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Sunday 19 Nov 2017

बागी

महेश्वर नारायण सिन्हा
जगदलपुर (बस्तर)
इसका नाम जिगर था। सात-आठ साल का बच्चा। गोल-मटोल, गोल आंखें, फैली हुई नाक, निकले और मोटे होंठ। लपेटे हुए कान और सिर पर घुंघराले बाल! खूब हंसमुख! हंसे तो दीवारों को गुदगुदी हो जाए। उन्मुक्त हंसी जो सिर्फ एक बंधनमुक्त आत्मा ही हंस सकती थी। काम न फुर्ती से करे न ही धीरे-धीरे। बहुत ही व्यवस्थित और ढंग से। तरीके से सजा कर। काम और जिंदगी में फर्क नहीं। अपने काम में खूब रस लेता था। सहज होकर काम करता था। बड़ा मन लगाता था। बातें भी खूब अच्छी किया करता था। खेलने का भी उसे शौक था। बच्चा था, खेल पर उसका जन्मसिद्ध अधिकार बनता था, खेलता कैसे नहीं।
मैनेजर साहब ने अपने मामा के घर दस दिनों के लिए उसे छोड़ दिया था। वे और उनकी पत्नी अपनी गोद के बच्चे के साथ छुट्टी पे जा रहे थे, आठ-दस दिनों की बात थी। जिगर उन्हीं का घरेलू नौकर था। शहर में चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर मामा जी का घर था। बच्चा है, कुछ सेवा ही करेगा। आने पर वापस बुला लिया जाएगा।
जिगर घरेलू नौकर था इसलिए चौबीसों घंटा उनके घर में ही रहकर काम करता, सेवा-सुश्रुषा करता था। आठ साल का बच्चा था, घर के इधर-उधर के काम सिखाने पर सीख गया था। उसके पिता को महीने दर महीने मैनेजर साहब मेहनताना दे दिया करते थे। जरूरत के हिसाब से और ढूंढने पर ऐसे घरेलू नौकर या नौकरानियां मिल जाती हैं। गरीब, आदिवासी या अन्य जातियों के लोग मिल जाते हैं।
मामाजी के घर का माहौल एकदम जुदा था। प्रारंभ में जिगर यहां भी सहमा-सहमा, एकदम अनुशासन में रहा। पर मामाजी का व्यवहार, उनके बच्चों, रमेश, दिनेश, हरीश सबसे जिगर की जल्दी दोस्ती हो गई। मामाजी जिगर के साथ कोई नौकरों सा व्यवहार नहीं करते थे। एक तो वे खुद श्रमिक थे, फिर घर में नौकर-चाकर रखने की प्रथा न थी। न ही उनके पिताजी ने ही इस प्रथा का वहन किया था। बल्कि रोज कमाओ, रोज खाओ वाले घर में कहां से सेवा-सेवक और नौकर-चाकर। अपना काम खुद ही देखिए।
जिगर इस तरह उस घर में दस दिन बिताने आया था जहां नौकर रखने की परंपरा न थी। फिर मैनेजर साहब मामाजी के दूर के रिश्ेदार भी थे, ऊंचे ओहदे वाले थे, फिर इसका लिहाज करना था और उनके द्वारा सौंपी चीज का ख्याल रखना था। और यह भावना भी कहीं न थी कि मैं मालिक तू नौकर!
जिगर बच्चों के साथ खूब खेलता। पर अपना काम बखूबी करना न छोड़ता। सबेरा हो गया, जिगर ने उठते ही झाड़ू उठा लिया है। एक सिरे से फर्श की सफाई हो गई। कोने-कोने से धूल और गंदगी नदारद है।
झाड़ू लग गया, अब पोंछा लिया और एक बाल्टी पानी, पोंछा लगना शुरू हुआ। देखते-देखते फर्श चमकने लगे। रात के जूठे बर्तन इकट्ठा हो गए, आंगन में सज गए। अब वे धुल जाएंगे। सबेरे की चाय हो गई, जिगर चाय के बर्तनों को फर्श पर से हटा देगा। उन्हें तत्काल साफ कर बर्तन रखने वाली जगह सजा आएगा। किसी ने एक गिलास पानी की इच्छा की, जिगर तुरंत हाजिर हो गया, बिना इंतजार किए। बिना आज्ञा। अरे! मैंने तुझसे तो नहीं मांगा था। ला! पिला दे! और पानी का खाली गिलास वापस अपनी जगह! दोपहर का खाना हो गया, लोग खाने पे बैठ गये, जिगर ने बिना बोले पानी के गिलास और पानी का लोटा, जग लगा दिया है। आप खाकर उठ गए, वह आपका हाथ ऊंचाने के लिए खड़ा है, लोटे में पानी लेकर! फिर जूठे बर्तन आंगन में बाकायदा। मामाजी ने स्नान कर लिया है, उनकी लुंगी और गंजी छांट ली है, बच्चों ने नहाया और अपना नेकर गीला फेंक दिया कि अम्मा नेकर धोएंगी, पर नहीं, जिगर के रहते नहीं। यह काम जिगर स्वयं करेगा। सब्जी लानी है, जिगर थैला लेकर करीब के बाजार से हरे साग और आलू ले आया। सांझ को सब्जी तैयार करनी है, जिगर छुरी से आलुओं को छीलने बैठ गया। प्याज छीलकर तरीके से काट चुका। लहसुनों से छिलके उतार लिए। अदरक, मसाले, हल्दी, धनिया, तेजपत्ता, लौंग, इलायची, कौन कहां है उसे देखते-देखते खबर लग गई है। चाय की पत्तियां कहां रखी है, शक्कर किस डिब्बे में है, चावल किस हांडी में है, आटा कहां है। सबकी खबर उससे पूछ लीजिए। कौन-सी चीज कहां है, किस डब्बे में क्या रखा है। मामा जी दाढ़ी बनाने की सोच रहे हैं, अगले क्षण छोटा आईना, दाढ़ी बनाने का सेट, ब्रश, कप में पानी और फिटकरी या डेटॉल हाजिर है। आपने दाढ़ी बना ली, चिंता नहीं, सारे सामान वापस अपनी जगह पहुंच जाएंगे। ब्रश ठीक से धुल जाएगा, शीशे फिर से चमका दिए जाएंगे। ब्लेडें पोंछ-पांछ कर उसके कवर में लपेट दी जाएंगी। मामाजी दोपहर का भोजन कर आराम करना चाह रहे हैं, उनकी लुंगी तह कर रख दी गई है। आलना तह किए हुए कपड़ों से व्यवस्थित है। पहले कपड़े का आलना कबाड़ी का घर था, अब पतलून, शर्ट, तौलिया, बनियान, लुंगी, धोती सारी चीजें तरीके से तहकर अलग-अलग शेल्फों में सजी हैं। बच्चे-बूढ़े बिस्तर से सोकर उठ गए हैं, तकिया, लिहाफ, चादर सारी चीजें अस्त-व्यस्त हैं। होंगी व्यवस्थित दोपहर तक। पर अब नहीं, आप सबेरे सोकर उठिए और सारा कमरा व्यवस्थित और साफ पाइए। कुर्सी-टेबल, रमेश, दिनेश और हरीश की किताबें, बस्ते, कलम, कापियां, पेंसिलें, रबर सभी अपनी जगह। घर है मानो किसी नव दुल्हन ने अपना ससुराल आकर अपने अनुसार सब सजा लिया हो। टेबल-क्लाथ जो दिन में कभी हाथ पोंछने के काम आता था, फिर बाहर से धूल-मिट्टी से खेलकर  आए रमेश या हरीश के पैर पोंछने का काम आने वाला होता था, अब बाकायदा वह अपनी जगह दुरुस्त है। कमबख्त एक बार फिंच भी गया है। कितना साफ झलक रहा है। रमेश, हरीश और दिनेश के गंदे कपड़े सर्फ में गोत दिए गए। बाकायदा धोकर, सूख कर लोहे के इस्तरी से प्रेस भी कर दिए गए। पहले नहाने के बाद कंघी के लिए आईना ढूंढो, आईना मिलता तो कंघी नहीं, कभी कंघी मिली तो आईना ढूंढने में समय निकल जाता। मामाजी की धारीदार अंडरवियर तो कभी रजाई में तह मिलती, कभी खूंटे में सूखती नजर आती, कभी पैर पोंछन बनकर जमीन चाट रही होती। अब सबकी एक पोजीशन थी। जहां हाथ डालिए वहीं चीजें मिलेंगी। यही नहीं, सबसे छोटा हरीश जो जिगर के लगभग हमउम्र था, उसके स्कूल का बस्ता, स्कूल जाने के पहले उसकी कापियां, पेंसिलें, सभी ठीक-ठाक मिलती, पहले यह हुज्जत मामाजी या मामी को करनी पड़ती थी या बड़े भैया रमेश को। पर अब किसी को फिकर करने की जरूरत नहीं। जिगर है। दो-चार दिनों में ही उसने घर को जान-समझ लिया। एकदम नक्शा ही बदल दिया है।
इतना सब करने के बाद जिगर खेल में रमेश, हरीश और दिनेश का साथ भी देता। खूब मन से खेलता। गिल्ली डंडा हो, चाहे हरीश की लट्टू, चाहे रमेश की ऊंटियां। या फिर पड़ोस में हो रहा बैट-बॉल। वह हर जगह फिट हो जाता।
पर जिगर का दिल सिर्फ इतने से न भरता। रात को भोजन के उपरांत सोने के पूर्व मामाजी के पांव के पास बैठ जाता। तलवे और पांव दबाने लगता।
नहीं बेटे! तू बहुत छोटा है, पांव छुआ न करो।
पर नहीं! आप एक बार पांव दबवाने तो दीजिए। जिगर जिद पर आ जाता। चल बाप। अगर तेरे को मजा आता है तो थोड़ा दबा ले।
जिगर मामाजी के तलवे में गुदगुदी करता! और फिर जोर का लम्बा ठहाका! उन्मुक्त हंसी!
''अरे, मजाक करता है।ÓÓ मामाजी कहते।
मामाजी को पता चल गया, जिगर को पांव दबाने में महारथ हासिल है। पांव के अंगूठे, प्रत्येक उंगलियां, एड़ी, तलवे सब इस तरह दबाता, सहलाता है कि गजब! एक मीठा सुख रगों में दौड़ जाता है। अंगूठे सहित सभी उंगलियां चटकाने में माहिर! एक झटके से 'पुटÓ की आवाज निकलती है।
अरे! तू तो बहुत अच्छा पांव दबाता है, पर तू सीखा कहां से। लगता है मैनेजर साहब ने अच्छी ट्रेनिंग दी है।
जिगर सिर उठाकर हंसता। मानो कहना चाहता हो काम कोई सिखाता है, काम तो खुद लगन और समर्पण से सीखा जाता है।
मामाजी ने उसके बाद उससे पैर नहीं छुआए। जिगर अब उनके सर पे पड़ गया। यह ठंडा तेल है, अपना सर दीजिए। गोया उसे मजा आता हो। सर पे तेल चुपड़ा और अपनी नन्हीं उंगलियों से खुर-खुर-खुर करके भेजे का एक्यूप्रेशर कर दिया। दिमाग फ्रेश! कानों को हल्के-हल्के ऐंठा! गरदन पर हाथ फेरा, कंधे और बाजू तक उसके नरम हाथ पहुंचे।
बस कर बेटा! बहुत हो गया! तू बहुत अच्छा दबाता है। कौन सिखाया...!
फिर उन्मुक्त हंसी!
और हां, सर, कान होते हुए वह मामाजी के गरदन में गुदगुदी करना और खूब जोर की हंसी लगाना नहीं भूलता!
मामाजी ने दूसरे दिन से इस बात का नोटिस लेना शुरू किया कि यह जो घर में व्यवस्था आई है, या जो साफ-सफाई है, सजे हुए कमरे और अलमारियां, बिस्तर, तकिए और सोफे के गद्दे हैं, वे सब इसी की वजह से है।
क्या यह दिनभर काम करता रहता है! कपड़े भी धोता है, बर्तन भी साफ करता है, झाड़ू-पोंछा, बच्चे के स्कूल का बस्ता, पेंट-शर्टों में इस्तरी, जूते में पालिश। व्यवस्थित रखे जूते-चप्पल! लुंगी-तौलिया, बर्तन, कप और प्लेटें! क्या सब इसी ने किया है।
उस दिन इतवार था। मामाजी ने सबेरे से ही गौर किया।
नन्हा बच्चा उठते ही झाड़ू उठा लिया।
नहीं बेटे! तेरी मामी लगा देगी, तू मत कर!
कपड़े! नहीं रे, यह तू इतना भारी काम करता है। कप-प्लेटें, बर्तन-बासन..., सूखते-कपड़े, सजी अलमारी... सभी में तो जिगर का ही नाम लिखा है।
मामाजी! कहां उसे रोकते और कैसे रोकते। वह तो चलते-फिरते अपना ध्यान अपने काम में इस तरह लगाता है कि पता ही नहीं चलता। ये रही उल्टी चप्पल, सीधी हो गई। यहां जूठा गिरा है, अभी साफ हुआ। बाहर तार में कपड़े सूख गए, तुरंत तहकर जगह पर रख दिए गए। दीवारों पर झोल-झार दिख रहा है अभी साफ हुए। चाय-प्याली हो गई, वे फिर अपनी जगह। अभी धुली, अभी साफ चमकती अलमारी में कैद! मामाजी खाना खाकर लेटे,जिगर उनके सिरहाने, पैताने। सर और पांव हाजिर!
बेटे! ये सब नहीं! क्यों मुझसे पाप करा रहा है!
और जिगर खूब हंसता! ठहाका लगाकर! मामाजी के पांव छूने से उन्हें पाप लगता है!
यह सब करते-कराते हुए बहुत जल्द जिगर इस घर के सदस्य के माफिक हो गया। वह इस इकाई में शामिल हो गया। उसका वजूद कैसे घुला-मिला किसी को एहसास ही नहीं हुआ।
काम और व्यवस्थित काम करना उसके व्यक्तित्व का हिस्सा था। उससे घरेलू काम को मुक्त करना शायद मुश्किल था।
मामाजी सोच में पड़ जाते। वे यही सोचते कि उसकी ट्रेनिंग बड़ी अच्छी हुई है। क्या रचनात्मक कार्य करता है। पर इस बच्चे से घरेलू काम करवाना क्या उचित है। वे सोचते।
दस दिन कैसे बीते, पता ही नहीं चला। हंसते-खेलते, काम-सेवा करते।
ठीक ग्यारहवें दिन श्री एवं श्रीमती मैनेजर साहब पधारे। घर के आगे चार चक्के की मारुति कार से। मतलब साफ था, जिगर को ले जाना है।
प्रतीत हुआ कि जिगर कुछ मायूस सा है। पर वो चला गया!
घर में सभी को प्रतीत हुआ कि कुछ निकलकर चला गया है।
जाने के पूर्व मामाजी और मामी ने जिगर के काम की खूब तारीफें की। मैनेजर साहब हंसते रहे, मुस्कराते रहे। वे कम बोलने के आदी थे। दम्पत्ति ज्यादा नहीं बोलते थे!
पर, दूसरे दिन की ही बात है। दोपहर के आसपास जिगर अकेला घर ढूंढता-ढांढता मामाजी के घर आ गया।
मामाजी दोपहर के खाने में घर आए हुए थे। उनका मुंह अचंभे से खुल गया।
अरे ये कहां! कैसे आया...! भागकर! मैनेजर साहब को बिना बताए...!
कैसे आया रे...! पता कैसे मिला...! भूला-भटका नहीं। चल अभी तुझे वापस छोड़ जाऊं...! बाप रे..., भारी बेइज्जती की बात है..!
''मेरा वहां जी नहीं लगता...।ÓÓ उसने मासूमियत से कहा। ''चुप करÓÓ- मामाजी ने डांट लगाई।
जिगर को शायद इसकी उम्मीद न थी। उसने तो यही सोचा होगा कि लोग उसे गले लगा लेंगे। पर उस गरीब बच्चे को क्या पता, वह मैनेजर साहब का नौकर है। दुनिया की कड़वी सच्चाई से वह मासूम अनजान था।
मामाजी ने उसे तत्काल पड़ोसी के स्कूटर से मैनेजर साहब के घर छोड़ दिया। क्या कहते, शर्मिंदा हुए- शरारती लड़का है, खिलंदड़ है..., बच्चों के साथ खेलने भाग आया...! खबरदार! अब बिना अनुमति भागे तो...!
मैनेजर साहब फिर हल्के-हल्के हंसे। मुस्कुराए।
मामाजी लौट आए।
उनके चेहरे पर सुकून था। बड़ी बेइज्जती होती, क्या कहेंगे, बच्चे को बहला-फुसला लिया। मामीजी ने भी कहा, अब दुबारा जो यहां छोड़े तो न रखिएगा, इनकार कर दीजिएगा।
वे दुबारा भेजेंगे ही नहीं, मुझे विश्वास है।
ऐसा हो तो ठीक।
इधर श्री एवं श्रीमती जी सांझ को जब इकट्ठा हुए तो जिगर की चिंता लेकर बैठ गए।
''इस जिगर ने मेरी बड़ी बेइज्जती करा दी, मामाजी क्या सोचते होंगे, हम लोग ओहदे वाले होकर बच्चों का शोषण करते हैं।ÓÓ मैनेजर साहब ने चिंता भाव से कहा।
''मैंने तो मना किया था, तुम ही नहीं माने, अब भुगतो।ÓÓ श्रीमती जी।
''पर अब करे क्या...।ÓÓ  श्रीमती जी ने चिंता जताई।
उसे समझाते हैं। मगर प्यार से, बच्चा ही तो है।
''समझा लो।ÓÓ श्रीमती जी ने कहा और जिगर को आवाज लगाई। जिगर हाजिर हो गया। मैनेजर साहब ने कहा,  ''बेटे जिगर! हम लोग इतने बुरे हैं कि हमें छोड़कर चले गए। हम तुम्हें कई सालों से साथ रखते आए हैं, हमने तुम्हारे साथ कुछ बुरा किया है...? बताओ तो भला। किया है...!ÓÓ
जिगर ने सर हिलाकर जवाब दिया, ''नहीं किया है।ÓÓ
''नहीं न! हमने तुझे मारा..!ÓÓ
उसने फिर सिर हिलाया- ''नहीं..!ÓÓ
''डांटा... पीटा...!ÓÓ
''नहीं...!ÓÓ उसने सर हिलाया।
हमने तुझे अच्छा-अच्छा खाना खिलाया। खिलाया कि नहीं, जो खाया वही तो खिलाया। खिलाया न..!
''हां!ÓÓ- उसने अपनी मुंडी ऊपर नीचे की।
''अब बैठ जाओ। आराम से बैठो। इधर मेरे पास वाले सोफे में।ÓÓ
जिगर ने वैसा ही किया। वह कुछ डरा-सहमा सा, उनके पास आकर बैठ गया।
''देखो बेटे! हम तुम्हारे लिए कितना कुछ नहीं करते। तुम्हें अच्छे से स्कूल में पढ़ाते हैं, जानते हो उस स्कूल की फीस कितनी है, महीने की ढाई सौ। फिर तुम्हारे स्कूल के खर्चे, किताब-कापी, जूते-मोजे! स्कूल बस के खर्चे! ये सब जोड़कर महीने के पांच सौ रुपए होते हैं। फिर तुम्हारे पिता जी को अलग से एक हजार रुपए देता हूं। अगर तुम्हारे खाने-पीने के खर्चे जोड़ लूं तो कुछ नहीं तो पांच सौ रुपए और हो जाएंगे। फिर तुम्हारे पहनने के कपड़े। होली-दीवाली और दशहरे में तुम्हारे लिए नए कपड़े। तुम जानते हो इतना खर्च कोई अपने बेटे पर भी नहीं करता। तुमसे हम ज्यादा काम नहीं लेते। बस छोटी-मोटी जरूरतें। अब बताओ हममें क्या कमी रह गई।ÓÓ
उसने अपना सर नीचे झुका लिया।
''बोलोगे नहीं...।ÓÓ मैनेजर साहब ने उसके सिर पर हाथ रखा।
वह वैसे ही रुठा बैठा रहा!
''अब तो नहीं भागोगे...।ÓÓ श्रीमती ने पूछा।
''बोलो! अब तो मामाजी के घर नहीं जाओगे...!ÓÓ- मैनेजर साहब ने उसकी ठोड़ी ऊपर कर आंखों में प्रश्नवाचक दृष्टि डाली।
वह सहमा चुपचाप बैठा रहा।
श्रीमती ने ही कहा- ''अब ऐसा नहीं करेगा। हम इतने बुरे नहीं। क्यों...! बच्चा है, थोड़ी गलती कर दिया, अब नहीं करेगा। जाओ, खेलो...!ÓÓ
वह उठकर चला गया।
मैनेजर साहब ने गहरी सांस ली। मानो बहुत बड़ा काम कर आए। अब निश्चिंत हुए, जिगर पर उनकी बातों का असर जरूर पड़ेगा।
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दूसरे दिन मैनेजर साहब सोकर उठे और आदत के अनुसार अखबार के लिए सेंटर टेबल की ओर हाथ बढ़ाया तो अखबार के साथ-साथ पेपरवेट से दबा एक कागज का टुकड़ा भी था जिसे पढ़कर वे बेचैन हो गए। पेपर की लिखावट जिगर की थी, उसने बिना किसी औपचारिकता या लाग-लपेट के अपनी बात कही थी, अपने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था।
आप लोग बहुत अच्छा है। मेरा ध्यान रखता है। अच्छा-अच्छा खाना देता है। अच्छा-अच्छा कपड़ा। अच्छा जूता। अच्छा मोजा। ताकत के लिए दूध भी। केला भी। सेब भी। अच्छा सकूल (स्कूल) भी। मेरा बाबा को अच्छा पैसा। अच्छा रोपेया। आप लोग हमको मारता नहीं। डांटता नहीं। पीटता नहीं। पर मामाजी का घर का लोग बहुत अच्छा। और मामाजी बहुत अच्छा। बहुत अच्छा। जो बहुत प्यार करता है। आप हमको प्यार नहीं करता। इसलिए...
आगे के शब्दों को पूरा किए बगैर उन्होंने पत्नी को कागज थमाया और जिगर के कमरे की ओर भागे...।