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Sunday 19 Nov 2017

खिसक गई जमीन

खिसक गई जमीन
मेरे पैरों के ठीक नीचे थी वह जमीन
जहां करीब 25 वर्ष पहले घने-घने पत्तों को
थपथपाती थी अषाढ़ की बारिश में
भारी पैरों वाली हवा
मीठा पानी रिसता लगातार
रिश्ता बनाए हुए
माटी का जीवन से

आज जहां गड़ी हैं, मैल उगलती चिमनियां
वहीं पर लहलहाती थी धान की हरी बालियां
जहां बहते थे पानी के सोते
आज वहां पसरा है गटरों का अवशिष्ट

किसी भी नाले का नाम हो सकता है गंगा
किसी भी गटर को कहा जा सकता है यमुना
नाले का पीते पानी घूमते वातानुकूलित कारों में
हमें लगता है फायदे का सौदा
जैसे कर ली हो दुनिया फतह

आज मौसम का, मिट्टी का, नदी और पहाड़ का
अपना नाम नहीं है
बचे रह गए हरे पेड़ जाने जाते हैं उत्पादों से
माचिस की तीली वाला पेड़ तो
रेल के स्लीपर वाला पेड़
दुनिया में नहीं बचे हैं बीज
सुगंध और स्वाद के
संगीत और संबंध के
पक्षी और पड़ोसी के
न जाने कब से निजी हो गए बीज
सजावट बन गए दुकान के
उत्पाद हैं रिश्तों के
वृक्ष और बातों के
कब खिसक गई वह ज मीन
हमारे पैरों के नीचे से
किसलयी विहान

उड़ी चली जाती बया
दबाए चोंच में आकाश
चार बजे भोर में
पूरब की ओर से

सुगंध रहा बिखेर भौंरा
नन्हें-नन्हें पैरों से अपने
मानो फैलाता खाद फावड़े से
बचा रहा हो पृथ्वी की उर्वरता
किसलयों के खुल रहे पर्णरन्ध्रों में
प्राण भर रही थी हवा अनायास
उतारती किरणों को दिनकर से

दौड़ती नदियां बकरियां-सी
रंगों के शिखर से
गदगद धरती हो रही थी
अंकुरण की छुअन से

आंख मिचियाते चार बजे भोर में
ओझल होते पेड़ों से
बगुलों की पांतों से
तारे जाते पाठशाला
कर विदा उन्हें, लिए पितृत्व बोझ
खेत चला गया सूरज
जा लगा आंखों में काजल-सा
सपनों की किसलयी विहान लिए
महुए की गंध से तनी हुई वितान में
जीतने एक पूरा दिन
चल पड़ी दो रोटियां बंधकर मिर्च की हरी किनारी वाली गठरी में
तह में छिपाए अकूत हौसला
अपने सूरज के स्वागत में।