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Saturday 18 Nov 2017

एक अबूझी प्यास है फ़ागुन तेरो नाम

गोवर्धन यादव
103 कावेरी नगर, छिंदवाड़ा,
मध्यप्रदेश-45001
वसंतपंचमी के बाद से ही गाँवों में फाग गाए जाने की शुरुआत हो जाती है। साज सजने लगते हैं और महफिलें जमने लगती हैं। रात्रि की शुरुआत के साथ ढोलक की थाप और झांझ-मंजीरों की झनझनाहट के साथ फाग गाने का सिलसिला देर रात तक चलता रहता है। हर दो-चार दिन के अन्तराल के बाद फ़ाग गायी जाती है और जैसे-जैसे होली निकट आती जाती है, लोगों का उत्साह देखते ही बनता है।
अब न तो वे दिन रहे और न ही वह बात रही। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और दूषित राजनीति के चलते आपसी सौहाद्र्र और सहयोग की भावना घटती चली गई और आज स्थिति यह है कि फाग सुनने को कान तरसते हैं।
फाग की बात जुबान पर आते ही मुझे अपना बचपन याद हो आता है। बैतूल जिले की तहसील मुलताई, जो पतित पावनी सूर्यपुत्री ताप्ती का उद्गम स्थल है, मेरा जन्म हुआ और जहां से मैंने मैट्रिक की परीक्षा पास की, वह पुराना दृश्य आंखों के सामने तैरने लगता है। जमघट जमने लगती है, ढोलक की थाप, झांझ-मंजीरों की झनझनाहट, टिमकी की टिमिक-टिन, से पूरा माहौल खिल उठता है। फिऱ धीरे से आलाप लेते हुए खेमलाल यादव फ़ाग का कोई मुखड़ा उठाते हैं और उनके स्वर में स्वर मिलने लगते हैं दमडूलाल यादव, दशरथ भारती, सेठ सागरमल, फकीरचंद यादव, श्यामलाल यादव, गेन्दलाल पुरी, खूसटसिंह, पलु भारती, भिक्कूलाल यादव और उनके साथियों का स्वर हवा में तैरने लगता है। बीच-बीच में हंसी-ठिठौली का भी दौर चलता रहता है। शाम से शुरु हुए इस फ़ाग की महफिल को पता ही नहीं चल पाता कि रात के दो बज चुके हैं। फ़ाग का सिलसिला यहां थम सा जाता है, अगले किसी दिन तक के लिए।                                 
जिस दिन होलिका-दहन होना होता है, बच्चे, बूढ़े, जवान मिलकर लकडिय़ां जमाते हैं। गाय के गोबर से बनी चाकोलियों की माला लटका दी जाती है। रंग-बिरंगे कागजों की तोरणें टंगने लगती हैं। लकडिय़ों के ढेर के बीच ऊंचे बांस अथवा बल्ली के सिरे पर बड़ी सी पताका फ़हरा दी जाती है। बड़ी गहमागहमी का वातावरण होता है इस दिन। बड़े से सिल पर भांग पीसी जा रही होती है। कोई दूध औटाने के काम के जुटा होता है। जितने भी लोग वहां जुड़ते हैं, सभी के पास कोई न कोई काम करने का प्रभार होता है। जैसे-जैसे दिन ढलने को होता है, वैसे-वैसे काम करने की गति भी बढ़ती जाती है। सांझ घिर जाने के साथ ही एक चमकीला चांद आसमान पर प्रकट होता है और चारों ओर दुधिया रंग अपनी छटा बिखेरने लगता है। अब होलिका दहन वाले स्थान के पास बड़ी दरी बिछा दी जाती है और लोगों का जमावड़ा होना शुरु हो जाता है। टिमकी, ढोलक, झांझ, मंजीरें, एकताल बजने लगते हैं। फाग गायन शैली सामूहिक गायन के रुप में होती है। फ़ाग गायन की विषय वस्तु द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बृज ग्वालबालों एवं गोपियों के साथ हास परिहास की शैली प्रचलित है। सबसे पहले श्री गणेश का सुमिरन किया जाता है। फिऱ कान्हा और राधा के बीच खेली जाने वाली रंग गुलाल पिचकारी के मधुर भावों को पिरोती फ़ाग गायन की शुरुआत होती है।
1. चली रंग की फुहार, पिचकारियों की मार, कान्हा तू न रंग डार, काहे सताए रंग डार के, राधा पड़े तोरे पैयां गिरधारी न तू मारे भर-भर पिचकारी, भींगी चुनरी हमार काहे दिया रंग डार, मैं तो गई तोसे हार, काहे सताये रंग डार के        2.  सारी चुनरी भिंगो दी तूने मोरी मेरे सर की मटकिया फ़ोड़ी, कहूं जा के नंद द्वार तोरो लाला है गंवार, करे जीना दुश्वार, काहे सताये रंग डार के,
3. सारे बृज में करे ठिठौली, लेके फिऱे सारे ग्वालों की टोली, किन्हे गाल मोरे लाल डाला किस-किस पे गुलाल, मैया ऐसा तेरा लाल, काहे सताये रंग डार के
फ़ाग गायन का क्रम चलता रहता। स्त्री-पुरुष, बच्चे घरों से निकल आते पूजन करने। फिऱ देर रात होलिका दहन का कार्यक्रम शुरु होता। कोई बड़ा बुजुर्ग लकड़ी-कंडे के ढेर में आग लगाता और इस तरह होलिका दहन की जाती। पौराणिक मान्यता के अनुसार हिरण्यकश्यप द्वारा अपने भक्त पुत्र प्रहलाद को होलिका में जलाने के प्रयास में असफ़ल हो जाने पर तत्कालीन समाज द्वारा मनाए गए आंदोलन से इसे जोड़ा जाता है। होलिका दहन के बाद लोग अपने-अपने घर की ओर रवाना हो जाते। इस उत्साह के साथ कि अगले दिन जमकर रंग बरसाएंगे। सुबह से ही सारे मुहल्ले के लोग बाबा खूसट के यहां इकठ्ठे होते। फ़ाग गाने का क्रम शुरु हो जाता। फिऱ आती रंग डालने की बारी। सुबह से ही लोग टेसू के फूलों का रंग उतारकर पात्रों में जमा कर लेते। इसी रंग से सभी रंग कर सराबोर हो जाते। फिऱ सभी को कुंकुम-रोली लगाई जाती।् ठंडाई का दौर भी चल पड़ता। इस अवसर पर बने पकवानों का भी लुफ़्त उठाया जाने लगता।
फाग गायन मंडली हंसी-ठिठौली करती बाबा दमडूलाल के घर जा पहुंचती। वहां पहले से ही टोली के स्वागत-सत्कार की व्यवस्था हो चुकी होती है। एक दिन पहले से ही आंगन को गोबर से लीपकर तैयार कर दिया जाता है। इस दिन बिछायत नहीं की जाती। लोग घेरा बनाकर बैठ जाते। फ़ाग उड़ती रहती। रंग गुलाल बरसता रहता। ठंडाई का दौर चलता रहता। पकवानों का रसास्वादन भी चलता रहता। घर का प्रमुख लोगों के सिर माथे पर तिलक रोली करता और इस तरह फ़ाग के राग उड़ाती टोली आगे बढ़ जाती। सबसे मिलते-जुलते, रंग गुलाल में सराबोर होती टोली के सदस्य अपने-अपने घरों की ओर निकल पड़ते।    
नहा धोकर लोग चार बजे के आसपास होलिका दहन वाले स्थान पर आ जुड़ते। फ़ाग उडऩे लगती, फिऱ मंडली गाते बजाते मेघनाथ बाबा के दर्शनार्थ बढ़ जाती। वहाँ उस दिन अच्छा खासा मेला लग जाता। इस तरह सारे गांव की मंडलियां वहां जुडऩे लगती है। लोग एक दूसरे को गले लगाते हैं। इस तरह प्रेम-सौहाद्र्र की भावना से ओतप्रोत यह त्योहार सम्पन होता।