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Friday 17 Nov 2017

समय तुम संत हो क्या

 

स्वर्णलता ठन्ना
84, गुलमोहर कालोनी,  रतलाम मप्र 457001, मो. 9039476881
गरजती लहरों के साथ
उठता है ज्वार
समुद्र के सीने में
उछलती लहरें
निगल जाती है
सुरम्य तटों की मोहकता
सहम जाती है
पूर्ण चंद्र युक्त शर्वरी
किन्तु सूर्योदय
लौटा लाता है फिर से
सागर को अपनी परिधि में
किन्तु तुम तब भी
बने रहते हो स्थिर।

कड़कड़ाती दामिनी से
रात की अंधेरी खोह में
डरी सहमी धरा झेलती है  
बादलों की बौछारों को
और छँटते ही बादल
इंद्र की सप्तरंगी पगड़ी को
सूखते देखकर भी
तुम बने रहते हो शांत।

लील जाती है धरती
अपने क्रोध में
मृत्यु का जबड़ा खोल
अनेकानेक मानवों को
त्रासदियों के साथ
हो जाता है वीरान
धरती का कोई सब्ज बाग
तब भी तुम बने रहते हो
हमेशा की तरह
शांत, स्थिर और
अपने कार्य में दत्तचित्त
समय!
तुम नहीं भींगने देते
अपनी पलकों की कोरों को
नहीं उठने देते हृदय से
कोई आह।

लोग तुम्हें कैसे-कैसे
उपमान देते हैं
घावों का मरहम,
परिवर्तन का नियंता,
और निठल्लों को धूल चटाता
एक पाबंद शिक्षक
कितनी अहम भूमिकाएं निभाते हो
फिर भी नहीं है कोई अभिमान
ओह समय !
तुम संत हो क्या