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Tuesday 21 Nov 2017

नहीं अब गांव हमारा

डॉ. शंकर मुनि राय
शोध निर्देशक- हिन्दी, शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगांव,  

मो.9893863548                                             
घर के पीछे बंसवारी में चिडिय़ों की चहचहाहट। मातृत्वपान कराने के लिए रंभाती गायें। बैलों के गले में बंधी घंटियों की टुनटुन के बीच मंदिर जाते पंडितजी के अटपटे रामनामी भजन। दूर से आती अल्ला हू अकबर की अजानी ध्वनि। इनके बीच जब अपनी सुबह होती तब दादी के हाथ दहेड़ी में नजर आते और थोड़ी ही देर बाद मथनी की घरघराहट शुरु हो जाती। फिर जब उनकी हथेली पर लैनू के गोल-गोल ढोके दिखाई पड़ते तब मुंह-हाथ धोने तक का सब्र कहां होता! मिट्टी के आंगन जब होली, दशहरा और दीपावली में गाय के गोबर से लीपे जाते तब गजब की त्योहारी सुगंध मन को हर्षित कर देती। मालपुआ बनाने के लिए मीठा घोल तैयार करने के बाद, बड़ी-पकौड़ी के लिए अपनी हथेली से बेसन मथती दादी। आंगन में पड़ोसी मौसीजी का आना। उनके आते ही पांव छूने के लिए अपनी बहुओं को आवाज देने का आदर। माथे पर आंचल धरे बहुओं का अपने-अपने घर में से निकलना और कम से कम पांच बार पांव को सादर स्पर्श कर अपने सिर पर लगाना। और दूधो नहाओ, पूतो फलो का देहाती आशीर्वाद।  देशी घी में बननेवाले देहाती पकवानों की सुगंध जब गली तक जाती तब किसे याद रहता कि कौन-सा दरवाजा अपने घर को जाता है! सब जगह तो एक ही चीज मिलेगी, बस आवाज भर लगाने की देर होती। बिना खाये न कोई जाता न उसे जाने दिया जाता। दादी के पांव छूनेे के लिए झुके हुए बच्चों की पीठ पर दादी की हथेली बिना बोले ही लाख बरस जीने का एहसास करा देती। भौजाई के पांव छूता कुंवारा देवर अपने गाल पर जिस प्यार भरी हथेली को महसूस करता उसमें वैवाहिक जीवन के मधुर सपने उभर जाते थे।
गांव से बाहर पीपल का बड़ा पेड़ अपनी घनी छाया में धमा-चौकड़ी मचाते बच्चों को देखे बिना उदास हो जाता था। थके-हारे राहगीर उसे अपना ही समझ कर थोड़ी देर विश्राम करने बैठ जाते तो उन्हें जिस प्यार से वह पीपल सहलाता, वह उनके लिए अविस्मरणीय होता। उसकी छाया का एक हिस्सा पशुओं के लिए था, तो दूसरा गांव की बूढ़ी औरतों के लिए। उसकी डालियों पर तरह-तरह के पक्षियों के घोंसले भी वैसे ही थे, जैसे गांव में तरह-तरह की जाति वाले लोग। चील, कौए, तोते, मैने जैसे पखेरुओं के नन्हे चूजों के साथ पीपल के कोटर से झांकते गिलहरी के बच्चे जब नजर आते तब हम उन्हें छूने को अधीर हो जाते। फिर हम दौड़ कर जैसे ही डालियों पर चढ़ते कि वे अपनी मां की गोद में समा जाते। जैसे पीपल हमें सिखाता कि वह सबके लिए है।
पीपल की छाया में, उसकी डालियों पर जवान हुआ बचपन कब खतम हो जाता पता नहीं चलता। पर जब कोई बेटी दुल्हन बनकर इस गांव से विदा होने लगती तब यह पीपल डोली उठाये कहारों के कदम थोड़ी देर के लिए अपनी छाया में जरूर रोक देता। मां-बेटी, भाई-बहन, पिता-पुत्री और सखी-सहेलियों सहित गांव भर के प्यार-दुलार और मिलन-बिछोह के आंसू का गवाह यह पीपल हमें एहसास करा देता कि किस पानी ने गंवई संस्कार से सींचा है उसे। इसकी छाया में बिलखती कन्या का रुदन सुनकर कोई भी राहगीर जान जाता था कि गांव की बेटी आज इसकी याद संजोये यहां से विदा हो रही है।
इसी तरह किसी बच्चे के कुंवरथ उतरने का पहला बाजा इसी की छाया में बजता था। बारातियों का जमावड़ा यहीं होता था। लौटती बारात के  साथ आई हुई दुल्हन के गीले गालों को अपनी शीतल बयार से सुखानेवाला पीपल ही उसे सबसे पहले इस गांव की रीति समझाता था। उसके बाद डोली देवालयों की ओर बढ़ती थी। दिवंगत हुए ग्रामवासियों को पानी देने के लिए कलश इसी पीपल की डाली में लटकाया जाता था। कार्तिक महीने में मां रोज सुबह-शाम इसकी जड़ में घी के दीये जलाया करती थी। कहते हैं अब यह पीपल नहीं रहेगा, काट दिया जायेगा। गांव को सड़क से जोडऩे की सरकारी योजना में यह पीपल अब रोड़ा बन गया है।
गांव के पश्चिम बुढ़वा इनार। गांव की जवान लड़कियां यहां नहाने से पहले अपनी मां, चाची और भाई-भौजाई के कपड़े धोती थीं। काली मिट्टी से अपने लंबे बाल धोती थीं। यह उन्ही का कुंआ कहलाता था। उधर कभी कोई मरद नहीं जाता था। ससुराल से आई हुई युवतियां भी यहीं पर नहाने के बहाने मेलजोल और भेंट-अंकवार कर लेती थीं। गांव भर का समाचार और नइहर-सासुर का जनाना हालचाल सुननेवाला यह कुंआ हमारे सामने तब बुढ़ा दिखा, जब उसके जगत के एक हिस्से का पत्थर टूट कर कुंए में ही गिर गया। तब मां ने मुनेसर चाचा से कहा था कि अपनी बैलगाड़ी से एक पत्थर लाकर वहां रख दें। मुनेसर चाचा पहलवान बाबा के बड़े बेटे थे। तब बैलगाड़ी चलाते थे और कभी-कभी खाली गाड़ी रहती तो ऐसी जरुरी चीजें स्वयं लाद लाते थे। बरसों बाद मैंने देखा कि बुढ़वा इनार का कहीं नामोनिशान नहीं है। उसकी जगह एक बिगड़न्त सरकारी हैंण्डपंप झूल रहा है।
याद है जब मुनेसर चाचा कुंए के लिए पत्थर लाये थे, तब मां ने उन्हें सुन्दर लड़की से ब्याह होने का आशीर्वाद दिया था। इस आशीर्वाद से वे इतना प्रसन्न हुए थे कि और कुछ लाने की इच्छा जाहिर कर गये थे। तब फिर मां ने उनसे मसाला पीसने के लिए एक और पत्थर मांगा था। इस बार जब पत्थर लाये थे, तब मां का पांव छूते हुए बोले थे-'भउजी इसी पत्थर की तरह मुझे मजबूत होने का आशीर्वाद दीजिए।Ó मां ने कहा था कि बबुआजी! पत्थर टूट सकता है, आप कभी नहीं टूटेंगे। मुनेसर चाचा का बेटा बड़ा हो गया है, नौकरी कर रहा है। पिछले दिन उसका समाचार पूछा तो चाचाजी ने गंभीर स्वर में कहा कि वह अमेरिका में है। उसकी पत्नी के बारे में पूछने पर भी उसी आवाज में बोले-' वह तो यही न रहती है!Ó फिर उन्होंने मुझे समझाने के अंदाज में कहा कि बेटा! अब पहले जैसा गांव नहीं रहा। बहुत बदल गया है।           
मेरे गांव के पूरब जहां महुए का पेड़ था, उसी के नीचे काली माता  का चउरा भी था, और बगल में तालाब भी। अष्टमी, तीज और जिउतिया के दिन जब औरतें वहां नहाने जाती थीं, तब उनकी टोली में हमारी मंडली भी शामिल रहती। जब तक महिलाओं की टोली गांव से निकलते-निकलते गीत शुरु करती, हम आधी दूरी तय कर लिये होते। उनके लिए दतुवन तोडऩे के बहाने पेड़ पर चढऩे का मजा और वहीं से तालाब में छलांग लगाने की अनुमति हमें बिना मांगे मिल गई रहती थी। फिर दीदी-फुआ और दादी आदि जब तक मां काली को जल चढ़ाने जातीं, हम उनके गीले कपड़े धो-फींच कर पसार देते थे। बदले में हमें सुंदर दुलहन मिलने का आशीर्वाद मिलता। अब चकबंदी अधिकारी ने तालाब को खेत बनवा दिया है। विवादित जमीन होने के चलते कब्जा करनेवालों में मारापीटी हो चुकी है। मामला कोर्ट में चल रहा है।
गांव के उत्तर में जो बड़ा तालाब था, वह बरसाती पानी से इतना भर जाता था कि साल भर सिंचाई का काम होता। होली, दशहरा और दिवाली के दिन गांव भर के लोग अपने गाय-बैलों को वहीं नहलाते-धोते और दोपहर तक घर लौट कर सींग में तेल घिसते। फिर स्वयं खाने से पहले उन्हें खीर-पूड़ी खिलाई जाती। क्वांर में जब धान की फसल अंतिम पानी के लिए सूखने लगती तब तालाब का पानी एक साथ सबके लिए छोड़ा जाता। कार्तिक में छठ पूजा का घाट बनाने के लिए लड़कों की टोली इसकी सफाई में लग जाती तो देखते-देखते यहां का दृश्य काफी सुहाना लगने लगता। अगहन में जब बहुत कम पानी हो जाता और मछलियां उछल-कूद करने लगतीं, तब बगुलों की जमात इस तालाब के किनारे नजर आने लगती। और किसी एक दिन गांव भर के लोग एक साथ मछली पकडऩे तालाब में उतर जाते। एक-एक बाल्टी मछली हर घर में जाती। जिसे जितना खाना होता, उतना पकाता। शेष पड़ोसी रिश्तेदारों के यहां पहुंचा दिया जाता।
कुछ दिन बाद यह तालाब नीलाम होने लगा और मछली पकडऩेवालों के लिए पंचायत जुर्माना तय करने लगी। सिंचाई के लिए पानी लेने के लिए पहले पैसे चुकाने पड़ते। माल-मवेशी के लिए इस तालाब को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया। समय बदलता गया और अब इस तालाब की जगह उन लोगों की झोपड़ी खड़ी हो गई है, जो पहले गांव में ही काम करते थे और चाचा-भइया, काका-बाबा के नाम से जाने जाते थे। अब इन्हें विरोधी समाज के लोगों के रूप में जाना जाता है। इनके संबंध अब गांव से अधिक पंचायत से है। ये अपने दूध अब गांव में नहीं, शहर में बेचते हैं। शादी-ब्याह या मरनी-हरनी के समय पहले दूध-दही, और पत्तल-कुल्हड़ की व्यवस्था इसी टोली के लोग अपने गांव की इज्जत समझ कर करते थे। अब यह व्यवस्था पैसे के बिना नहीं होती।
होली के दिन पूरा गांव एकत्र होता तब होलिका दहन होता था। फिर वहीं से पहलवान जी की कमर में ढोलकी बंध जाती थी। सब लोग एक साथ-'उठि मिलिला हो राम भरत आवेÓ का राग गाते गांव की ओर चल पड़ते। गली में रंग-गुलाल और होलियाना गाली लिए महिलाएं सबका इंतजार करतीं और मौका पाते ही अपना प्यार-दुलार उड़ेल देती थीं। न जात-पात का भेद न बड़े-छोटे का अंतर। शाम को कंडील में गुड़ का शर्बत तैयार होता जिसमें सौंफ पीस कर मिलाई जाती। बड़ों के लिए थोड़ी-थोडी भांग की व्यवस्था। तश्तरी में इलायची और पान। शर्बत पीने के बाद फाग की बैठकी होती। फिर 'सदा आनन्द रहे यही द्वारे, मोहन खेले होरीÓ से शुरु हुआ फाग आधी रात तक चलता। उसके बाद चइता गाकर ही हर कोई अपने-अपने घर जाता था।
अब वैसी होली नहीं होती। मुहूर्त देखकर कोई होलिका दहन कर आता है। लोग अपने-अपने घर में खाते-पीते हैं। दो-चार मलेटरीवाले हर होली में गांव पर ही रहते हैं। अंगरेजी बोतल दिल खोलकर पिलाते हैं। हंसी-ठ_ा होता है। बड़े जनों का मजाक और महिलाओं के बारे में मनगढ़ंत कथाएं सुनाई जाती है। बच्चों को बाहर जाकर होली खेलने की अनुमति नहीं दी जाती। वे घर में टी.वी देखने के लिए तैयार कर दिये जाते हैं। उन्हें बता दिया जाता है कि यह गंदे लोगों का पर्व है।