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Sunday 19 Nov 2017

विजेन्द्र की अग्निज वाणी

अमीर चन्द वैश्य
चूना मण्ड़ी बदायूँ, उत्तर प्रदेश, 243601
मो0 09897482597
अस्सी वंसत के पार पहुँचे वरिष्ठ लोकधर्मी कवि विजेन्द्र के दो नए कविता संकलन सन् 2014 में प्रकाश में आए हैं। पहले संकलन का शीर्षक है बेघर का बना देश। दूसरे का शीर्षक है मैंने देखा है पृथ्वी को रोते।
विजेन्द्र साधक कवि हंै। उन्होंने अपनी काव्य-साधना का प्रारम्भ सन् 1966 में प्रकाशित त्रास नामक कविता संकलन से किया। तब से 2013 तक उनके 19 कविता संकलन प्रकाश में आ चुके हैं। इनके अलावा दो काव्यनाटक अग्निपुरूष और क्रौंचवध 2006 में प्रकाशित हुए। इसके अलावा विजेन्द्र ने लोकधर्मी कविता को समझने और समझाने के लिए तीन साहित्यिक डायरियाँ प्रकाशित करवाई हैं और साक्षात्कारों का एक संकलन भी प्रकाश में आया है। लोकधर्मी कविता के सौन्दर्यशास्त्र के चिन्तन-मनन पर एक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है और दूसरी प्रकाशित होनेवाली है। विजेन्द्र कवि होने के साथ-साथ आलोचक भी है। इसलिए उनके कविता विषयक आलोचनात्मक निबन्ध भी प्रकाश में आए हैं। उन्होंने अपने निबन्धों में समकालीन कविता की आधुनिकतावादी प्रवृत्ति की तीखी आलोचना की है और लोकधर्मी कविता का समर्थन किया है। उनकी अपनी मान्यता है कि नई कविता का शुभारम्भ निराला के परवर्ती काव्य से होता है। विशेष रूप से उनकी प्रसिद्ध कविता तोड़ती पत्थर (1937) से। अपनी बात के समर्थन में विजेन्द्र ने अनेक तर्क प्रस्तुत किए है, जो ठीक मालूम होते हंै। वह अपने काव्य-गुरू त्रिलोचन के समान अपने सारे जीवन की साँसें काव्यसर्जना रूपी यज्ञ को समर्पित करते रहे  हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति आस्थावान् विजेन्द्र ऐसे वरिष्ठ कवि है, जिन्होंने संघर्षशील लोक को अपने काव्य का नायक बनाया है। अतएव उनकी कविताओं में श्रमशील और जुझारू किसानों और मजदूरों के क्रियाशील बिम्ब प्रचुर रूप लक्षित होते हैं। विजेन्द्र माक्र्सवादी दर्शन के प्रति आस्थावान् हैं। इसलिए वे अपने समय, समाज और इतिहास को वर्गीय दृष्टि से देखते परखते है। उनकी सहानुभूति संघर्षशील लोक के प्रति व्यक्त होती है और तीखी आलोचना प्रभु वर्ग के प्रति। विजेन्द्र की जन्मभूमि बदायूँ जनपद का गाँव धरमपुर है और कर्मभूमि है राजस्थान के विभिन्न स्थान। अर्थात् भरतपुर, चूरू, नोहर, जयपुर। उन्होंने लगभग तीन दशक भरतपुर में बिताए है। अतएव उनकी कविताओं मेें भरतपुर के जनजीवन और उसके परिवेश के अनेक आकर्षक बिम्ब और क्रियाकलाप लक्षित होते हंै।
बेघर का बना देश में उनकी मझोली और अनतिदीर्घ कविताएँ संकलित हैं। प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध के बाद विजेन्द्र ने ही सर्वाधिक सार्थक लम्बी कविताएँ रची हैं। लेकिन फैंटेसी के शिल्प का सहारा कहीं भी नहीं लिया है। वह फैंटेसी को बिगड़ैल घोड़ी मानते हैं। उनकी अधिकतर लम्बी कविताएँ वर्णनात्क है। चरित्रप्रधान हैं। नाटकीय हैं। एकालाप और आत्मालाप शैली में हैं।
बेघर का बना देश में संकलित कविताएँ 2012 और 2013 में रची गई हैं। इन कविताओं की रचना से पूर्व विजेन्द्र अपने गाँव धरमपुर परिवार सहित पहुँचे थे। लगभग 55 वर्षों के बाद। वहाँ से लौटकर उन्होंने नई रचनात्मक ऊर्जा का अनुभव किया। उसी का परिणाम इस संकलन की कविताएँ हैं। इन कविताओं की अन्तर्वस्तु के मूल में करूणा का भाव निहित है, जो सात्विक क्रोध को प्रेरित करता है। मुझे जगाने दो सरस्वती को कविता में विजेन्द्र उन सत्तामुखी कवियों की आलोचना करते है जो मुठ्ठी भर सिक्कों के लिए अपना ईमान बेचते हैं और झूठे यश के लिए भूखे रहते हैं। वे वर्तमान कविता की अन्तर्वस्तु के लिए बहुत चिन्तित हंै। इसलिए वे कहते है - कविता से आदमी गायब है/पेड़-पौधे, वन लताएँ/ फूल, घास, नदियाँ विषाक्त हैं। (पृ. 16) कविता से आदमी गायब है वाक्य का आशय क्या है। यह है कि समकालीन कविता में दलित शोषित और जुझारू आदमी की क्रियाएँ रूपायित नहीं की जा रही हंै और न ही उसका ऊबड़-खाबड़ परिवेश। वस्तुत: कविता में मानव के क्रियाकलाप के साथ प्राकृतिक परिवेश के सौन्दर्य की उपस्थिति अनिवार्य है। विजेन्द्र ऐसे ही कवि हैं जिन्होंने अपने समय और समाज के जुझारू मनुष्य के साथ-साथ उसके प्राकृतिक परिवेश का वास्तविक निरूपण किया है। वे कहते हंै - कहाँ थमा पृथ्वी का घूमना/सूर्य का उगना/चन्द्रकलाओं में छिपी/मेरे प्यार की अनगँूजें/यह धरती अन्न उगाने को/जिन्होंने कमाई है अपने पसीने से/वे ही हैं मुकुट के अधिकारी सच में। (पृ.15)
संकलन में एक महत्वपूर्ण कविता का शीर्षक है तल छट। वर्ग-विभक्त समाज का सर्वहारा वर्ग तलछट में पैठी गाद के समान होता है। कवि को उसकी यह स्थिति अप्रिय मालूम होती है इसके लिए वह व्यवस्था की आलोचना करता है। वह कहता है - ओह, कितना कठोर घेरा है शोषकों का/तुम खाली हाथ हो, निहत्थे/शत्रु बहुत शक्तिशाली हंै/इसे कभी मत भूलो/पहचानो उसके दंश को/समर में दक्ष जनता/शत्रु की ताकत को/शिथिल करती है बिना युद्ध के ही/बड़े बड़े दुर्गों को ढहाती है/बिना ध्वंस के/सिंहासन उलट जाते हैं/बिना किए सारा रक्तपात/तुम्हारे इरादे पुख्ता हों/सर्वहारा संगठित हो हर कोई/कोई भी सेना नहीं झुका पाएगी उसे। (पृ. 122)
विजेन्द्र अपने समय समाज की विषमताएँ और परिघटनाएँ आत्मपरक शैली में प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि उनके जीवन का दुख-दर्द सम्पूर्ण समाज और विश्व के दुख-दर्द से एकात्म हो जाता है। उनकी मान्यता है- गहरे अवसाद के तीर/जब तक वेधें/नहीं पता चलता/खुशी का/जीवन की क्यारियों में उगती खरपत/मारता रहा हूँ/तुम व्यंग्य से देखते हो/मेरी खुशी को/ $ $ $ और वह आगे कहते हैं -ओ दुख, तू बना रहे/मेरे उजड़ते खरपतियाए जीवन में/मुझे खुशी देती रहेगी/जीवन की ताकत/हम एक हैं/एक ही रहेंगे। (पृ. 20, 21)। विजेन्द्र की कविताओं में प्रकृति के छोटे-छोटे दृश्य मानव की क्रियाओं के साथ घुल मिल गए हैं। इस दृष्टि से उनकी कई कविताएँ पठनीय हैं। एक कविता का शीर्षक है अनार का पेड़ आँगन में। कवि ने यह बिम्ब अपने गाँव धरमपुर के एक कच्चे मकान में अनार का पेड़ देखकर अंकित किया है। इस छोटी सी कविता में कवि आगे कहता है - सत्ताधीश खुश होता है/बँटे हुए गरीबों को दुखी देख/भूखे भेडिय़े टपकाते हैं आँसू/अंतडिय़ाँ चबाने को। आगे कवि कहता है - ओ देवताओं/इन्हें भी तो देखो/जो करते हंै आराधना/अपनी मेहनत से देश की/तुम्हारे भोग के लिए उगाते हैं धान/ गेहूँ, चना, और जौ/भूखे रहकर सुखाते हैं अपना जीवन। (पृ. 23)।
विजेन्द्र जीवन-जगत् की परिघटनाओं का द्वन्द्वात्मक निरूपण करते हैं, क्योंकि प्रकृति में द्वन्द्वात्मकता विद्यमान है। पतझर के बाद वसंत आता है और रात के बाद दिन। पतझरे पात कविता में कवि ने पतझर को बलवान बताते हुए कहा है - कितना बलवान है पतझरा चारों ओर तलाशती आँखें/बाट जोहता रहा किसी खोए साथी की। (पृ. 24) वस्तुत: एक खोया हुआ साथी वसंत है जो पतझर के बाद आता है। अत: कवि ने ठीक कहा है - वसंत आता है/नए पंख फडफ़ड़ाता/हर हिलते तिनके में/झलकती निसर्ग की अदा। इन पंक्तियों में कवि ने मानवीकरण का सहारा लेकर वसंत को पक्षी के रूप में परिकल्पित किया है। अन्तिम पंक्ति झलकती निसर्ग की अदा में अदा पद का प्रयोग औचित्यपूर्ण ढंग से किया गया है। तत्सम् शब्द निसर्ग के साथ उर्दू शब्द अदा का प्रयोग कवि की निपुणता का अच्छा प्रमाण है।
विजेन्द्र को वे कविताएँ आकृष्ट करती हैं, जिनमें श्रमजीवियों की क्रियाओं के बिम्ब अंकित होते हैं। इसीलिए वे कहते हंै - अपने जाल को फेंकता मछुआरा/मछली को बेधती आँखें मैं उनके लिए भी लिखता हूँ /जिनके पास नहीं पहुँचती कविता/वो घास, खरपत, गोखुरू, हिरनखुरी/तँबई रेत में किलकिलाता ऊँटकटीला। क्योंकि सबने दिया है मुझे/जीवन का सत, जीने का सार/कितनी मोहक है ऋतु/फिर भी क्यों हूँ/विषादग्रस्त, वीतराग, जीवन-विमुख/क्यों क्यों क्यों। (पृ. 37 ) इस क्यों का उत्तर क्या है? उत्तर यह है कि अभी तक समाज में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ है।
कवि की दृष्टि अन्याय और अत्याचार पर भी केन्द्रित होती है। वह देखता है कि दुनिया में लोग कितने त्रस्त हैं/ कितने भूखे प्यासे/कुपोषण से मरते हुए। इस अन्याय और अत्याचार का कारण कौन है। कवि का उत्तर है। इतिहास के तानाशाह, क्योंकि एक के बाद एक तानाशाह बुझाते रहे हंै ज्योति पुजों को। (पृ. 46)
वस्तुत: विजेन्द्र की कविता अग्निज वाणी है, जो अंधकार में प्रकाश का प्रसारण करती है। इसीलिए वह कहती है कि अमरीका जैसे साम्राज्यवादी दैत्य को पछाड़ो, क्योंकि वह दैत्य है। क्रूर है। कुचाली है। महाकपटी है। अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष उसका कुचक्र है। विश्व व्यापार संगठन उसका इन्द्रजाल है। वह पूरी दुनिया के गरीबों का दुश्मन है। उनका रक्त पीता है। इसलिए ऐसे दैत्य को पछाड़ो। करूणा भाव से परिपूर्ण विजेन्द्र अपने समय समाज को देखकर कहते हैं: देखता हूँ खुश्क चेहरा /नग्न नाच करने वाली बालाओं का /देखता हूँ अपराध गरीबी का/ क्योंकि रोज आता है बोहरा/कर्ज न चुकने पर/कर लेते बहुत तो आत्महत्याएँ/तंग आकर/कुछ मार डालते अपने बच्चों को/कुछ होते हैं बेदिमाग घूमते है वन में/जीवन जीते कन कन में। (पृ. 87 )  
वर्तमान वर्गविभक्त समाज में संपन्न वर्ग पसीने की उपेक्षा करता है, क्योंकि वह पैसे से पसीना खरीद सकता है। लेकिन विजेन्द्र पसीने को गौरवान्वित करते हुए कहते हैं- जिसे तुम समझते हो पानी की बँूदें छलकती माथे पर/वो मेरे रोयों का सत है/एक वीर्य क्षण, सूर्य रज, चन्द्र रश्मि/पराजय की भोर झरन/मेरी रगों में बहता जीवन है/पहियों की तेज गाति के साथ/बाजार हो उठते है मालामाल/कम होता रहता है/मेरा रक्त/आँखों की रोशनी फीकी। (पृ. 93)
हमारे समाज में सामन्तवादी अवशेष आज भी जीवित हैं। इसीलिए विजेन्द्र कहते है कि सामन्त अभी जीवित हैं। वह दलित शोषित आदिवासियों के बारे में कहते  हंै  - तुम उनका दमन करो/पर वे बोलेंगे/वे उठेंगे एक साथ/सागर में ज्वार की तरह/तुम्हें देंगे मुँहतोड़ जवाब/अपने हकों के छिनने पर/उदयपुर के भूमिहीन गरीब आदिवासियों पर/हुआ है सामन्तों का दमन तेज। और आगे वे यह भी कहते हंै - भभकती है आँच भीतर ही भीतर/पृथ्वी के गर्भ में लावा/उबाल खाता मैग्मा/फूट कर जब निकेलगा एक दिन/नहीं रोक पाएँगे सैलाब आदिवासियों का/उफनता ज्वार पछाड़ें खाता सागर। (पृ. 100, 101)  कहने का आशय यह है कि पानी जब सिर से ऊपर उतरने लगता है तब मनुष्य अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयास निश्चित रूप से करता है।
विजेन्द्र ने अपने निजी जीवन में सामन्तवादी जीवन-मूल्यों के अभिशाप झेले हैं। उन्होंने अपनी छोटी पुत्री रोचना विश्वकीर्ति का विवाह एक ऐसे ठाकुर परिवार में किया, जो सामन्ती जीवन-मूल्यों का अनुयायी था। इस कारण उनकी पुत्री को अनेक मानसिक क्लेश झेलने पड़े। वह मानसिक रूप से इतनी संत्रस्त रहने लगी कि उसने 24 सितम्बर 2013 को आत्महत्या कर ली। यह सूचना उसके पुत्र लोकवर्धन ने कवि तक पहुँचाई। उस समय वह तुम्हारे लिए एक कविता की रचना कर रहे थे। संयोग से यह कविता रोचना विश्वकीर्ति को ही सम्बोधित है। शोक समाचार सुनते ही कवि इतना शोक-मग्न हो गया कि उसने बड़े मुश्किल से स्वयं को सँभाला और कविता के अन्त में मृत्यु को सम्बोधित करते हुए कहा - ओ मृत्यु/तू काल की अखज है मेरे लिए, काली घिन/जब तक जीवन में सौन्दर्य है, प्यार है, क्रिया है/मैं क्यों लगाऊँ तुझे अपने मुँह/गड़ा ले पैने नख चाहे जितने/मेरी पसलियों में।
(पृ. 50) यह है कवि की उद्दाम जिजीविषा, जो तब तक सक्रिय रहना चाहती है जब तक जीवन में सौन्दर्य है। प्रेम है। क्रियाशीलता है। यही कारण है कि कवि को अपनी निषेधी क्षमता पर पूरा विश्वास है अर्थात् जीवन की विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए वह अपने लक्ष्य की ओर बढऩा चाहता है। इसलिए उसका कथन है -यह मेरी निषेधी क्षमता की अग्निपरीक्षा/सदा बढ़ते रहने को आगे/आगे, आगे। (पृ. 51)
विजेन्द्र लगभग तीन दशक तक भरतपुर में रहे। वहाँ के जनजीवन और प्राकृतिक परिवेश से इतने घुल-मिल गए कि वह उनकी कविता में बार-बार बिम्बों के रूप में हमारे सामने प्रत्यक्ष होता है। घना का पक्षी बिहार बहुत प्रसिद्ध है, जहाँ देश-देशान्तर के पक्षी प्रजनन के लिए आया करते हैं। इस संकलन की एक कविता एक सुबह में कवि ने घना के प्रति अपने अनुराग का आत्मीय निरूपण किया है - मैं जानता था/घना मुझे खीचेंगा अपनी तरफ / एक पत्थर पर बैठा सोचता रहा/क्यों नहीं अघाता मन/वृक्षों से, रब्बी के भरे खेतों से/धूप में खुले नील नभ से। (पृ. 96) वह आगे यह भी कहते है - कई बार हुआ हूँ उदास/ऊबा हूँ अपने से ही/भरा हो जाने कितना विषाद/झीलों के तट कितने तरंगायित हैं/आती हैं पशुओं की भरी भरी आवाजें/$ $ $ झाडिय़ों से सरकते देखे/जलोन्मुख केकड़़े, केंचुए, अजब से कीट/देखा एक वृद्ध जन पास के गाँव का/टिका के लाठी चलता था/कमर झुका के/हाँकता अपने पशुओं को/आवाज में कड़क थी जीवन की/दो थी गायें/चार-पाँच कुन्नी भैसें/जल में खड़े वृक्ष सूखे निपात/सहे है मैंने भी आघात पर आघात। (पृ. 97) यह कवितांश पढ़कर मालूम होता है कि कवि की भाषा महाकवि निराला के परवर्ती काव्य के समान सहज बोधगम्य और सम्प्रेषणीय हैं।
विजेन्द्र का हृदय इतना अधिक संवेदनशील है कि उपेक्षित वन घासें उनका ध्यान अनायास आकृष्ट करती हैं।  कोई सुबह ऐसी नहीं कविता पठनीय हैं। इसमें कवि ने अनाम चिडिय़ा के प्रति अपने अनुराग की सहज अभिव्यक्ति की है। कविता के अन्त में कवि कहता है - वह नहीं जानती सौन्दर्य की परिभाषा/न मेरे प्यार का अर्थ/न मेरी कराहट पीड़ा/ फिर भी आँखें उसे खोजती हैं/दिन फूटते ही। (पृ. 14)
गोस्वामी तुलसी दास का कथन है कि कवि को आखर और अरथ का बल ही सच्चा बल होता है। वस्तुत: समर्थ कवि अपनी अनुभूति व्यक्त करने के लिए उपयुक्त शब्दों की तलाश करता है। विजेन्द्र ऐसे ही कवि हैं, जिन्होंने अपने गाँव धरमपुर और अपनी कर्मभूमि भरतपुर के परिवेश से असंख्य शब्द ग्रहण किए हैं। उनकी मान्यता है कि मनुष्य की क्रियाशीलता ने ही शब्दों का भण्डार भरा है। सामाजिक विकास के साथ-साथ भाषा का भी विकास हुआ है। जिस भाषा में जो शब्द है, वह इस बात का प्रमाण है कि वह किसी वस्तु विशेष की ओर इंगित कर रहा है। इसीलिए सारा संसार रूप और नाम से युक्त है। नाम का उच्चारण करते ही रूप उपस्थित हो जाता है। जैसे-जैसे सभ्यता और समाज का विकास हुआ है, वैसे-वैसे ही नाना प्रकार के शब्द अस्तित्व में आए। इसीलिए विजेन्द्र शब्द के बारे में कहते हैं - तुझे जोता गया है बैल की तरह/उत्खनित हुआ है पत्थर पर/गलाया गया है लोहे के साथ/वनवासियों ने रक्षा की है/तीर और धनुष से।  शब्द की महिमा का बखान करते हुए वह आगे कहते हैं - करता रहा है तू/अमूर्त को स्पश्र्य/अदृश्य को चाक्षुष/काल है गतिमय द्रव्य का एक रूप/जिसे तू बाँधता रहा है/हर कोर/मिलते रहे हैं मुझे/नए पथ/नए भूदृश्य सभंग/प्रथम कारक सभी का/तूने नहीं रहने दी जगह/किसी ईश्वर को किसी देवता को। (पृ. 33)
समीक्ष संकलन की लगभग सभी कविताएँ लयात्मक हैं। उनके वाक्यों में मानवीकरण, उपमा, रूपक, बिम्ब, सहज भाव से आते हैं। इस सन्दर्भ में अधोलिखित पंक्तियाँ पठनीय हैं - अभी रहूँगा इस धुमैली रोशनी में और/देखने को पात पियराते, झरते विभोर/ग्रेनाइट पर करती प्रहार छायाएँ सिलबटीदार/हवा बिस्तर समेटे भागती सी/पेड़ तनों से बतियाते/रहूँगा तुम्हें देखने को समय के वक्ष पर उकेरते/नाम अपना/प्रतिमानों के भग्नावशेष में/सिर धुन रही कविता/खण्ड़हरों में चीखते पत्थर/रहूँगा अभी सहने को/गहनतम पीड़ाएँ/भीगे डैनों को सुखाती/काली रात अंधड़ में/पराजय पर पराजय/थहाने को अथाह सागर/देखने को घिसे नखर/मृत्यु के साजे प्रखर। (पृ. 79)
विजेन्द्र भले ही कहें कि उन्हें पराजय पर पराजय प्राप्त हुई है। अथवा वे लक्षित होकर भी अलक्षित रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि वे हिन्दी की लोकधर्मी कविता को ऊँचाई पर देखना चाहते हैं। उनकी कविताओं के आधार पर लोकधर्मी कविता के  प्रतिमान निर्धारित किए जा सकते हैं। प्रतिरोध भाव और मानवीय करूणा की दृष्टि से इस संकलन की लगभग सभी कविताएँ आवयविक दृष्टि से सुगठित है और सन् 2014 में रचित हिन्दी कविता की विशेष उपलब्धि हैं।
ऐसे महत्वपूर्ण संकलन पर किसी भी जाने-माने आलोचक ने दृष्टिपात करने का अनुग्रह नहीं किया है। यह हिन्दी आलोचना पर प्रतिकूल टिप्पणी है। ऐसा प्रतीत होता है कि हिन्दी कविता की आलोचना के संसार में लोकतांत्रिक भावना विलुप्त हो गई है।