Monthly Magzine
Monday 20 Nov 2017

मुखौटा

रमेश कुमार सोनी
जे.पी. रोड, बसना (छ.ग.)-493554
सेठ जी, कोई काम है...?
हाथ जोड़े, विनम्र भाव से एक किराया भंडार की दुकान के सामने खड़ा किशना बुदबुदा रहा था। कितना पढ़ा है...? जी पांचवी पास हूं।
कोई पहचान, जमानत वगैरह है...?
कहां रहता है...?, पहले कहां काम किया है...? वहां काम क्यों छोड़ दिया...?
घर के कितने लोग कहां-कहां काम करते हैं...?
कांपता, थरथराता किशना अपने आपको सवालों के विकट चक्रव्यूह में फंसा हुआ पा रहा था। उसे सूझ ही नहीं रहा था कि किस सवाल का उत्तर कहां से देना शुरू करे। इतने सवाल तो पढ़ाई की परीक्षा में भी कभी नहीं पूछे गए, फिर उत्तर देने के लिए तीन घंटे तो मिलते ही हैं...!
हर दुकान, ऑफिस से बैरंग लौटाया गया यह नवयुवक किशना जिसने पिछले कुछ दिनों से दुनिया के रंग देखने आरंभ किए थे, इसका एहसास उसे दूसरों की जुबान से सुनकर कभी नहीं हुआ था। हर जगह यही जवाब मिलता कि- यहां नौकरी के लिए संपर्क न करें..., यहां बाल श्रमिक काम नहीं करते.., यहां जगह खाली नहीं है..! अब तक वह सेठजी के सामने हाथ जोड़े खड़ा उसके मनोभावों को समझकर भविष्य के लिए आशा बांधने लगा ही था, वह जवाब देने की कोशिश करता किन्तु सूखते कंठ, चिपकते मुंह ने उसका साथ नहीं दिया। इसी बीच सेठ जी ने अपने कार्यों से निवृत्त होकर उसे ऐसा घेरा कि उसे पूरी धरती कांपती हुई, आसमान घूमता हुआ लगा और वह धड़ाम से गश खाकर गिर पड़ा...।
कुछ देर बाद उसने अपने आपको भीड़ के बीच पाया, वह अचंभित था कि वह इतना ''व्ही.आई.पी.ÓÓ तो नहीं था कि कोई उसके लिए इस तरह खड़े रहे। आंखें खुलते ही भीड़ की तेज आवाजें उसके कान को चीरने लगी- मरने के लिए मेरी ही दुकान मिली थी..? जाने कहां-कहां से चले आते हैं...? खाना-पीना किया था...? पूरा शरीर सूख चला है। भीड़ ने आवाज दी अरे अब पूछते ही रहोगे या उसे पानी-चाय दोगे भी...?
उसके हलक में पानी, चाय और कुछ बिस्टिक घुसा तो सोचने के लिए मस्तिष्क को कुछ ऊर्जा मिली। अब वह घर की चिंता करने लगा मां के लिए तो वह खाना- दवा लेने निकला था। डॉक्टर ने पर्ची लिखकर कहा था- दवाइयां खाना खाने के बाद खिलाना। अब वह उछलकर खड़ा हुआ और अपनी दास्तां सेठ जी को एक सांस में बता दी...।
कुछ काम कर सकता है रे...?
इस रौबदार आवाज ने उसे जीने की एक राह दिखाई। वह सेठजी के चरणों में गिरकर अपनी स्वीकृति और धन्यवाद दोनों एक साथ देने लगा। बस-बस अब उठो, दिल लगाकर काम करना, खाना और पगार दैनिक मिला करेगा, रोज यहां काम नहीं है जब होगा तो तुझे मिल जाएगा। किशना को लगा कि- जीने की उम्र अभी बाकी है सोचकर हिम्मत बांध उठ खड़ा हुआ काम करने। काम उसने पूछा ही नहीं। काम तो काम होता है, इसमें छोटा या बड़ा क्या? सब वक्त का तमाशा है। जिसे जो जब मिल गया कर लेता है। वैसे भी जब सब कुछ पूर्व निर्धारित होता है तब माने के तमाशे व्यर्थ हैं।
अपनी मुराद पूरी होती देखकर वह स्वर्गिक सुख के सागर में गोते लगाता हुआ खो गया था। सेठजी ने कहा- काम तो करोगे पर पूछा नहीं, क्या काम है?
क्या पूछना साहब जी, आप जो काम देंगे जी लगाकर कर लूंगा। सब अच्छा ही काम होगा। जीने के सहारे के लिए मिले इस तिनके के सहारे को वह कसकर पकड़ लेना चाहता था। चल कुछ खा-पीकर काम के लिए तैयार हो जा, रामू... इसे काम के लिए तैयार करो। रात तक काम करना है, देर रात गए ही मिल पाएगी छुट्टी। किशनवा अब सोचने लगा ऐसा क्या काम होता होगा रात में। रात गए घर लौटते गली के कुत्ते हमले करेंगे, मां को भी नहीं बताया है, वह भी चिंता करेगी, पता नहीं उसने कुछ खाया-पीया भी है या नहीं? बुखार, पानी की पट्टी से उतर ही गया होगा? किशना को कुछ सोचते देखकर रामू ने पूछ ही लिया क्या सोच रहे हो बच्चू...? अरे तुमने अपना नाम नहीं बताया, दोस्त बनेगा मेरा...? खैर नाम से क्या है, वह तो मिटने वाला है? किशना सिर से पैर तक कांप गया आखिर ऐसा काम ही क्या है जिसमें नाम व पहचान की जरूरत ही नहीं?
किशना ने आखिरकार रामू से पूछ ही लिया काम क्या करना होगा...? रामू ने बताया कि एक रात की पगार एक सौ रुपए मिलेंगे, काम बड़ा आसान है, तू कर लेगा, मैं कई बार कर चुका हूं। एक सौ रुपए- किशन ने कहा। कम है क्या? नहीं-नहीं, ठीक है। परन्तु काम तो तुमने बताया ही नहीं, जो पूछ रहा हूं वो तो ठीक-ठीक बताओ? किशनवा एक सौ रुपए पहली बार देखेगा, वह तो उसे पहचानेगा भी नहीं, शायद...? यह उसके लिए कुबेर के किसी खजाने से कम नहीं होगा।
देख किशना, तेरा काम बेहद आसान है मैं जैसा कह रहा हूं, वैसा ही करते जाना, गड़बड़ मत करना नहीं तो सेठ पैसे नहीं देगा। अरे बड़ा बुद्धू है रे तू, सोचता बहुत है...?
बड़े लोगों की बड़ी पार्टी है, धूम-धड़ाका, खाना-पीना, नाच-गाना, फैशन परेड, भीड़-भड़का- देर रात तक माहौल पूरा रंगीन, चमक-धमक रहेगी। पर इसमें मेरा क्या काम...? तू पांचवीं पास है न इसलिए तुझे अच्छा काम मिला है। नहीं तो मुझे बर्तन साफ करने का काम मिलता। किशना अपनी पढ़ाई के लिए पहले माता-पिता को कोसता था परन्तु आज उतनी ही पढ़ाई ने उसके लिए जीने की नई राह दिखाई तो आत्मा मन उनके प्रति कृतज्ञता से भर गया था। देख यहां काम तो बहुत होता है, लोग भी बहुत होते हैं सबके अलग-अलग काम हैं तभी रात रंगीन हो पाती है, देख रहा है रौशनी की चकाचौंध, पैसों का तमाशा।
चल उठ अब पानी-पेशाब कर ले आगे चार-छह घंटे कुछ भी खाना-पीना नहीं मिलेगा। तुझे बड़े लोगों के साथ आए उनके रईसजादों का मनोरंजन करना है। उन्हें हंसाना-खिलाना है ताकि इस दौरान वे अपने पालकों को परेशान न करें। चल अपना कपड़ा उतार दे और यह ड्रेस पहन ले, यह मुखौटा है, इसे सिर पर लगा लेना इसमें आंख के पास छेद है वहां से सब दिखता है। आज तेरे हिस्से में ये लॉफिंग बुड्ढा आया है। कभी एक जगह दोनों हाथ ऊपर कर खड़े हो जाना, थक जाए तो बच्चों से हाथ-मिलाकर घूम-फिरकर हाय-हैलो करते रहना, ध्यान रहे कि- कोई बच्चा रोने न पाए, किसी बच्चे को मारना, पीटना, धक्का देना मना है। खाने की चिंता मत करना, रात वापसी में दो-तीन दिन का जुगाड़ हो ही जाएगा, ये बड़े लोग हैं, खाते कम हैं, फेंकते ज्यादा हैं।  किशना, मुखौटे को उठाकर चूमने लगा, ऊपर सिर उठाकर ईश्वर को धन्यवाद दिया, कि उसने उसे गलत राह तो जाने न दिया इज्जत का काम दिया है, पहचान गुम होने का खतरा जरूर है पर अनुभव तो मिलेगा ही, फिर सेठ जी का भरोसा मिले तो काम मिल ही जाएगा। हंसना-हंसाना वह भी भूखे, पेट, बेमन से। हां यही रोजगार है जैसे पैसे दिलाएगा, पेट की भूख के लिए, किशना ने ऐसा करना स्वीकारते हुए मुखौटा सिर पर लगा लिया। रामू के मुंह से बरबस ही निकला, अरे तू तो स्मार्ट लग रहा है रे। लगता है ये तेरे लिए ही खाली रह गया था। तेरा चेहरा तो खिला-खिला है। किशना भीतर तक कांप गया। मुखौटा देखकर भी यहां आत्मा की अनुभूतियों को पढ़ लेने के हुनरमंद लोग जमाने में हैं। अपनी स्थितियों ने उसे हंसने-हंसाने की अनुमति अब तक नहीं दी थी। अब वह पहली बार हंसते हुए सोच रहा था कि- कुछ खुशियां इतनी उदास क्यों होती हैं...? चलो अच्छा है कि इस मुखौटे ने उसकी तमाम तकलीफों को छिपा लिया है। अब वह अद्भुत सहनशीलता और उल्लासमयी जिज्ञासा लिए कहने लगा- चल भाई राजू कहां चलना है...? अरे जल्दी क्या है...? रा इनसे तो मिल ले, डरना नहीं कहीं इनसे...? ये है- भालू, शेर, मोटा सेठ, नोबिता... अब किशना सचमुच हंस पड़ा, अरे यहां भी भीड़ है। रामू ने कहा- हां जब पूरी दुनिया अपने चेहरे पर मुखौटा लगाकर घूम रही है, कथनी-करनी में फर्क करती है तो दो रोटी के लिए चेहरे पर वाकई मुखौटा लगाना और अपनी पहचान छुपाना गलत नहीं है- किशना! चलो दोस्तों पार्टी का मजा लेते हैं।
पार्टी में प्रवेश करते ही व्यंजनों की खुशबू ने उसके नथुनों से टकराकर अंतड़ी को सक्रिय कर दिया, तुरंत उसने अपने आपको संयत किया। पहली नजर उसे अजीब सी लगी, लगा कि वह अब अपनी आत्मा की नजरों से देख रहा है। अच्छा है अब वह सब कुछ देख सकता है जिसे लोग छिपाना भी चाहते हैं छिप न पाएगा..! क्योंकि ऐसा देखते हुए कोई उसे नहीं देखेगा। किशना ने देखा कि- बुढ़ापे से हार मानकर यौवन का ढोंग रचाए लोग इतराते हैं... मजहब और सियासत कैसे गले मिलते हैं...? राजनीति की बिसात कैसे बिछाई जाती है...? ऊंट किस करवट क्यों बैठता है...? ऊंट को पहाड ़के नीचे कब, कैसे ले जाया जाता है...? सास-बहू के किस्से इतने मजेदार कैसे बनाए जाते हैं...? शिक्षा का दिवाला कैसे निकाला जाता है...? घर में कलह-क्लेश, मौसम की बातें, पवित्र रिश्तों को गंदा बनाने के नुस्खे... सब कुछ उसे दिखाई-सुनाई दे रहा था। बिलकुल नि:शुल्क प्रशिक्षण शिविर है यह, आज का आदमी बनने के लिए। किशना बच्चों के साथ मस्त था हंसता-झूमता आखिरकार उसने पाया कि- अर्थशास्त्र, संस्कारों के सीने पर चढ़कर उसका गला दबा रहा है...।
अब हर रोज उसे काम मिलता, रोज पार्टी, रोज वही चेहरे, नकाब बदले हुए। किशना भी अब जमाने के साथ मुखौटा बदलने लगा। तमाम मुखौटे वालों की यूनियन बनाकर उसका लीडर हो चुका था और अपने लिए तमाम सुविधाएं प्राप्त कर वह शहर का प्रमुख लेबर सप्लायर हो चुका था। उसके सपने अभी और भी हैं वक्त के साथ उसने कदमताल करनी अब शुरू कर दी है...।