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Thursday 23 Nov 2017

गुजरे वक्तों के हैं ये लोग ग्रिगोरी खोजर

अनुवाद : धर्मपाल अकेला
गांधी भाषा पीठ, 'पुनर्नवा प्रेमपुरा, हापुड
मो. 9258832100
बाबा मेरे पास आने वाले हैं, बहन ने तार से सूचना दी- 'बाबा आनादिर से मिलना!Ó
'हे मेरे प्रभु! मैं चौंका।
'कोई अशुभ सूचना? तारवाहिका ने सहानुभूति दिखाते हुए पूछा।
'हुअं- मेरा मतलब है- नहीं- कोई अशुभ नहीं- यह तारÓ मैं हकबकाया।
तारवाहिका चली गई। मैं रसोईघर में पहुंचा जहां मेरी पत्नी ब्यालू की तैयारी में लगी हुई थी।
'लो और सुनो, हमारे एक बाबा और भी हैं, और मजा यह है कि वे हमारे यहां हमसे मिलने आ भी रहे हैं। नाम है उनका आनादिर।Ó
उसने टेलीग्राम पड़ा और खिलखिलाई-
'निरे आड़ू हो, आनादिर बाबा का नहीं, शिप का नाम है।Ó
अगले दिन मैं बाबा को रिसीव करने गया। मैं पिछले आठ-दस बरसों से उन्हें देख नहीं पाया था, इसलिए सोच रहा था बाबा की कमर झुककर दोहरी हो चुकी होगी और इसे बेजा भी कैसे कहा जा सकता था जबकि वे अस्सी पार कर चुके थे और बहन ने थोड़े ही दिन पहले उनकी बीमारी की खबर दी थी, यहां तक कि कुछेक अवधि तलक उन्हें अस्पताल में भी रखा गया था।
लेकिन देखता क्या हूं कि एक लम्बा छरहरा बूढ़ा, लम्बोतरे, किन्तु पतले चेहरे पर चमकदार शरारती आंखें जो जब वह मुस्कुराता तो लगभग मिच ही जाती थी, पटरी के सहारे झूलती हुई रस्सियों की सीढ़ी से उतरता चला आ रहा है और जैसे ही उसे पैरों के नीचे ठोस जमीन आ जाने का अहसास हुआ वह गजब की फुर्ती से घूमा और आसपास खड़े लोगों की उपस्थिति से एकदम बेध्याना सा मुझ तक चला आया और मुस्कुराता हुआ बतियाने लगा-
'वे तो मुझे ट्रेन से भेजना चाहते थे, लेकिन तुम जानो मैं तो लोहे के उन दड़बों से दूर ही रहता आया हूं। उसका हिचकोले खाते हुए दौडऩा और कान रेंगू शोर की कल्पना तक मुझे भयभीत करती आई है और अब तो वैसे भी मैं बूढ़ा हो चुका हूं। इसलिए मुझे तेज चलना वैसे ही गवारा नहीं, इसलिए मैंने साफ-साफ बोल दिया- भई मैं तो शिप से ही जाऊंगा।... वाह शिप की सवारी में क्या आनंद है...चारों ओर पानी ही पानी आप जनाब शिप पर सवार हैं एकदम अनभीगे। सूर्य आपके सिर पर चमक रहा है और आपके एकदम करीब में लोहे की भारी-भारी मशीनें धन-धन-धमाक् शोर कर रहीं। हालांकि मैं उनके निकट तो नहीं गया, लेकिन यह बात मैं कतई नहीं समझ सका कि इतना सारा और भारी लोहा पानी में डूबता क्यों नहीं... और बताऊं, तुम्हें शायद य$कीन तो नहीं आया- तुम्हारे माता-पिता तो मुझे अकेला भेजना ही नहीं चाहते थे। कह रहे थे कि राह में मुझे कुछ हो-हवा सकता है या मैं कहीं खो ही न जाऊं, इसलिए मेरे साथ मेरी देखभाल के लिए तुम्हारी बहन को भेज रहे थे, लेकिन मैं अड़ गया। मैंने साफ-साफ कह दिया-मुझे किसी का साथ नहीं चाहिए। मैं अकेला ही ठीकठाक पहुंच जाऊंगा। फालतू पैसा क्यों खर्च किया जाए? तुम ही बताओ मैं खोने वाला शख्स दिखता हूं क्या? भला मैं खो सकता हूं, यहां भी सब मेरे हमवतन भाई-बन्धु ही तो हैं। इतने सारे लोग इकट्ठे हैं, फिर मुझे तो रूसी-जुबान भी आती है। अगर खुदा न खास्ता तुम यहां नहीं भी पहुंच पाए होते तो भी मैं लोगों से पूछता-पाछता, बोलता-बतियाता तुम्हारे ठिकाने पर पहुंच ही गया होता। मुंह से जुबान हो, मौसम मेहरबान हो तो कोई भी आदमी कहीं नहीं खो सकता है। मैं ही कहां खो सकता था...।Ó
हां, मेरे बाबा, अभी भी बिना थके, निर्बाध गति से बोलते रह सकने वाला शख्स हैं, पूरे लतीफेबाज एकदम  जिन्दादिल जैसे अपनी जवानी के दिनों में रहे होंगे, वैसे ही। सुना है टैगा में शिकार अभियानों के दौरान सांझ हो जाते ही, मौसम की प्रतिकूलताओं के बावजूद उनके संगी-साथी निष्प्रभ या उदास नहीं होते थे। कभी-कभी तो टैगा में डेरा डाले पड़े शिकारी दस-पन्द्रह किलोमीटर तक की दूरी से सांझ होते ही उनके डेरे की ओर उनसे किस्से-कहानियां सुनने के उद्देश्य से दौड़े चले आया करते थे।
बाबा बिना किसी कष्ट या हिचक दिखाए, चौथे माले पर मेरे निवास तक पहुंच गए और मेरे बीवी बच्चों से मिले, हालचाल पूछे और फिर ऊपरी पोशाक उतारकर फ्लैट में घूम-घामकर जायजा लिया।
'ओह्हो, तुम्हारे पास इत्ती सारी किताबें हैं... क्या सचमुच ये सब तुमने पढ़ डाली हैं?... जरा मेरे करीब तो आओ बेटे- मैं देखूं तो तुम्हारे भेजे कितनी अक्ल समाई है!... हमारे घर में तो बस एक रेडियो है भाई, हालांकि अभी तक बिजली का एक बल्ब तक नहीं है, पर चूंकि बिजली पास के गांव तक तो आ ही चुकी है, हमारे यहां भी बस आने वाली ही है...और किताबें भी हैं, क्लब में हैं, लेकिन वे सबकी सब रंग-बिरंगी जिल्दों  वाली हैं- मैंने क्लब में खुद देखी हैं, कोई भी देख सकता है- सबके लिए हैं। अरे इत्ती मेजें, तुम इतनी मे जो का क्या करते हो भाई?Ó
मैंने राइटिंग टेबुल की ओर संकेत करते हुए बताया- 'इस पर मैं काम करता हूं...।Ó
'हुुउअूं जब मैं तुम्हारी अवस्था में था, मेरे पास सिर्फ एक स्लेज तथा पेड़ के तने को खोखला करके बना ली गई एक डोंगी भर थी, मेजतो कतई थी ही नहीं... ऐं टेलीफोन? तुम्हारा है? अपना!... फोन तो हमारे यहां भी है- ग्राम सोवियत में, लेकिन वह सिर्फ मुखिया के ही इस्तेमाल के लिए नहीं, सारे गांव वाले के वास्ते...।Ó
मैं समझ गया बाबा मुझ पर कटाक्ष कर रहे हैं, परन्तु मैं कुढ़ता ही क्यों। आजकल के बूढ़े किसी के भी रुआब में क्यों आएंगे भला। वे बहुत कुछ देख-भोग चुके हैं। उन्होंने स्पुतनियों का जमाना देखा है और वे इस बात से भी अनजान नहीं हैं कि वे कैसे काम करते हैं, बिना इंजिन के कैसे नक्षत्रों तक का स$फर कर लेते हैं।
लेकिन फिर भी कुछ ची•ाों ने बाबा को चकित किया- मेरी रसोई में गैस पर चढ़ी खदबदाती केतली ने उनका ध्यान खींच ही लिया।
'यह क्या है- तुम्हारा चूल्हा? ऐं, यह इत्ती सी लौ, तुम्हारी इत्ती बड़ी केतली को खौला देगी? तुम कह रहे हो इसके लिए मिट्टी का तेल, कोयला, लकड़ी या ऐसे ही किसी ईंधन की जरूरत ही नहीं पड़ती? क्यों? फिर तो इसमें देर भी बहुत लगती होगी? ऐं?Ó
'न, नहीं जी, देर कहां लगती है... आपको अपना पाइप सुलगाने के लिए जितना वक़्त चाहिए, उससे भी कम समय में यह धधक उठती है।Ó
'तब तो इसकी यह लौ बहुत गर्म होगी।... हूंअ, इसकी लपट नीली है शायद इसलिए... अब मैं समझा।
अपने इस निष्कर्ष के बाद बाबा वहां नहीं ठहरे। गैस चूल्हे में अब उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं रही। गैस चूल्हे की ओर से पीठ फेरते ही उनका उमंगों भरा ध्यान शावर में जा अटका।
'हां... यह निकली असल में अच्छी उपयोगी चीज! तरोताजा  होने के लिए चाहे जब गर्म फुहारों में स्नान करो या  लोट लगाओ, आपकी मर्जी... वाह क्या मौज है?Ó
'बाबाजी इतने लम्बे स$फर में आप थक भी तो गए होंगे,Ó मेरी पत्नी बोली, 'शावर ले लीजिए, उतनी देर में मैं आपके लिए खाना तैयार कर देती हूं।Ó
'बिल्कुल ठीक बात है... हां, शावर क्यों नहीं लूंगा भाई, लूंगा, जरूर लूंगा। फिर जब यहां तो गर्म पानी की सुविधा भी प्रचुर मात्रा में है तो नहाऊंगा भी, लेकिन इसे चालू तो करो भैया- मुझे पता तो लगे कि पानी आता कैसे है और अपनी पत्नी को भी बता दो कि स्नानघर हमारे गांव में भी। एक जमाना था जब लोग नहाते नहीं थे और खाल मोटी हो जाया करती थी, लेकिन तो भी खाज-खुजली से बचे रहते थे... न-एकदम $गलत बात है- हम पसीने से तर रहते थे, वही हमारा स्नान हो जाता था।Ó
बाबा फिर अपनी रंग में आ चुके थे। वे बोलते रहे जब तक उन्होंने अपने शरीर से धीरे-धीरे सारे कपड़े नहीं उतार डाले और जब उनके शरीर पर मात्र एक कपड़ा रह गया तो मैं वहां से हट गया, लेकिन पन्द्रह मिनट बाद ही उन्होंने मुझे पुकार लिया-
'नीकू, बेटा नीकू, जरा इधर तो आना, जल्दी...Ó
मैं बाथरूम की ओर दौड़ा और जाकर देखा कि बाबा भाप के बादलों के बीच घिरे हुए हैं...
'मैंने फुहार खोली कि पानी ठंडा हो जाए, लेकिन इतना गर्म पानी निकला कि मेरी रुह तक खौल उठी, भाई रे, इस नासपीटी फुहार को बंद करना मैं भूल ही गया था।Ó
मैंने शावर बंद किया और टब से गर्म पानी बाहर निकाल दिया,परन्तु तब तक बाबा चुपचाप कपड़े भी पहन चुके थे।
'लो अब नहाओ, मैंने गर्म पानी में ठंडा पानी मिला दिया है।Ó
'बस बेटा नीकू, अब तो मैं नहा चुका बेटा। तुम्हें याद तो होगा बच्चे, मैं कभी देर तक नहीं नहाता।Ó
बाबा कुछ ही देर आराम से बैठे थे कि मेरी पत्नी ने खाने के लिए आवाज लगा दी। पहला गिलास लेते ही बाबा फिर चहक उठे-
'तुम्हारे तो मजे  ही मजे  हैं नीकू बेटा- सचमुच बहुत मजे... वाह... भई वाह...Ó वे बोलते रहे।
'अब आ गए हैं तो यहां कुछ दिन तो रहेंगे ही?Ó मेरी पत्नी ने पूछ लिया।
'हां, हां, रहूंगा भाई, क्यों नहीं रहूंगा। मैं तो जब तक तुम लोग मुझे खिलाते-पिलाते रहोगे, तब तक यहीं रहता रहूंगा। चाहे सालों-साल रखो। ऐसे घर में जहां सभी तरह की मौज हो, भला क्यों नहीं रह सकूंगा...।Ó
'तो फिर अब आप हमेशा ही हमारे साथ रहिएगा।Ó मेरी पत्नी प्रसन्नता दिखाते हुए बोली, 'हम भी आपकी सेवा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे।Ó
हमने अध्ययन कक्ष में एक सोफे पर उनके शयन के लिए बिस्तर लगा दिया। सबेरे मैं जब अपना कल अध-बीच में छूट गया अधूरा काम पूरा करने के लिए जल्दी ही उठा तो अध्ययन कक्ष में जाकर मैंने देखा कि बाबा नीचे फर्श पर बैठे हैं। उन्होंने सोफे से खींचकर दरी नीचे बिछाई हुई थी, जाहिर था कि वे वहीं नीचे ही सोये थे।
'मुझे नींद ही नहीं आई, किसी नई जगह मुझे मुश्किल से ही नींद आती हैÓ, उन्होंने शिकायत की- 'फिर यहां तो शोरगुल भी ज्यादा ही था। अभी रात ही थी कि कोई ट्रक आ गया और फिर मैं सो नहीं पाया। कमबख्त ड्राइवर जानबूझकर ही शोर करता रहा था- घुर्र... घुर्र...,घुरर घुर्र...घुर्र...।Ó
'लेकिन आपने फर्श पर बिस्तर क्यों उतार लिया?Ó
'देखो बेटा, मैं अब बूढ़ा हो चुका हूं और मेरी हड्डियां अब वैसी सुरम्य भी कहां रह गईं हैं जैसी तब थी, जब मैं जवान हुआ करता था। तुम्हें पता है एक कुत्ता तक अपने सोने के लिए मुलायम और चौरस जमीन खोजता है। यह ज्यादा आरामदायक है...।Ó
मैं बाबा के पास ही उकड़ू बैठा था जिससे उनकी पूरी सफाई आसानी से सुनी जा सके।
'चौरस और मुलायम जगह आदमी के लिए गर्माहट भरी भी तो रहती हैÓ वे कहते गए, लेकिन तुम्हारा यह सोफा बीच से ही ऊपर को फूला हुआ है, कोई इसे चाहे जहां से और कितनी ही जोर से क्यों न दबाए, इसे चौरस नहीं बना सकता।Ó
'लेकिन आप फर्श को भी मुलायम तो नहीं बना सके।Ó
'न सही, लेकिन वह तुम्हारे सोफे से ज्यादा आरामदेह रहा है।Ó
बात खत्म हो गई। मैं अपना काम लेकर बैठ गया और बाबा उस नापसंदीदा सोफे पर बैठे-बैठे चुपचाप पाइप के बाद पाइप फूंकते रहे। एकदम खामोश जैसे न बोलने के संकल्प से बंधे हो। इस प्रकार बिना कोई शब्द बोले एक घंटा बीत गया।
'आप उकता गए होंगे बाबा, क्यों ठीक कह रहा हूं न मैं?Ó मैंने पूछा।
'क्यों, मैं उकताऊंगा क्यों बेटा, तुम यहां बैठे काम करते नहीं उकताते और मैं यहां अपने विचारों में मगन बैठा हूं। इस प्रकार हम दोनों ही अपने-अपने कामों में मगन होकर वहां तब तक बैठे रहे जब तक कि बच्चों ने ही वहां आकर खलल नहीं डाल दिया।
उस दिन मैंने उन्हें कस्बा दिखाया। हम मुख्य सड़क पर टहले, दुकानों में गए, फिर टैक्सी करके गली-कूचों में घूमे। बाबा अब फिर अपने पुराने रंग, अविराम बोलना और हंसी-मजाक में आ चुके थे। यह रहस्य भी खुला कि जब वे जवान थे इस कस्बे में एक बार आ चुके थे और अब वे अपनी परिचित उन्हीं पुरानी सड़कों और इमारतों को खोज रहे थे जो इस शहर से संबंधित उनकी यादों में बसी हुई थी, यानी जैसी उन दिनों थी।
'जिंदगी में एक बात बड़ी मजे दार है बेटा नीकू, आदमी जैसे-जैसे समय गुजरता जाता है, बुढ़ाता जाता है,लेकिन एक शहर जितना पुराना होता जाता है, निखार प्राप्त करता, उत्तरोत्तर जवान होता चला जाता है! है न मजेदार!Ó
दिन के शेष भाग में बाबा घर में ही बने रहे। उन्होंने सिनेमा या थिएटर जाना मंजूर नहीं किया, यहां तक कि हमारे मनुहार करने पर भी वे शहर के बचे हुए हिस्से को देखने चलने को भी रा•ाी नहीं हुए। वह जाकर मेज पर जम गए और अपने पड़पोते की चित्रों से भरी किताब उलट-पुलट कर देखने में रम गए और जब बच्चे चले गए तो वे एकदम आत्मलीन मुद्रा बनाकर और हमारे सवालों के जवाब में कुछ भी कह देने से एकदम बेपरवाह से होकर चुप बैठ गए। मेरी पत्नी और मैंने समझ लिया कि मैंने वृद्ध को घुमा-फिराकर थका डाला है और अब उन्हें आराम करने दिया जाना ही ठीक होगा।
जब मैं नित्य की भांति साढ़े पांच बजे सोकर उठा तो मैंने देखा बाबा दीवान पर बैठे थे।  'तुम्हें पता है, मुझे किस वजह से उठना पड़ा है?Ó वे बोले और फिर बिना मेरे जवाब की प्रतीक्षा किए स्वयं ही बोले- मैंने नींद में या हो सकता है मैं जगा हुआ ही होऊं, बत्तखों की पंक्ति में उड़ते हुए होने से हवा में उत्पन्न होने वाली ध्वनि सुनी। एक बहुत बड़ा झुण्ड था। मैं फौरन उठा और खिड़की खोली। देखा बाहर सनसनाती हुई हवा से पेड़ हिल-डुल रहे थे और हालांकि मैं ऐसी खुशगवार शोरोगुल वाली स्थिति में बहुत बढिय़ा नींद ले सकता था, क्योंकि मुझे लगता कि हवा मुझे लोरियां सुना रही हंै, पर तभी अचानक एक भयंकर शोर हुआ जिससे सारा घर गूंज उठा- लगा जैसे मेरे कान ही फट जाएंगे- क्या तुम्हारी नींद नहीं टूटी? अरे हां, तुम कस्बाइयों को शायद इस सबकी आदत हो चुकी होगी, इसलिए सोते रहे होंगे। यह हवाई जहाज की आवाज थी। वह तो नए वाले हैं, क्या कहते हैं उन्हें हां टी यू। सच है वह आवाज ऐसी रही गोया वे ठीक चिमनी के ऊपर से होकर गुजरे हों। अगर किसी बड़े ऊंचे से घर टकरा ही जाएं तो कैसा गुल खिलेगा- सोच सकते हो?Ó
हम लोगों के बीच बस यही थोड़ी सी बातचीत हुई और फिर एकदम सन्नाटा सा पसर गया। मैं यहां पैन हाथ में पकड़े बैठा रहा, लेकिन एक वाक्य भी नहीं लिख सका- पता नहीं कितना वक़्त ऐसे ही बैठे-बैठे बीत गया, फिर बाबा ही बोले-
'नीकू बेटा एक बात बता, क्या तुम हमेशा ऐसा ही बिना कुछ बोले काम करते रहते हो?Ó
'हां,क्यों?Ó
'रोज-रोज? महीने तक ऐसे ही!Ó
'हां।...Ó
'अब ऊबते नहीं?Ó
'ऊबना कैसा, कल आपने अपने संबंध में भी तो बताया था कि जब मैं अपने विचारों में होता हूं तो उकताता नहीं हूं।Ó
'ऐं... वह और बात है। जब वहां टैगा में हिम झंझावात का प्रकोप होता है तो आप-अपने टैण्ट में सिवाय चुप बैठने के और कुछ कर भी तो नहीं सकते, लेकिन ब$र्फानी तू$फान महीनों-महीनों तक लगातार प्रकम्पित कहां रह सकता है और जब वह शांत हो जाता है तो आप सोचना बंद कर शिकार पर निकल पड़ेंगे। कोई भी शिकार दिन के बाद दिन, पूरे महीने सिर्फ सोचता कहां रह सकता है? उसे तो शिकार की तलाश में निकलना पड़ता है।Ó
मैंने कोई जवाब नहीं दिया अपने-आपको सम्हालने में लगा रहा।
'अब मैं समझा, तुम्हें इस प्रकार के घर की जरूरत क्यों पड़ीÓ, बाबा ने कहना जारी रखा, 'तुम्हें बाहर कोई काम ही कहां है? तुम यहां अपनी मेज पर ऐसे जमे हुए हो जैसे तुम्हें किसी ने यहां राल से चिपका दिया हो!Ó
'लेकिन मेरा तो काम ही ऐसा है बाबाजी!Ó
'अच्छा तो यह बात है, तब तो अपने इस काम को और भी अधिक अच्छे ढंग से अंजाम देने के लिए अच्छा रहेगा कि तुम खाने-पीने की सामग्री अनाज, शुगर और बटर को खरीदकर रख लो जो सालों-साल तक चल जाए और पिर तुम यहां फुर्सत से जमे बैठे रहा करो जैसा कोई बिज्जू अपनी मांद में पड़ा रहता है, कहीं बाहर जाने की जरूरत ही नहीं है।Ó
मैंने जवाब देना नहीं चाहा, इसलिए अपने क्षेत्र में की गई अपनी यात्राओं के संबंध में उन्हें कुछ भी नहीं बताया। मैं अभी ही ननाई जिले से लौटा था और वहां कार्यरत एक महिला अध्यापिका की कहानी लिख रहा था।
'तुम्हारे पास अच्छा घर है, हर चीज आसानी से मुहैया हो जाती है, सारी सुविधाएं हैं, किन्तु इस सबके होने से तुम आलसी भी तो हो गए हो।Ó
'नहीं तो, आलसी कहां हूं, मैं तो काम करता हूं, आप देख भी रहे हैं, क्यों?Ó मैंने उन्हें टोका।
'हां देख तो रहा हूं, लेकिन मैं इस सबके बारे में कह कह रहा हूं। तुमने अपने आपको बदलते जमाने के अनुकूल बात तो लिया है पर तुम्हारी अपनी विरासत तो तुमसे बिसर चुकी है। तुम अब बंदूक पकडऩे योग्य कहां रह गए हो और मछलियां पकडऩे के लिए जाल फेंकने का तुम्हारा अभ्यास भी कहां रह गया है।Ó
मेरी हंसी छूट गई और फिर मैंने उन्हें सिमिन नदी जो कि बोलोन झील में जा गिरती है, में गर्मियों के मौसम में चलाए गए अपने शिकार अभियान के संबंध में बताया। बाबा कुछ बोले नहीं, बस बैठे-बैठे खिड़की के बाहर देखते रहे।
'मैंने तुम्हें नाराज करना चाहा था बेटे नीकू।Ó अंतत: वह इतना बोले।
'लेकिन किसलिए?Ó मेरे लिए वह एकदम अप्रत्याशित था।
'अगर तुम क्रुद्ध हो गए तो मेरे लिए तुम्हें छोड़कर वापस चले जाना आसान हो जाएगा, मुझे कोई पछतावा नहीं रहेगा, बेटा।Ó
'लेकिन क्यों बाबा, क्या तुम वापस गांव लौट जाना चाहते हो?Ó
'हां बेटा नीकू, मैं थक गया हूं।Ó
'लेकिन आपको यहां क्या करना पड़ा है जो थक गए?Ó
'इसलिए ही तो थक गया हूं बच्चे, कि यहां मेरे करने को कुछ भी नहीं है। बेटा मैं अपने हाथ-पैरों से काम करना चाहता हूं, हमेशा दिमाग से सोचते रहना मुझसे सधेगा नहीं, पुत्तर।Ó
'लेकिन आपने तो वादा किया था, हमारे साथ बहुत दिन रहेंगे?Ó
'हां, मुझे अपना वादा तोडऩे का खेद है, किन्तु मैं यहां अधिक दिन नहीं रुक पाऊंगा। बाहर देखो, पेड़ तक हवा में हिलने लगते हैं। तुम्हें तो इसकी आदत हो गई है, किन्तु जब मैं उन्हें देखता हूं तो मेरा सिर घूमने लगता है। मुझे लगता है मेरे पांवों के नीचे ठोस जमीन नहीं है। मैं उन शाखों के साथ-साथ ही झूल रहा हूं। न, बेटा नीकू मैं यहां नहीं ठहर सकता, मुझे अब चले ही जाने दो बेटा।Ó
'लेकिन बाबाजी आपने तो हमारे साथ $िफल्म देखने चलने का वादा किया था।Ó
'कोई बात नहीं बेटा जी, आप लोग मेरे बिना देख आना और मैं भी घर पहुंचकर देख लूंगा- हमारे क्लब में भी सिनेमा है।Ó
'अच्छा चलो फिर थियेटर ही देख आएं।Ó
'थिएटर हमारे यहां भी है। युवा शिकारी और किशोर जब तब कोई न कोई खेल खेलते ही रहते हैं।Ó
'हम तुम्हें डॉक्टर के यहां ले चलें?Ó
'मुझे अभी तक तो ऐसी जरूरत है नहीं, लेकिन अब यदि यहां एक दिन भी और रहना पड़ गया तो निश्चय ही बीमार हो जाऊंगा। मुझे चले जाने दो बेटा।Ó
जब मेरी पत्नी और बच्चों ने जाना और हम सभी मिलकर बाबा के समक्ष गिड़गिड़ाए, मिन्नतें-मनुहारें करने लगे कि वे थोड़े दिन तो और ठहर जाएं, लेकिन सब बेसूद रहा। बाबा अपनी बात पर अड़े रहे- 'जाना है।Ó
उसी सांझ हम उन्हें विदा करने घाट पर पहुंचे और जब तक जहाज का भौंपू नहीं बोला, वे वहीं घाट पर हम लोगों के साथ खड़े ठीक उसी तरह हंसते-मुस्कुराते, बोलते-बतियाते रहे जैसे तब जब वे आए थे। दूसरा सिग्नल आते ही उन्होंने हम सबको चुमकारते हुए आशीषा और फिर तेजी से, बिना रेलिंग का सहारा लिए लटकी हुई डोलायमान सीढिय़ों पर चढ़ते चले गए। मैं जाते हुए इनकी पीठ देखता रहा और मुझे लगा कि वे बड़ी आसानी से इस कम्पायमान सीढ़ी पर दौड़ लगा चुके होते अगर वहां उपस्थित अन्य सभी यात्री और उन्हें विदा देने आए उनके परिजन खासकर उनका पौत्र और परपौत्र उन्हें देख नहीं रहे होते। मुझे उनसे कोई शिकवा-शिकायत नहीं, क्योंकि मुझे उनकी दुर्दमनीय बेचैनी का पता है और मैं समझ गया कि उन्हें रोक पाना संभव हो ही नहीं सकता था, क्योंकि खाली-खुली ठाले बैठे ठहरना उनके खून में नहीं है... ननाई मिजाज यही तो होता है।
मूल लेखक- ग्रिगोरी खोजर ननाई लेखक 1929 में, आमूर के तटवर्ती बेरखनी ग्राम में जन्मे। गोर्की पुरस्कार प्राप्त। इतिहास में स्नातक स्तक तक शिक्षा प्राप्ति के बाद लेनिनग्राड के सहकारी संस्थान में सेवा की। पहली कृति कथा पुस्तक 1963 में प्रकाशित हुई। आमूर के तटवर्ती क्षेत्रीय जनजीवन के चितेरे। इनकी प्रसिद्ध पुस्तकें है 'सीक्वेल्स ओवर दा सीÓ, 'एण्ड ऑफ ए बिग हाउसÓ, 'एन अनलॉक्ड राइफल्सÓ अब खाव्ब्रोस्क में निवास