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Saturday 25 Nov 2017

जेठ की धूप

 

रविशंकर सिंह
रानीगंज मारवाड़ी सनातन विद्यालय
पोस्ट- रानीगंज,
 जिला- वर्धमान
(प.बं.) 713347
मो. 09434390419

जेठ की धूप
तुम जलो जेठ की धूप,
मैं खिलूंगा-
शिरीष, अमलतास और कचनार की तरह।
मैं नहीं हूं,
बसंत का गुलाब।
तुम साध लो,
अपनी विषबुझी किरणों के बाण।
अवनी से नहीं,
अंबर से रस खींच लूंगा मैं।
घनेरी पत्तियों को,
रंगीन फूलों को,
सींच दूंगा मैं।
हर लूंगा मैं-
ढोर-डांगर,
चिरैई-चुनमुन,
मनई के ताप।
तुम जलो जेठ की धूप।

अतीत के गलियारे

रात्रि के तीसरे प्रहर
नींद उचट जाती है अक्सर
मन अथाह सन्नाटे से घिर जाता है
झींगुरों की शहनाई
मुझे खींच ले जाती है
कोसों-कोसों दूर
अतीत के गलियारों में
छूटा हुआ गांव
हरे-भरे खेत
बलखाती नदियां
पोखर में तैरते पुरईन के पात
पूरा-का-पूरा परिदृश्य
उभर आता है
आंखों में
जैसे तालाब के ठहरे जल में चांद।

डगमगाते पैरों को
सहारा देने वाले हाथ,
बढ़ावा देने वाली आवाजें
दिलासा देने वाले गीत
मिसरी और तुलसी की प्रसादी
होरहा और भुट्टे का स्वाद
बिरहा और फगुआ का राग
प्रियजनों का संग-साथ
सब कुछ याद आता है।
याद आता है कि एक रोशनी थी
जो बुझ गई
जैसे मुंडेर पर बैठी हुई चिडिय़ा
अभी-अभी उड़ गई।

मसूरी

शिशु की मानिन्द
सोया है
पहाड़ी शहर,
तारे खचित
आसमानी चादर ओढ़कर।
घरों से झांकती
लाल, पीली, नीली रोशनी
जैसे परियों के लिए
रखीं हों
'पहाड़ पर लालटेन।Ó
पर्वत की कोर काटकर
बनी ऊंची-नीची सड़कें
भागती गाडिय़ों में
मुसाफिरों की
थम जाती हैं सांसें,
गहरी खाई देखकर।
यहां ठंड का एहसास
कितना गुलाबी लगता है।
गाडिय़ों के समानान्तर दौड़ लगाते
भूरे पहाड़ी बच्चे-बच्चियां,
हाथों के लिए
बुरांस के लाल फूलों का गुच्छा
खरीद लेने का इसरार करते हैं-
'गले को तर करनेवाला
पौष्टिक शर्बत
बनता है इससे।Ó
पर्वत श्रेणियों पर
चीड़ और देवदार,
दूध-सी धवल
जल-धाराएं
देखने
यहां आते हैं सैलानी
वर्ष भर,
विचरते हैं
आठों प्रहर।
सीजन में यहां
दोगुनी हो जाती है
हर चीज की कीमत।
टोपी, जूता,
बास छोड़ती पोशाक पहने
बताता है 'पीट्ठूÓ-
सीजन का इंतजार रहता है हमें,
उसी कमाई से
गुजर जाता है पूरा वर्ष।
शराब थोड़ी महंगी है यहां,
बताता है रिक्शेवाला।
जीवट और खुशमिजाज लोग,
किन्नर-किन्नरियों जैसे आभावाले
युवक-युवतियां,
पहाड़ी मैना के गीत,
झरनों का संगीत,
मनभावन परिदृश्य
इस भूमि के वैभव हैं।
यही है गुरु द्रोणाचार्य की तपोभूमि,
अपने अहंकारी मित्र द्रुपद को
सबक सिखाने
धनुर्धर अर्जुन की तलाश में
इंद्रप्रस्थ की ओर यहीं से
प्रस्थान किया था उन्होंने।
शायद यहीं शिला बनकर
पड़ा होगा
एकलव्य का रक्त-रंजित अंगूठा।
यहां है
आदिकवि वाल्मीकि का मंदिर,
रहा होगा
यहां से उनका
कोई-न-कोई रिश्ता।
शायद यहीं देखा होगा उन्होंने-
मैथुनरत क्रौंच का एकाकी विलाप,
विकल हो गई होगी
ऋषि की आत्मा,
फूट पड़ी होगी
पहली कविता की मंदाकिनी।
रात्रि के सन्नाटे में
झींगुरों की शहनाई,
नल से टपकते
पानी की बूंदों की टप-टप,
बहुत साफ सुनाई देती है यहां।
हवा के हिंडोले पर हिलती
चीड़ की टहनियां-
अभिनंदन करती हैं
आगन्तुकों का
विदाई के वक्त
अपनी झालरनुमा
बारीक ऊंगलियां
हिलाकर कहती हैं-
'फिर आना मसूरी।Ó