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Monday 20 Nov 2017

शोक समाचार

शोक समाचार
'मुर्दहिया'कार डॉ. तुलसी राम नहीं रहे। 13 फरवरी की सुबह फरीदाबाद के रॉकलैंड अस्पताल में उन्होंने आखिऱी साँसें लीं। यह ख़बर हिंदी जगत और हिन्दुस्तान की वाम-जनवादी ताक़तों के लिए स्तब्धकारी है, यद्यपि हम सब जानते थे कि यह ख़बर कभी भी आ सकती है। वे लम्बे समय से बीमार चल रहे थे। हर हफ़्ते दो बार उन्हें डायलिसिस पर जाना होता था। इसके बावजूद वे सक्रिय थे और देश में साम्प्रदायिक दक्षिणपंथ के उभार के खि़लाफ़, अपनी शारीरिक अशक्तता से जूझते हुए, लगातार लिख-बोल रहे थे। नवम्बर महीने में हुए जनवादी लेखक संघ के दिल्ली राज्य सम्मलेन में उन्होंने उद्घाटन-भाषण दिया था और उससे पहले जून महीने में 'आम चुनावों में मीडिया की भूमिकाÓ पर आयोजित जलेस की संगोष्ठी में भी उन्होंने लंबा वक्तव्य दिया था जो कि 'नया पथÓ के अप्रैल-सितम्बर 2014 के अंक में अविकल प्रकाशित है।
1 जुलाई 1949 को जन्मे डॉ. तुलसी राम सेंटर फ़ॉर इंटरनेशनल स्टडीज़, जे.एन.यू. में प्रोफेसर थे। वे विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन और रूसी मामलों के विशेषज्ञ थे। अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध आन्दोलन, दलित आन्दोलन और हिंदी साहित्य में भी उनकी गहरी पैठ थी। कार्ल माक्र्स, महात्मा बुद्ध और डॉ. अम्बेडकर को अपने पथप्रदर्शक विचारक माननेवाले तुलसी राम जी ने हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों में प्रभूत लेखन किया। 'मुर्दहियाÓ और 'मणिकर्णिकाÓ शीर्षक से छपी उनकी आत्मकथा के दोनों खंड हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि के रूप में मान्य हैं। इनके अलावा 'अंगोला का मुक्तिसंघर्षÓ, 'सी आई ए : राजनीतिक विध्वंस का अमरीकी हथियारÓ, 'द हिस्ट्री ऑफ़ कम्युनिस्ट मूवमेंट इन ईरानÓ, 'पर्शिया टू ईरानÓ, 'आइडियोलॉजी इन सोवियत-ईरान रिलेशंस (लेनिन टू स्तालिन)Ó इत्यादि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं।
लेखक-विचारक के रूप में डॉ. तुलसी राम की अथक संघर्षशीलता हम सब के लिए अनुकरणीय है। अपने जीवन के आखिऱी महीनों में दवाइयों की मार से कमज़ोर हो चुके शरीर को लिए वे हर जगह जाने के लिए तैयार रहते थे। जलेस के दो कार्यक्रमों में जिन लोगों ने उन्हें सुना, वे जानते हैं कि दवाइयों के असर से उनका गला बुरी तरह बैठ चुका था, बहुत ज़ोर लगाकर बिलकुल फंसी हुई मद्धिम आवाज़ में बोल पा रहे थे, पर उन्होंने हार नहीं मानी और साम्प्रदायिक दक्षिणपंथ के ख़तरों के बारे में विस्तार से बोले। दोनों कार्यक्रमों में उनके विचारों की गहराई और गंभीरता के अलावा उनका यह जीवट भी चर्चा का विषय रहा।
दलित समुदाय  में जन्मे डॉ. तुलसी राम अस्मितावादी राजनीति के खि़लाफ़ थे और माक्र्सवाद-अम्बेडकरवाद का साझा मोर्चा बननेवाली वाम-जनवादी राजनीति के हामी थे। हिंदी समाज को अभी उनसे बहुत कुछ जानने-सुनने की उम्मीद थी। मात्र 65 वर्ष की आयु में उनका दुनिया को अलविदा कह देना संकटों से घिरे इस दौर में हम सब के लिए बहुत बड़ी क्षति है। जनवादी लेखक संघ उन्हें नमन करता है।     
 मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, जलेेस