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Thursday 23 Nov 2017

अक्षरपर्व दिसम्बर अंक की प्रस्तावना में आपने श्री बद्रीनारायण रचित पुस्तक के हवाले से लीडर आफ दलित्स : कांशीराम जी के सामाजिक व राजनीतिक व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को बखूबी उजागर किया है।

अक्षरपर्व दिसम्बर अंक की प्रस्तावना में आपने श्री बद्रीनारायण रचित पुस्तक के हवाले से लीडर आफ दलित्स : कांशीराम जी के सामाजिक व राजनीतिक व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को बखूबी उजागर किया है। सर्वमित्राजी का स्त्री अधिकार हनन की निरंतरता शीर्षक उपसंहार काबिलेगौर है। आधुनिक युग में भी नारी जीवन के शोषण की भीषण त्रासदी का कहींअंत दिखाई नहींदेता। अशोक अंजुम की ग़ज़़लें प्रीतिकर लगीं। हिन्दी की पहली कहानी पर प्रेमकुमार जी के विचारों में कुछ नूतन स्थापनाएं चिंतनीय हैं। पं.नेहरू पर डॉ.वज्रकुमार पांडेय, कृश्नचंदर  व रवीन्द्रनाथ पर आलेख ने प्रभावित किया।
जनवरी अंक की प्रस्तावना में मलयजी के नए काव्य संकलन के हवाले से ललितजी ने उनके कविकर्म का सुचारू रूपेण रसास्वादन करवाया है। उपसंहार में गीता को राष्ट्रीय दर्जा देने की हिमायत करने वालों को सटीक जवाब दिया गया है। कविताएं अच्छी हैं, गीत-गज़़लों का अभाव खटकता है। निराला का भिक्षुक और दास्तान दोहे की दोनों ही आलेख महत्वपूर्ण हैं, भारत यायावर व डा.शिवनंदन कपूर को मुबारकबाद। समीक्षाएं संतुलित हैं।
-प्रो.भगवानदास जैन, अहमदाबाद 382445 (गुजरात)