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Friday 24 Nov 2017

बच्चे और वयस्क

बच्चे और वयस्क

बच्चे स्नेह-सागर हैं,
जो निकट जाता है उनके
वे देते हैं अनमोल हंसी
नन्हीं-नन्हीं अंजुरियों से
मणियों सा उलीच देते हैं
भाग-दौड़ की इस दुनिया में
जब तनाव ही तनाव हो
बच्चों की खिल-खिल हंसी
गुदगुदाती है तन-मन को
वयस्क हो जाने पर वे
मृगतृष्णा के शिकार होते हैं
उनका स्नेह प्रदर्शित होता है
अवसरानुकूल नाप तौल कर
कभी हंसी फंसती दाँतों में
कभी होती एक इंच लम्बी
उनका दिल संकुचित होता है
अगर वे रत्नगर्भा बन जाएं
न खींचे दीवार घरों में
न देवालयों में हो रक्तपात
न पैदा हो देश में देश
दुनिया बन जाए परिवार।

अनीति जिधर है, उधर विजय है

विद्योत्तमा थी
बुद्धिमती, ज्ञानवती,
गर्व था उसे वैदुश्य का
शौक़ था शास्त्रार्थ का
खेल था चुनौतियों का
उसने की थी घोषणा -
पराजित करेगा, उसे
जो शास्त्रार्थ में
बनेगी, उसी की वह
परम्परागत थी कामना
वह है श्रेष्ठ तो
चाहिए पति श्रेष्ठतर,
शुरु हुआ था शास्त्रार्थ
मन्द से मध्य, मध्य से
तीव्र, फिर तीव्रतर गति में
उत्तेजनाओं के आवेष में
अहंकारी पंडित-गण
पराजित हुए थे एक-एक कर
असह्य था उन्हें वह क्षण
अपमानित थी पुरुष-जाति,
प्रतिकार से प्रेरित
वे रचते हैं षड्यन्त्र
महाभारत के चक्रव्यूह की तरह
मौन-मुखरता के पाखण्ड से
ठगी जाती है विद्योत्तमा
एक मूर्खाधिराज से
ब्याही जाती है विद्योत्तमा,
खतरनाक होता है
अनीतियों का गठबन्धन
त्रासद है यह तथ्य
अनीति जिधर है
उधर विजय है।