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Tuesday 21 Nov 2017

कारखाना-ए-दिल्ली

जीवन सिंह ठाकुर
422, अलकापुरी, देवास (म.प्र.) 455001
फोन- 07272-227171
कुछ शहर होते हैं। कुछ कस्बे होते हैं। शेष बचे गांव होते हैं। कुछ न तो शहर होते हैं न कस्बे न गांव होते हैं, लेकिन अपने को नगर कहकर गर्व मंडित कर लेते हैं।
शहर की बात कुछ या बहुत कुछ अलग होती है। शहर के पास सड़कें, बिजली, पुलिस, मशीनें, कार, बंगले, कानून, प्रशासन की मशीनरी होती है। यहां सिविल लाइन होती है। जिनमें अफसर होते हैं। सिविल लाइन के पीछे या बाजू में चमचमाती कॉलोनी होती है। जिनमें पार्टी नेताओं के बंगले और हवेलियां होती हैं। इन्हीं हवेलियों के बाजू में या पीछे, पार्टी नेताओं के करीबी, दोस्त, फाइनान्सर रहते हैं। ये सभी मिलकर शक्ति का केन्द्र हो जाते हैं। जो कभी भी किसी भी जगह को भव्य बना देते हैं। किसी भी शहर को नया आकार दे देते हैं।
जो भी कस्बा, गांव, क्षेत्र इन्हें पसंद आता है, कानून, फरमान शक्ति के बुलडोजर लेकर कब्जा कर लेता है और शहर का विकास हो जाता है। जिनमें सिविल लाइन, हवेलियां, बाजार बनते हैं। उजड़े हुए लोग न सिविल लाइन में आ सकते हैं न हवेली में, बाजार से कुछ खरीद नहीं पाते, वे सिर्फ टुकुर-टुकुर देखते हैं और शहरी होने का गर्व करते रहते हैं।
कई शहर अपने शहर होने पर गर्व करते हैं। लेकिन दिल्ली की बात ही और है। दिल्ली शहर नहीं है वह बस्ती भी नहीं है, कस्बा या नगर नहीं, गांव, खेड़ा तो हो ही नहीं सकता। दिल्ली राजधानी है। वहां चमचमाते बंगलों में रहने वाले भी दिल्ली पर गर्व करते हैं। झुग्गी-झोपडिय़ों, टप्पर में रहने वाले भी 'दिल्लीÓ में रहने का रौब झाड़ते हैं। वह 'सत्ताधीशÓ की भाषा बोलता है। दिल्ली राजधानी है उसे सिर्फ शहर कहना कानूनन अपराध भी हो सकता है। या तो इसे दिल्ली कहो या राजधानी कहो।
लेकिन एक बात यह भी है कि दिल्ली एक बड़ा विशाल कारखाना भी है। जो कई तरह की चीजों का उत्पादन करता है। इसके उत्पादनों की चमक ऐसी है कि कोई कारखाना, कोई राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय ब्रांड इन उत्पादों का मुकाबला नहीं कर सकता। यहां सरकारें बनती हैं और बिगड़ती हंै। सरकारें गिरती हैं, सरकारें खड़ी हो जाती हैं। बिगड़ती और बनती रहती हंै। कई बार 'रि-साइकिलिंगÓ में भी सरकार बनती है। दिल्ली कारखाने में सत्ता का उत्पादन अविराम होता रहता है। सत्ता पर 'चमकÓ, 'आकर्षणÓ का रैपर लगा होता है यह रैपर सभी को बुरी तरह खींचता है। लोग इसकी तरफ भागते हैं, सत्ता आगे-आगे और जनता पीछे-पीछे दौड़ती है। बाद में 'सत्ताÓ, जनता को दौड़ाती रहती है। जनता दौड़ती रहती है। हांफती, पसीना पोंछती, पसीना बहाती दौड़ती रहती है। जनता हांफती हुई अपनी बस्तियों में घुस जाती है, आपस में सत्ता को कोसती रहती है। कोसती हुई जत्थों में आपस में लड़ती रहती है।
सत्ता उत्पादन में बाई प्रोडक्ट भी बनता है जिसे पुलिस 'अपराधीÓ कहती है। कई लोग अपना रक्षक कहते हैं। सत्ता में हो तो 'बाहुबली, लोकप्रिय, कद्दावरÓ कहा जाता है। विपक्ष में हो तो अपराधी, समाजद्रोही, लुटेरा कहा जाता है। दोनों तरफ के अपराधी, अपराध करते हैं वे कहते हैं, ''हम तो अपना काम कर रहे हैं आप जो भी कहो, दिल्ली में रहकर अपराध न करें तो क्या करें।ÓÓ
जब लोग आपस में लड़ते हैं, एक-दूसरे को नोंचते हैं तो सत्ता आराम करती है, कहती है ''रिपोर्टेड टु बी पीस फुलÓÓ कोई ''अप्रिय घटना का समाचार नहीं हैÓÓ सत्ता आराम से रातभर पैग पर पैग चलाती है, समारोह होते हैं, देश का गुणगान होता है। सत्ता के उत्पाद को कोई खतरा नहीं होता। हंगामा, मारकाट होने लगती है, झगड़े, मारकाट पर उतर आते हैं तब दिल्ली कारखाने में उत्पादित सत्ता अपना वजूद सिद्ध करती है वह 'लॉ एंड ऑर्डरÓ लेकर आती है- शांति व्यवस्था कायम हो जाती है।
दिल्ली कारखाने में ये तमाम आइटम हैं, विभिन्न समय में सुविधानुसार इनसे काम लिया जाता है। ये काम बखूबी होते रहते हैं। लोग खुश होते हैं, खीझते हैं, आश्वस्त भी होते हैं, चैन से बैठते भी हैं। गुमटियों, ठेलों, ठियों पर बहस भी करते हैं, बेचैन भी रहते हैं। वो परेशान होते हैं कि वे आखिर कर क्या रहे हैं? वे हैं कौन? वे स्वयं कौन हैं? इस कारखाने में आखिर कर क्या रहे हैं? वे ये सब सोचते हुए निरंतर भ्रमित होते रहते हैं। इस 'भ्रमितपनÓ को कारखाने वाले बताते हैं कि 'जनता चिंतनशील है, वह विचार कर रही हैÓÓ और सरकार भी विचार कर रही है यानी 'सत्ताÓ भी विचार करती है कि कारखाने का 'मैनेजमेंटÓ कुछ निर्णय लेगा। सरकार कदम उठा रही है आखिर वो निर्णय हैं क्या, वे कदम कौन से हैं जो उठा रही है। पता नहीं उठे हुए कदम किसके ऊपर पड़ेंगे।
देश के कई कारखाने बंद हो गए, उनमें तालेबंदी हो गई। मालिकों के दिवाले निकल गए। मजदूर बेकार हो गए। उनकी तनख्वाहों का पता नहीं। उनकी जमा राशि का अता-पता नहीं है। लेकिन दिल्ली कारखाने में अबाध गति से काम चलता है। वहां कभी तालेबंदी नहीं हुई वहां उत्पादन ठप नहीं हुआ।
दिल्ली कारखाना बिना चिमनी, बिना धुएं के चलता है। बावजूद वहां अपार प्रदूषण है। यह प्रदूषण इतना और इस स्तर तक हो गया है कि शुद्ध हवा में लोग बीमार हो जाते हैं। उन्हें अस्थमा अटैक हो जाता है। खांसी, श्वास का दौरा पड़ जाता है। इसलिए शुद्ध हवा का 'वाइरसÓ न फैले इसकी पूरी ऐहतियात बरती जाती है। प्रदूषण की मात्रा बढ़ाई जाती है। ताकि लोग अपने फेफड़ों में जहरभरी जीवनदायी हवाओं में शुद्ध हवा का प्रवेश न होने दे। इस कारखाने में कई सेक्शन हैं जो आसपास की हवाओं को निरंतर प्रदूषित करते रहते हैं। दिल्ली कारखाने का दायरा बढ़ाते रहते हैं। कारखाने के कारिंदे कारखाना छोड़कर, दिल्ली छोड़कर दिल्ली से बाहर नहीं जाते, कहीं नहीं जाते। वहीं रहते हैं। बाहर जाकर मरना है क्या? दिल्ली के बाहर कोई जाता है क्या? आखिर जाएं भी तो क्यों जाएं? जब सभी अपने फेफड़े, बैग की तरह खाली करके यहां आना चाहते हैं तो यहां वाले बाहर क्यों जाएं?
गुलेरी के 'लहनाÓ की प्रतीक्षा आज भी है। घावों से भरा वह वहीं पड़ा है। प्रेमचंद का 'जोखूÓ आज भी कुएं के पास खड़ा है। निराला की 'तोड़ती पत्थरÓ इसी पथ पर आज भी है। महादेवी की 'नीर भरी दुख की बदलीÓ वहीं अटकी है। निर्भया की आंते राजपथ पर पड़ी हंै। रघुवीर सहाय का 'भोलाराम दासÓ  असहाय खड़ा है। सवाल बहुत बड़ा है। दिल्ली कारखाने की सभा में देर रात किसी ने कहा था ''हर आंख का आंसू पोंछा जाएगाÓÓ रूमाल बनाने वाले, ठेला लेकर, एडवांस लेकर चंपत हैं। कहते हैं रूमाल बन रहे हैं। खातिरजमा रखें। रूमालों की सप्लाई जल्द शुरू होगी।
रोते-रोते आंसू सूख गए हैं, सरकार ने कहा है रुलाई की सुनामी खत्म हो गई है। रूमालों की जरूरत नहीं है। हर आंख का आंसू सुखा दिया जाएगा, राजपत्र में भी शाया है, 'पोंछा जाएगाÓ की जगह 'सुखा दिया जाएगाÓ पढ़ा जाए। अब इस पर बहस नहीं होगी।
दिल्ली कारखाना अबाध गति से चल रहा है उत्पादन निरंतर जारी है। देश को गर्व होना चाहिए। जहां सरकारें बनती हंै। सरकारें ढाली जाती हंै। कारखाना चौबीसों घंटे, दिन रात चल रहा है। चलता रहेगा। देशवासी खात्री रखें। आपके विश्वास को खंडित नहीं होने दिया जाएगा। उत्पादन की 'गुणवत्ताÓ निरंतर बढ़ रही है। लोग चाहें तो दिल्ली कारखाना देखने आ सकते हैं कारखाना टुरिज्म विभाग आपके स्वागत में एक पांव पर खड़़ा है।