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Tuesday 21 Nov 2017

अक्षरपर्व का जनवरी अंक मिला। एक दिन में पूरा अंक पढ़ गया। इस बार श्री ललित सुरजन जी प्रस्तावना भी नए ढंग की है।

अक्षरपर्व का जनवरी अंक मिला। एक दिन में पूरा अंक पढ़ गया। इस बार श्री ललित सुरजन जी प्रस्तावना भी नए ढंग की है। मान्य. स्व. श्री अशोक सकसेरिया जी पर मार्मिक सामग्री आप ने दी है। अब ऐसे लोग कहां हैं? लोग तो अब चाय पिलाने के लिए भी कतरा जाते हैं । अपने माता-पिता की अवज्ञा नहीं, सिर्फ  दुत्कारना करते हैं। उनके इस लेख से सबक लेना चाहिए। डॉ. रमेश चंद्र महरोत्रा जी पर भी गुनने लायक सामाग्री आप ने दी है। दरअसल, संस्कृत व्याकरण को आंशिक रूप से हिंदी भाषा पर लादने से गड़बड़ी होती है। बिहार के लोग कई शब्दों को पुल्ल्ंिाग लिखते हैं। कुछ तो जनप्रयोग के कारण भी उलट-सुलट हो जाते हैं। सन् 1966 में हिंदी वर्तनी का मानकीकरण किया जा चुका है, जिससे हिंदी पढऩे-लिखने वालों की समस्या आसान हो चली है।
वैसे महाराष्टï्र में धर्मयुग पत्रिका हर घर की मानक पत्रिका थी। अब वैसी कोई पत्रिका नहीं है। परिदृश्य प्रकाशन, दादा संतूक लेन, मरीन लाइंस, मुंबई-2, सस्ता साहित्य मंडल एवं ए.एच. व्हीलर के माध्यम से अक्षरपर्व इस खाली जगह की पूर्ति कर सकती है।
- रतिलाल शाहीन , गोरेगांव पश्चिम, मुंबई-400104, मो.9702152789