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Sunday 21 Oct 2018

आदमी


शशिकला त्रिपाठी
बी 31। 41, ए-एस भोगाबीर, संकटमोचन, वाराणसी, 221005
मो.9936439963
आदमी
हो गया है जिद्दी
बच्चों से ज़्यादा
भौतिकता की होड़ में
चन्द्रखिलौना लेने के लिए
लोट जाता है बाजार में
और कभी वह
लूट लेता है बाजार को ही
पहुँचता है फिर जेल में
भुगतता है सजा
सलाखों के पीछे।

अतीत, नहीं हो सकता भविष्य

महानगर से दुनिया के
अंतिम छोर तक
उठाती है डोर उच्चाकांक्षा की
उड़ता है पतंग सा लगातार,
डोरी के रिश्ते को नकारता
बनाता है नये-नये रिश्ते
अतीत, होता नहीं मृत
जब कभी झाँकता है वह
वर्तमान के गवाक्ष में
भावुक हो उठता वह
स्मरण करता है उन्हें
न्योछावर हुए जो उस पर
कर्ज से उनकी झुकी कमर
रेहन पर खेत का रखना
फिर आँसू पी कर रहना
सोंधी रोटी और साग के साथ

याद आते हैं बचपन के साथी
आम का बाग, खुला मैदान
लुका-छिपी और भागम-भाग
स्मृति क्षणों के पटाक्षेप पर
मध्यांतर समाप्त होता है
भावुक मन झरता झरने सा
अतीत फिसलता है रेत सा
लंबी सांसें लेता कहता वह
अतीत नहीं हो सकता भविष्य