर व्रत और तप का क्या प्रयोजन ? ऐसा व्यक्ति भले ही छहों शास्त्र पढ़ चुका हो तो भी उसकी बड़बड़ाहट व्यर्थ है।(वही 22.75-83) यदि दया, क्षमा आदि गुण न हो तो वेदों का अध्ययन वैसे ही व्यर्थ है जैसे गधे पर चंदन डालना। छहों रसों में फिरते रहने पर भी कलछी जिस प्रकार रस से अनभिज्ञ व्यर्थ ही घूमती है वैसे ही पाखंडी व्यक्ति वेदों का अध्ययन करे तो उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया कीर्तन मानों बहेलिये का गायन है अथवा वह मद्यपी का व्यर्थ प्रलाप है। कौआ चूने को शरीर में हठपूर्वक मलकर भले राजहंस के समान हो जाए फिर भी वह विश्ठा ही खोजने जायेगा। (वही, 22.92-98)
अस्तु, स्वर्गोपम लंका के स्वामी और अद्भुत बल तथा शक्ति से संपन्न अजेय रावण के माथे पर सबसे बड़ी कालिख जो उसके कज्जल से काले भाल पर भी चमकती रहेगी, वह थी, असहाय सती सीता का अपहरण। जो सीता पति के साथ करीब 13 वर्षों से वनवास भुगत रही थी, अंतिम वर्ष में अपनों के बीच जाने के दिन की प्रसन्नतापूर्वक प्रतीक्षा कर रही थी, उसे पति और देवर से दूर कर वह बलात हर कर लाया था, वह भी एक साधुपुरूष का वेश धारण कर! किसी भी नारी का अपहरण, विशेषकर तब, जब वह अनिच्छुक हो, राजाओं के लिये भी कभी नहीं सराहा गया है। महाभारत में अर्जुन द्वारा सुभद्रा का, कृष्ण द्वारा रूक्मणि का अपहरण इसीलिये निंदनीय नहीं माना गया क्योंकि दोनों कन्याओं की इसमें सहमति छिपी थी। भीष्म द्वारा अंबा, अंबिका, अंबालिका का अपहरण भी क्षम्य था बशर्ते कि अपहरण के बाद भीष्म अंबा से विवाह करते। यद्यपि भीष्म ने अंबा को उसके पूर्वप्रेमी के पास भेज कर एक उदाहरण ही प्रस्तुत किया था। अब उन्हें क्या मालूम था कि अंबा का पूर्वप्रेमी उसे ठुकरा देगा! फिर भी इस अपहरण के लिये भीष्म भी कहीं न कहीं निंदित हुए थे। केवल निंदित ही नहीं अभिशप्त भी हुए थे ...अगले जन्म में शिखंडी बनी अंबा के हाथों मरने के लिये! जयद्रथ द्वारा पांडवों के वनवास काल में द्रौपदी का अपहरण भी जघन्य कार्य था। दयालु युधिष्ठिर के यह कहने से कि यह हमारी बहन दु:शला का पति है, किसी तरह उसके प्राण बचे थे किंतु दासता का चिन्ह उसे अपने सिर पर वहन करना पड़ा था। वस्तुत: इसी घटना से विचलित युधिष्ठिर मार्कण्डेय मुनि पूछते हैं कि मेरे समान कोई अभागा है जिसे इतने कष्ट सहने पड़े हों... और तभी मुनि उन्हें राम की कथा सुनाते हैं। महाभारत के वनपर्व में रामोपख्यान इसी संदर्भ में प्रस्तुत हुआ है।
रावणवध- जिस तरह महाभारत में दुर्योधन को उसकी माता गंाधारी, चाचा विदुर तथा पितामह गुरूजन आदि बार-बार पंाडवों से संधि करने कहते हैं उसी तरह लंकायुद्ध के पूर्व रावण को उसकी माता, भ्राता, नाना, पत्नी, पुत्र प्रहस्त तथा कुछ मंत्रीगण सीता को सादर लौटा कर राम से क्षमा मांगने कहते हैं। किंतु रावण ने किसी की न सुनी और अंतत: युद्ध हुआ। इस युद्ध में अपने अनेकानेक प्रियजनों को खोने के बाद रावण युद्धभूमि में आया। रावण रथी था जबकि राम विरथ थे अत: हनुमान ने स्वयं झुककर राम से आग्रह किया कि वे उनकी पीठ पर चढ़कर युद्ध करें। तब रावण ने चालाकी से काम लिया...पहले उसने हनुमान को घायल करने का प्रयत्न किया क्योंकि हनुमान का पराक्रम वह देख चुका था...संभवत: उसे लगा कि इस जीवित-रथ के रहते उसके लिये राम से लोहा लेना सुगम न होगा किंतु यह उसका भ्रम था...उसके बाणों से हनुमान मानों और भी शक्तिमान हो उठे। उधर राम के बाणों ने उसे ऐसे विचलित किया कि उसके प्राणों पर संकट के बादल मंडराने लगे। राम चाहते तो इस समय उसे मार सकते थे किंतु उसकी दयनीय स्थिति देखकर राम को उस पर और अधिक बाण चलाकर मौत की नींद सुलाना अच्छा नहीं लगा...और उन्होंने उसे अभय देते हुए कहा...मैं जानता हूं कि तू युद्ध से पीडि़त है इसलिए आज्ञा देता हूं कि प्रविष्य रात्रिंचरराज लंकाम्, जा लंका में प्रवेश कर कुछ देर विश्राम कर...फिर रथ और धनुष के साथ निकलना।
दूसरे दिन रावण के वध हेतु राम दृढ़ निश्चय के साथ रणभूमि में जाते हैं। किंतु उन्हें रावण के विशाल रथ के सामने विरथ जाते देख देवगण चिंतित होते हैं...और तब इन्द्रदेव अपने हरे रंग के घोड़ों से जुते दिव्य रथ को मातलि सारथी के साथ राम की सेवा में भेजते हैं। वैसे काले रंग के घोड़ों वाला रावण का रथ भी भव्यता में इन्द्र-रथ से कम नहीं था...और फिर राम-रावण में निर्णायक द्वैरथ युद्ध प्रारंभ होता है। होने को तो अन्य सभी राक्षसों और वानरों के हाथों में अस्त्रशस्त्र थे किंतु राम का दिव्य रथ आने के बाद सब के सब अचानक जैसे निश्चेष्ट हो गये। वाल्मीकि यहां सुंदर बात कहते हैं- उभय पक्ष की सेनाएं मानों चित्रलिखित सी खड़ी हो गई और आंखें फाड़कर इस द्वैरथ युद्ध को देखने लगी। अब राम इस विश्वास से युद्धक्षेत्र में थे कि मेरी जीत होगी जबकि रावण समझ गया था कि मुझे मरना होगा अत: मैं पूरा पराक्रम प्रगट करूंगा। (वा.रा.यु.कंा.107.5-6)
और फिर दोनों ओर से अद्भुत अस्त्रों और शस्त्रों की वर्षा होने लगी। इस युद्ध को आकाश से देखने वाले ऋषिगण, देवगण आदि रोमांचित हो कहने लगे- आकाश आकाश के तुल्य है, समुद्र समुद्र के तुल्य है और राम रावण का युद्ध राम रावण के ही तुल्य है...अर्थात्  यह युद्ध अतुलनीय है।
युद्ध में राम को पराजित न होते देख रावण ने राम के इन्द्र-प्रदत्त रथ के घोड़ों पर और सारथि मातलि पर भी भयानक अस्त्र चलाये ताकि राम को विरथ कर दें किंतु इसमें वह सफल नहीं हुआ। हां, इससे राम और क्रोधित हो उठे और उन्होंने एक विषधर सर्प के समान बाण का संधान कर रावण का जगमगाते कुंडलों से युक्त गर्वीला मस्तक काट डाला, जो धरती पर गिर पड़ा...किंतु अचानक जैसे चमत्कार हुआ! रावण के धड़ पर एक नया मस्तक उग आया! राम ने शीघ्रतापूर्वक उसे भी काट डाला किंतु यह क्रम रूका नहीं...एक के बाद एक युद्ध भूमि में रावण के सिर ढुलकते रहे और नये सिर मस्तक पर उगते रहे!
तुलसी यहां लिखते हैं- जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार। सेवत विषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार।। (मानस, लं.कां, 92 )अर्थात्, जैसे जैसे प्रभु उसके सिरों को काटते हैं वैसे वैसे वे अपार होते जाते हैं जैसे कि विषयों का सेवन करने से काम दिन प्रतिदिन बढ़ता जाता है।
 इस तरह लंकेश के सौ सिरों को राम ने काटा, पर वह था कि मरने का नाम ही नहीं ले रहा था। तुलसी के अनुसार यह राम का कौतुक था- पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा। अति कौतुकी कोसलाधीसा।। किंतु वाल्मीकि के राम यहां सोच में पड़ गये कि कैसे इसका अंत होगा?  क्षण भर के लिये उन्हें अपने आप पर संदेह होने लगा कि जिन बाणों ने मारीच , खरदूषण तथा बाली के प्राण लिये वे कुंद तो नहीं हो गये ? राम ने शरवर्षा कर रावण की पूरी छाती भर दी पर रावण अमर सा अनाहत ही युद्ध करते रहा। सारे दिन सारी रात राम-रावण का युद्ध चलते रहा। तब मातलि ने राम को सुझाया कि वे अनजान न बने...इस राक्षस के अंत का समय आ गया है। इस पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कीजिये।    
 तब राम ने ब्रह्मा के उस बाण का संधान किया जिसके वेग में वायु की, धार में अग्नि और सूर्य की, शरीर में आकाश की तथा भारीपन में मेरू और मंदराचल की प्रतिष्ठा की गई थी। वह संपूर्ण भूतों के तेज से बनाया गया था उसमें सूर्य के समान ज्योति निकलती थी। उसका सारा शरीर नाना प्रकार के रक्त में नहाया हुआ और चर्बी से परिपुष्ट हुआ था। राम ने जैसे ही उसे संधान किया सारे प्राणी थर्रा उठे, धरती डोलने लगी...और उस बाण ने वायुवेग से चलते हुए सीधे रावण की छाती में प्रवेश किया और क्षण भर बाद ही रावण के खून में रंगा वह राम-बाण रावण के प्राण हर कर एक विनीत सेवक के समान राम के पास वापस पहुंच गया!
और इस तरह इतिहास का एक दुर्दांत राक्षस, जिसे अपने बल पर, अपनी स्वर्ण नगरी पर, अत्यधिक घमंड था, अपनी ही धरती पर ढुलक गया ! इसी के साथ ही रणभूमि में एक नया नजारा दिखाई देने लगा। अब तक चित्रलिखित सी विस्मित खड़ी दोनों ओर की सेनाओं में एकदम हलचल मच गई। राक्षससेना जहां प्राण बचाने के लिये भयभीत हो लंका की ओर भागने लगी वहीं वानरसेना विजय से शोभायुक्त हो हर्ष-पूर्वक जयनाद करते हुए राक्षसों की सेना पर टूट पड़ी। राम-पक्ष ही नहीं समूचा आकाश, चारों दिशाएं भी प्रसन्न हो प्रकाशित हो गईं। और देवगण! वे बेचारे तो जाने कब से इस क्षण की प्रतीक्षा में थे। दुंदुभी बजाते हुए राम की स्तुति करते हुए आकाश से फूलों की वर्षा करने लगे!
काश रावण देख पाता अपने खंडित मृत शरीर को! कहां था उसका वह हृदय जो सीता के लिये धड़कता था? वह भी मुर्दा पड़ा था, कहीं नहीं थी अब वहां सीता! मानस में तुलसी ने रावण के जल्दी न मरने का सुंदर कारण बताया है। प्रसंग है कि त्रिजटा जब सीता को युद्ध का समाचार देती हुई बताती है कि कैसे रावण का एक सिर काटने पर नया सिर आ जाता है तब सीता दुखी हो कहती है कि केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता।।  किंतु यह कैसे संभव है कि राम उसका सिर काट रहे हैं फिर भी वह नहीं मर रहा है? इस पर त्रिजटा कहती है - प्रभु का बाण इसके हृदय में नहीं लग रहा है इसलिये यह नहीं मर रहा है। उर सर लागत मरहि सुरारी।। पर प्रभु उसके हृदय को अपने बाणों का लक्ष्य क्यों नहीं बनाते? तब त्रिजटा राम की दुविधा बताती है -
एहि के हृदय बस जानकी
 जानकी  उर मम बास है ।
मम उदर भुअन अनेक लागत
बान सब कर नास है।। (मानस, लंका कांड, 92 ) इसके हृदय में जानकी का निवास है और जानकी के हृदय में मेरा निवास है और मेरे उर में अनेक भुवन हैं। अत: रावण के हृदय में बाण लगते ही सब भुवनों का नाश हो जायेगा इसीलिये प्रभु उसके हृदय को लक्ष्य नहीं कर रहे हैं । आगे त्रिजटा सीता को दिलासा देती है -
काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान ।
तब रावनहि हृदय महुं मरिहहिं रामु सुजान।। (वही ,99)
अर्थात् बार-बार सिर कटने से व्याकुल हो रावण तुम्हारा ध्यान छोड़ देगा तब राम उसके हृदय में बाण मारेंगे और इस तरह वह मरेगा।
मानस में यह भी उल्लेख है कि रावण की भुजाएं और सिर जब बार-बार काटे जाने पर भी फिर उग आते हैं तब राम विभीषण की ओर देखते हैं मानों उसकी प्रीति की परीक्षा ले रहे हों। इस पर विभीषण कहते हैं -नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें।।
अर्थात् इसी नाभि में एक अमृत कुंड है, इसलिये यह मर नहीं रहा है। तब राम एक साथ इक्तीस बाण छोड़ते हैं जो कालसर्प के समान चलते हैं। इक्तीस बाण में दस बाण दस सिरों को, बीस बाण बीस भुजाओं को काटते हैं और एक नाभि में घुसकर उसमें स्थित अमृत को सोख लेता है। तब दसों सिर और बीसों भुजाओं से हीन उसका विशाल धड़ धरती पर मानों नाचने लगता है।
  सायक एक नाभि सर सोशा। अपर लगे भुज सिर करि रोशा।।
 लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रूंड महि नाचा।। (वही, 103.1)
किंतु अभी भी वह पापी मरा नहीं था। धरती को धंसाते हुए उसका केवल धड़ ही राम की ओर दौड़ता है। तब राम धड़ के भी दो टुकड़े कर देते हैं ...और इस तरह वह आततायी अंतत: पृथ्वी को कंपित करते हुए धराशायी होता है। यह दिन चैत माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का था।
- लेखिका सेवानिवृत प्राचार्य हैं एवं वर्तमान में भारत सरकार के संस्कृति विभाग की सीनियर फैलोशिप के अंतर्गत रामायण पर शोधकार्य कर रही हैं।