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Friday 24 Nov 2017

अक्षर पर्व का जून 14 का शेक्सपियर विशेषांक काफी देर से पढऩे को मिला।

 

अक्षर पर्व का जून 14 का शेक्सपियर विशेषांक काफी देर से पढऩे को मिला। प्रसन्नता हुई यह देखकर कि हिन्दी की एक पत्रिका ने अंग्रेजी के महान नाटककार को इस प्रकार की श्रद्धांजलि दी है। शेक्सपियर के कई पहलुओं पर विद्वतापूर्ण लेख पढऩे को मिले। लेकिन शेक्सपियर की महान लोकप्रियता का एक हास्यास्पद और मनोरंजक पहला अछूता रह गया। शेक्सपियर हिन्दी फिल्म निर्माताओं और लेखकों के पूर्वज थे। दुनिया में जो कहीं नहीं होता वह या तो शेक्सपियर के सुखांत नाटकों में होता है या हिन्दी फिल्मों में। चार सौ वर्ष पूर्व शेक्सपियर ने जैसी असंभाव्य परिस्थितियां निर्माण की थी वे विश्वास से परे लेकिन मनोरंजक थीं। हिन्दी फिल्मों में पुरुष वेश में स्त्री ऐसी ही एक परिस्थिति है। मर्चेन्ट ऑफ वेनिस में पोर्शिया पुरुष वेश में राजा के दरबार में आती है लेकिन कोई उस पर स्त्री होने का शक नहीं करता। यहां तक कि उसका पति भी उसे पहचान नहीं पाता। शेक्सपियर की कॉमेडीज में विचित्र लेकिन मनोरंजक युक्तियां हैं जो हिन्दी फिल्मों में आई हैं। पिता की पसंद के अनुरूप विवाह न करने पर जीवनभर विवाह न करने की कसम रूप बदलकर फिल्मों में आई है। जुड़वां भाई-बहन का बिछुडऩा, लास्ट एंड फाउंड थ्योरी बनकर फिल्मों में आया। विशुद्ध वैज्ञानिक और बुद्धिवादी दृष्टिकोण रखने वाले विद्वान भी मनोरंजन के लिए असंभाव्य घटनाओं को हिन्दी फिल्मों में शेक्सपियर के नाटकों में स्वीकार कर लेते हैं।
हिन्दी के साहित्यप्रेमियों के लिए शेक्सपियर पर इतने अधिक विश्लेषणात्मक लेख एक ही अंक में पिरोने के लिए अभिनंदन।
-प्रकाश गुप्ते, द्वारा- अभिजित गुप्ते
ई-101, सेटेलाईट गार्डन, फिल्मसिटी रोड
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