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Monday 20 Nov 2017

\'अक्षर पर्वÓ के उत्सव अंक के अवलोकन का अवसर देने के लिए धन्यवाद । वर्ष में एक अंक सांस्कृतिक विरासत में प्राप्त उत्सवों को समर्पित करने की योजना वास्तव में सराहनीय है। उत्सव हमारे जीवन में प्राणवायु का संचार करते हैं।

  'अक्षर पर्वÓ के उत्सव अंक के अवलोकन का अवसर देने के लिए धन्यवाद । वर्ष में एक अंक सांस्कृतिक विरासत में प्राप्त उत्सवों को समर्पित करने की योजना वास्तव में सराहनीय है। उत्सव हमारे जीवन में प्राणवायु का संचार करते हैं। भारतीय संस्कृति सदा से ही उत्सवधर्मी रही है। हमारे यहां एक कहावत प्रचलित है - आठ वार और नौ त्यौहारÓ अर्थात् उत्सव मनाने के लिए वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन भी कम पड़ते हैं। किन्तु आज हम कथित प्रगतिशीलता और आधुनिकता की अंधी दौड़ में परम्परागत प्राचीन उत्सवों को भूलते जा रहे हैं।
रमाकान्त श्रीवास्तव के किस्सा कुंवर रसालू में लेखक की गवेषणात्मक प्रतिभा और शोधपरक दृष्टि का परिचय मिलता है। उनकी वर्णन शैली भी रोचक व आकर्षक है। लोक कथागीतों में ऐतिहासिकता तो रहती है किन्तु उसमें काल्पनिकता के इतने पुट लग जाते हैं कि तार से तार मिलाना कठिन हो जाता है। साथ ही किस्से और कथागीत परिव्राजक की भांति निरन्तर एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश तक अलख जगाते घूमते रहते हैं इसलिए इनमें स्थानीय पुट और विविधता का समावेष अनिवार्य है। कथागीतों को आकर्षक और मनोरंजक बनाने के लिए कल्पना की उंची उड़ान लगायी जाती है। तोता मैना और रानियों की बेवफाई किस्से के अनिवार्य तत्व माने जाते हैं। और अंत में सात्विक साहित्य की भांति अनैतिकता पर नैतिकता की विजय बतायी जाती है। श्री श्रीवास्तव का आलेख हमें यह सोचने को भी विवश करता है कि किस प्रकार विदेशी विद्वानों नेे जिनका भाारतीय संस्कृति से कोई लेना देना नहीं, और जिनका इन विषयों से कोई सीधा सरकारी सरोकार नहीं रहा, भारत की लोक संस्कृति, इतिहास यहां तक कि भाषा और बोलियों के विषय में भी गहन विवेचन प्रस्तुत कर हमाारे लिए अनुकरणीय आदर्श पेश किया है।  'अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजोÓ में डॉ. शुभ्रा शर्मा  ने आज की सामाजिक समस्या को बहुत ही भावुक स्वरूप से उजागर किया है। कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् से महर्षि कण्व के शकुन्तला की विदाई के समय भावविह्वïल हो जाने का  प्रसंग उद्धृत करने से  आलेख  और भी मार्मिक बन गया है। सीता और शकुन्तला दोनों ही पराई पुत्रियां थी और दोनों को पराये पिताओं ने पाला था और उन्हें अतिशय स्नेह दिया था। आज के माहौल में यह संदेश कितना प्रासंगिक है यह कहने की आवश्यकता नहीं है। देश के प्राय: सभी प्रदेशों को प्रतिनिधित्व देकर देश की संस्कृति का गुलदस्ता प्रस्तुत करने का प्रयास संपादकीय कौशल का प्रतीक है। संपादकीय कौशल के एक और उदाहरण का उल्लेख भी आवश्यक लगता है। अंक के अंत में दो साक्षात्कार दिये गये हैं। इंटरव्यू लेना पत्रकारिता की कठिनतम विधा माना जाता है। विष्णु प्रभाकर के साक्षात्कार को लोक संस्कृति का आधार बनाकर उत्सव अंक की विषयवस्तु से जोड़ देना ही संपादकीय कौशल है। डोगरी की प्रसिद्ध कवयित्री पद्मा सचदेव के साक्षात्कार में यह सामयिक तथ्य उभरकर सामने आया है कि आज का आदमी मोबाइल में इतना मुब्तिला हो गया है, खो गया है कि उसे दीन दुनिया की तो क्या अपनी भीे खबर नहीं रहती।  अंत में एक बात और। गवरी नृत्य संबन्धी लेख में बार बार सत्यता शब्द का प्रयोग हुआ है। सत्य स्वयं भाववाचक संज्ञा है अत: उसे पुन: ता प्रत्यय जोड़कर भाववाचक बनाने की आवश्यकता नहीं रहती। अच्छाई, बुराई की तर्ज पर कुछ लोग सचाई शब्द का प्रयोग करते हैं किन्तु वे यह भूल जाते हैं कि अच्छा और बुरा विशेषण हैं अत: उनसे भाववाचक संज्ञा बनाने के लिए प्रत्यय का प्रयोग उचित है। अक्षरपर्व जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में हिन्दी के मानक स्वरूप का ही प्रयोग हो इसकी अपेक्षा तो करनी ही चाहिये।
-भगवान सहाय त्रिवेदी
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