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Monday 20 Nov 2017

रिश्ते रस्म हो गए

 

अशोक शाह
डीएक्स-बी-2,
चार ईमली,  
भोपाल-462016
अजी सुनती हो, कमाल की मां
वैसे भी क्या बदला
समय का तूफान कई बार गुजरा
अभी-अभी बाहर झांककर देखा-
फिर से तारे डूब रहे हैं
उठ रहे पुष्प खिलने
सूरज राज के स्वागत में।

कुछ नहीं बदला
बस इतना कि जिस मैदान में
कल घास चरती थी ललकी गाय
वहां आज मैं गोल्फ खेलता हूं
भूख मिटाने की जुगाड़ में जो पगडंडियां
धान के खेत तक पहुंचाती थीं
अब उन्हीं पर टहलते
भूख खोजता हूं।

चन्दामामा के साथ खेलता बेझिझक
निकलने का रास्ता था
पूरे पन्द्रह दिन इंतजार
अब वहीं बनाना चाहता हूं
एक मकान बेमिसाल

गंगा मइया में नहाते लगाता था डाल्फिनों से होड़
सिसक-सिसक कर रिसता है पानी
उस पर बने विशाल बांध से
पहले रमता जोगी बहता था पानी
अब पलता रोगी बजबजाता पानी

भूख थी बस एक जोगन
जो बन गई है घाट-घाट की धोबन
खाली पेट से पहले दौड़ते थे चूहे
आज पेट भरा और बड़ा है
पर दिल पर सांप लोटता है।

'पाटे की भूंईÓ वाले खेत के कोने खड़ा
पेड़ से भी रिश्ता बदल गया
हम उसकी डालों पर
'ओल्हा पातीÓ खेलते थे
जिसका बनता था गवाह
जेठ का महीना
उसकी लकड़ी पलंग में ठुकी है
जिसको खाता रहता है ताड़ा

सुनो कमाल की मां
जिस स्कूल में पढ़ा करता था
वहां पढ़ा लेता हूं
पर वह रोमांच नहीं है
एक श्रद्धा थी परदे के पीछे रखी चीजों पर
वह परदा ही नदारद है

'सरल काकाÓ खेत थे, खलिहान थे
गाय गोरू मवेशी जंगल जहान थे
पूस की रात थे जेठ की दुपहरिया
भादो की बारिश में धान के पौधों से
होते दो चार थे
अब देखो उनका चेहरा कितना स$ख्त
जब से रहने लगे ईंट के मकान में

जिन रास्तों पर घूमते थे दोस्तों के साथ
उन पर चलते अजनबी-सा होता अब एहसास
न जाने सारे रिश्ते जिन्दगी के
कब रस्म हो गए
जो सबसे मीठे थे अनुभव
दिल के गहरे जख्म हो गए
ईनार की जगती पर गूंजती
कजरी झूमर सोहर
जब अपलोड करती थी गगरी भर पानी
अब डाउनलोड करती हैं बॉलीवुड
उसी जगह पर बने इंटरनेट कै$फे से

देखो कमली के बापू
दुनिया तवे पर पकती रोटी है
पकी दूसरी और कच्ची
पूरी पकते ही खा ली जाती है
नई आ जाती उसी तवे पर
समय की बयार में बदलता कुछ भी नहीं
चौबीस घंटे में पृथ्वी
बस एक बार घूम जाती है।