Monthly Magzine
Wednesday 23 Jan 2019

नेवता

 देवेन्द्र सिंह
देवगिरि, आदमपुर घाट मोड़
भागलपुर- 812001 (बिहार)
मो. 08084432701
सुख तो थोड़े ही बचे हैं जीवन में
जो हैं उनके साथ ही जीना है
उनमें से एक है
पौ फटती वेला
आंगन में खड़े हो भोर को देखना
गो नहीं है भोर अब वही
जो कभी हुआ करती थी सुंदर अपरूप
चहुं दिस फैले पेड़ों-हरियालियों
आलोक-तिमिर रंजित आकाश
की आभा से दीपित
हो गई है हाय अब कैसी बदरूप!

अलग-अलग डिजाइनों में कटे
कागज की कतरनों-सा आकाश
हवा की डोरी पर डोलता-सा लगता है
आभा सारी पेड़ों-हरियालियों की
सोख ली है रेत-सीमेंट-ईंट-कंक्रीट ने
चौतरफ ा उग आया है
जंगल पाषाण का

थोड़ी-सी हरियाली संजोकर रखी है
मैंने अपने आंगन में
फूल हैं पौधे हैं झाड़-लताएं हैं
कहते हैं सब मूरख हूं मैं
हां सच है मैं तो हूं मूरख जनम का
और अब तय है मरूंगा मूरख ही

उतरते ही सांझ खिल जाती है संझा
रंग-रंग के फूलों से
भोर तलक रहती ढकमोर
मुक्त हस्त बांटती
मादक महक परिवेश में
उस मद में मातती डोलती रात
पिघलती रहती आकाश की बाहों में

आओ मित्रों मैं नेवता पठाता हूं
महकती रात से भीगती भोर तक
बैठ मेरे आंगन में
पढ़ो सुनो जी भर के कविता
कौन जाने आंगन यह
रहे न रहे मेरा कल
उग आए इसमें भी पाहनी जंगल
उजड़ जाएं फूल
मर जाए हरीतिमा!