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Saturday 18 Nov 2017

प्रधानमंत्री के तोहफों की नीलामी

सर्वमित्रा सुरजन
भारत गांवों का देश है। गगनचुंबी इमारतों, फ्लाईओवरों, शापिंग मालों से दमकते महानगरों का देश है। भारत गरीबों का देश है, जहां कई करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे या ऊपर जीवन यापन करते हैं। भारत ऐसे अमीरों का देश है जो चार जनों के परिवार के लिए 27 मंजिला महल बनवाते हैं। भारत लोकतांत्रिक देश है, जहां एक चायवाला भी प्रधानमंत्री बन सकता है। भारत में राजतंत्र कायम है, जहां प्रधानमंत्री राजा की तरह है, जो दस लाख का सूट पहनता है, और उस गांधी का नाम लेता है, जो भारत के गरीबों के कारण अधनंगा फकीर बन कर रहा। भारत अब तक अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषायी, सामाजिक विविधता के कारण विदेशियों के लिए पहेली रहा है। विदेशियों की दिलचस्पी इस बात में हमेशा रही है कि इतनी विविधताओं वाले देश में एकता कैसे कायम रहती है। अब शायद उनकी जिज्ञासा इस बात में भी हो कि भारत में किस किस्म की आर्थिक विविधता भी है। संविधान में भले सबको बराबरी का अधिकार मिला हो, अर्थतंत्र ने उस संवैधानिक भावना की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। जिनके पास पैसे नहींहैं, वे भूखे मरें या कुपोषित रहें। जिनके पास पैसे हैं वे 5 हजार रूपए प्लेट के भोजन का लुत्फ उठाएं। जिनके पास पैसे नहींहैं वे न पढ़े या सरकारी स्कूल में दाखिला ले लें (अगर मिल जाए तो), जिनके पास पैसे हैं वे 10 लाख का डोनेशन देकर पढ़ लें। जिनके पास पैसे नहींहैं वे बीमारी से मर जाएं या सरकारी अस्पताल के बाहर कतार में खड़े हो जाएं, जिनके पास पैसे हैं वे पांच सितारा अस्पतालों में इलाज करवाएं या विदेश चले जाएं। जिनके पास पैसे नहींहैं वे तन ढंकने के लिए किसी तरह कपड़ों का जुगाड़ कर लें, जिनके पास हैं वे हर मौसम के लिए कपड़ों की अलग-अलग अलमारियां रखें या फिर सत्ता के शीर्ष पर काबिज हो 10 लाख का सूट पहनें। तिस पर भी जनसेवक कहलाने का शौक बाकी रहे तो उस सूट की नीलामी करवाएं और उसके पैसे देशहित में लगाएं। दिल्ली चुनाव हारने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसी किस्म की जनसेवा और देशहित में लग गए हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए जब उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा ने अपना चेहरा बनाया तो उनके पहनावे पर सबका बड़ा ध्यान गया। उनका चूड़ीदार-कुर्ता, जैकेट, कभी सिर पर साफा, कभी कंधे पर पड़ी शाल, इन सबको उनके प्रचारकों ने अपने अंदाज में बिना कुछ कहे, पेश किया। टीवी पर जब वे दिखें तो किस कोण से बेहतर लगेंगे, मंच पर जब हों तो उन्हें कैसे जाना चाहिए, अमरीका यात्रा में पहनावा क्या हो, जापान और आस्ट्रेलिया में क्या हो, हर बात का बारीकी से ध्यान रखा गया। समय के अनुकूल उनके कुर्तों और जैकेटों के रंग बदलते रहे। कभी केसरिया, कभी हरा, कभी भूरा, कभी गाढ़ा नीला। भाजपा का उद्देश्य देश के युवाओं को अपने साथ लाना है। इसलिए पार्टी के बुजुर्गों को उसने विदा कह दिया। मोदीजी भी युवा नहींहैं, लेकिन युवाओं को कैसे लुभाना है, उन्हें पता है। इसलिए जोश भरी बातें करते हैं और कपड़े भी ऐसे जो फैशन कहलाए। लेकिन देश बहुत दिनों तक बातों के जाल में या कपड़ों के रंग में उलझ कर नहींरह सकता। इस बात का अहसास प्रधानमंत्री मोदी और उनके फैशन डिजाइनरों को तब हुआ होगा, जब वे मफलर और कनटोप लगाने वाले, पतलून के बाहर आधी बाजू की शर्ट पहनने वाले अरविंद केजरीवाल से दिल्ली चुनावों में बुरी तरह मात खा गई। अपना नामधारी सूट पहन नरेन्द्र मोदी के अहंकारी व्यक्तित्व को थोड़ी और संतुष्टि मिली होगी। बराक ओबामा का ध्यान उनके सूट पर गया या नहीं, नहींमालूम, लेकिन देश की जनता इसे देखकर खुश नहींहुई। मायावती जी भी अपने धन-वैभव का खुला प्रदर्शन करने में यकीन रखती रही हैं, लेकिन उनके समर्थकों का मोहभंग उनसे नहींहुआ, बल्कि वे प्रसन्न होते थे कि एक दलित अपना जन्मदिन सवर्णों की शान से मना रही है। भाजपा और मोदीजी के मामले में ऐसा समीकरण नहींबैठ पाया। चुनावों के वक्त अपने चायवाला होने का जिक्र मोदीजी ने खूब किया, यह नहींकहा कि वे तीन बार मुख्यमंत्री चुने गए हैं और अब प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। जनता उन्हें वही जमीन से जुड़ी छवि में याद कर रही थी कि उनकी आन-बान-शान ने उस याद को तार-तार कर दिया। अब इस भूल-सुधार के लिए प्रधानमंत्री ने सूरत में दस लाख के सूट समेत, उपहार में मिले अन्य सामानों को नीलामी के लिए दिया और उस राशि को नमामि गंगे परियोजना में लगाने का ऐलान किया। भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को मिले उपहार, उनकी निजी नहींवरन राष्ट्र की संपत्ति होते हैं और उन्हें सरकारी तोषखाने में जमा किया जाता है। नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री रहते हुए भी इसी तरह नीलामी करवाते थे, अब भी उन्होंने वही तरीका अपनाया है। उनके इस कदम से अच्छी-खासी रकम जुटी और मुमकिन है उसका सदुपयोग भी हो। लेकिन उनका यह कार्य राजसी मिजाज के मुताबिक ही लगता है, जिसमें राजा प्रजा के लिए काम तो करता है, पर उसका अहसान भी जताता है। हो सकता है इस नीलामी के बाद देश मोदीजी को तराजू में सोने के सिक्कों के साथ तौला जाता देखे और उस रकम को प्रधानमंत्री जन-धन योजना में दान कर दिया जाए।