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Monday 20 Nov 2017

हस्तक्षेप

 

प्रदीप मिश्र दिव्यांश

72, सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा रोड,
डाक सुदामानगर
 इन्दौर  452009, मप्र
 मो.919425314126

हस्तक्षेप
अंधेरी रात को भोर कहा जा रहा है
जंगल को विकसित नगर
मक्तल को हरे चारे का बाड़ा
नाले को हरहराती नदी

मैं सच कह रहा हूँ
जिस वक्त को सुबह घोषित किया गया है
और आप निकल रहे हैं सैर पर
वह आधी रात का वक्त है

जलते हुए लट्टू बेहतरीन विकल्प हैं सूर्य के
पेड़, पौधे, फूल और बाग-बगीचे
बैठकों और कार्यालयों में सजावट की चीजें  
कम्प्यूटर के स्क्रीन पर चमकती
सोलह मिलियन रंगोंवाली बहुरंगी दुनिया में
आप सबका रंगरंगीला घर है
खेत की फसलों से ज्यादा फायदेमंद
कांक्रीटों की सुदर्शन संरचनाएं हैं
जंगल आदिवासी किसान और भुखमरे
इस प्रगतिशील समय के चेहरे पर दाग हैं
इनको नष्ट हो जाना चाहिए
आप इन मुद्दों के सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर चुके हैं

अब कोई सिरफिरा पूछ ले
बिजली गुल होते ही इस सूर्य के विकल्प का क्या होगा
कम्प्यूटर में वायरस लग जाएगा तब कैसी लगेगी आपकी बहुरंगी दुनिया
आपकी भूख से किस तरह पेश आएंगे कांक्रीट
जंगल नहीं होंगें तो कटेगा कौन
आदिवासी नहीं होंगें तो विकास के पैमाने का क्या होगा
किसान नहीं होंगें तो आत्महत्या कौन करेगा
भुखमरी नहीं होंगें तो किस के नाम पर मचेगी लूट

तो अकबका जाएंगे आप
कलम उठाएंगे अपना हस्ताक्षर काटने के लिए
लेकिन एक और हस्ताक्षर हो जाएगा
क्योंकि कलम अब लिखने के काम नहीं आती

हमारे समय के सूत्र वाक्य हैं
एक सच्चा देशभक्त दर्शकभर होता है
एक सच्चा नागरिक कभी सवाल नहीं करता
एक सच्चे मनुष्य की नियति खटने और मरने की है

जो जैसा चल रहा है चलने दें
आपका एक हस्तक्षेप देश को वर्षों पीछे ढकेल देगा।

इसे धमकी की तरह पढ़ा जाए

मैं संतरी हूँ, मुलाजिम हूँ, अर्दली हूँ, मजदूर हूँ,
नौकर हूँ, सिपाही हूँ, सैनिक हूँ, नागरिक हूँ
मैं कौन हूँ
मैं खेत हूँ, खलिहान हूँ, फसल हूँ, कर्ज हूँ
मैं कौन हूँ
मैं भीड़ हूँ,् सभा हूँ, विधान हूँ, राज्य हूँ,  देश हूँ
मैं कौन हूँ
मैं लस्त हूँ, पस्त हूँ, त्रस्त हूँ, अभ्यस्त हूँ
मैं कौन हूँ
मैं ठोकर हूँ, लताड़ हूँ, फटकार हूँ, दुत्कार हूँ
मैं कौन हूँ
मैं खामोश हूँ, गुमसुम हूँ, स्तब्ध हूँ
मैं कौन हूँ
ठहरो बताता हूँ, मैं कौन हूँ
मैं विवेक हूँ, उम्मीद हूँ, अजोर हूँ, हुँकार हूँ
मैं समय की रगों में बहता हुआ लहू हूँ
मैं पांच तत्वों से बना शरीर हूँ
मेरे अंदर बसी है पूरी प्रकृति
मैं बसा हुआ हूँ प्रकृति में
माननीय से लेकर महामहिम तक के शब्दों
को दिया है मैंने ही जीवन
जब तक मैं दर्शक हूँ
कुछ नहीं हूँ
जिस दिन आवाज में बदल जाऊँगा
सब कुछ हूँ मैं
जब तक मैं सब कुछ हूँ
तभी तक बचा है यह लोक का महातंत्र
इसे धमकी की तरह से पढ़ा जाए
कि सब कुछ हूँ मैं ।

यह शोर बहरा कर देगा

समय-समय की बात है
एक समय में सच-सच होता था
और झूठ झूठ

फिर झूठ सच में बदलने लगा
और सच झूठ में

यहाँ तक तो समझ में आती थी
सच और झूठ की जुगलबंदी

जबकि सब जानते थे
झूठ कभी पूरा झूठ नहीं होता
सच कभी भी पूरा सच नहीं

काल-काल की बात है
हम सब मनुष्य थे
स्नेह से ओत-प्रोत
इतने निश्छल और पारदर्शी कि
सुख-दु:ख आर-पार होते रहते थे
और हम यथावत

फिर मनुष्यों में कुछ अति मनुष्य
कुछ महा मनुष्य
और कुछ सिर्फ मनुष्य रह गए
इनके स्नेह हो गए अलग-अलग
इनकी निश्छलता भाप बनकर उड़ गयी
और अंदर इतनी धुंध भर गयी
कि कुछ भी पारदर्शी नहीं रहा
दु:ख कुछ मनुष्यों के अंदर स्थाई रूप से बस गया
और सुख कुछ लोगों का गुलाम हो गया
सबको पता है कि
दु:ख कभी भी स्थाई रूप से नहीं बसता
और सुख तो कहीं बस ही नहीं सकता
युग-युग की बात है
एक युग में प्रकृति प्रधान थी
एक में धर्म
एक में विज्ञान प्रधान हुआ
और इस युग में बाजार
सबको पता है कि
बाजार हर युग में प्रधान रहा है
जिसमें प्रकृति-धर्म-विज्ञान
चाकरों की तरह डोलते रहते हैं
यह हमारे समय की बात है
जब काल और युग क्षण में बदल गए हैं
प्रकृति-धर्म-विज्ञान-दु:ख-सुख-सच-झूठ
इनको दर किनार कर दिया गया है
खेत बेमानी हो गए हैं
और उद्योग अगरा रहे हैं
चारों तरफ  हो रही है गर्जना
उत्पाद-उत्पादन और उपभोक्ता
सबको पता है
भले ही
पहने हों ईयर प्लग
यह शोर बहरा कर देगा।