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Tuesday 21 Nov 2017

मजबूरी का शोध

सुनील साव
द्वारा डॉ. भरत प्रसाद त्रिपाठी
हिन्दी विभाग, पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय      शिलांग, मेघालय-793022                                                                      
मो.- 9863407478
गर्मी का मौसम बेकारी, और सरकार तीनों लगभग समान होते हैं, एक बेरोजगार नवयुवक के लिए। जून में एम.ए. पास करने के बाद मैं जब दिल्ली पहुंचा तो पता चला कि नौकरी पाना कितना सहज काम है। आज ही सुबह मेरे बड़े पिताजी के लड़के मुझे थाने से छुड़ा के लाए। एम.ए. पास करने के बाद यह पहला मौका था जब थानेदार ने मुझे अराजक तत्व समझकर थाने में रात भर बंद किया ।
भैया ने मुझे कहा कि कुछ दिनों तक रिसर्च क्यों नहीं कर लेते। यह रिसर्च तुम्हें समाज में निर्भय और बेकार  घूमने का प्रमाण-पत्र प्रदान करता है।  पुलिस का कोई  भय नहीं रहेगा। आजकल बेकार और बेरोजगार नवयुवकों को अराजक, आवारा और असामाजिक तत्व समझा जाता है। यह तुम्हारी गलती नहीं है व्यवस्था की गलती है जिसने आज बहुत से बेरोजगार युवकों के लिये रिसर्च के अवसर प्रदान किये हैं।
रिसर्च में एडमिशन के दौरान पता चला कि  रिसर्च  में भी गुरुकृपा की आवश्यकता होती है, परन्तु मैं कभी किसी गुरुजी को उनके घर तक पहुंचाने नहीं गया था, न ही उनके घर की सब्जी आदि लाया था। सारे काम मैंने कभी गुरुजी के लिये नहीं किए। इसी उहापोह में कुछ दिन बीते और मेरा एडमिशन रिसर्च में हो गया।
जिनके यहां मैं रिसर्च के लिये गया उनके यहां पहले से ही आठ-दस विद्यार्थी बैठे हुए थे, जो मेरे बड़े भैया आदि के उम्र के थे। उनसे मिलने पर मुझे पता चला कि वे भी रिसर्च कर रहे हैं। अभी मैं दरवाजेे पर ही खड़ा था कि उन्हीं में से एक ने मुझे पहचान कर झट गुरु जी के पैरों की रज अपने हाथों से मेरे माथे पर लगा दी। गुरु जी अपने पैरों से कभी भी रज को कम या खत्म नहीं होने देते थे। उनका कहना था कि पैर में अगर रज नहीं रहे तो विद्यार्थी को क्या दूंगा। विद्या तो कहीं भी मिल जायेगी, परन्तु गुरु के चरणों की रज बड़े भाग्य से मिलती है।
गुरुजी ने पान को पच्च से थूका और मुझसे मेरा नाम पूछा फिर बैठने के लिए कहा। गुरुजी ने मुझसे मेरे रिसर्च करने का औचित्य पूछा तो मैंने उन्हें बताया कि मेरे अन्दर की विद्या की पिपासा को शांत करने के लिए और कुछ समय के लिए बेकारी दूर करने के लिए मैं रिसर्च कर रहा हंू। सबसे पहले यह जान लो कि रिसर्च का मतलब क्या होता है। रिसर्च का अर्थ होता है बार-बार खोजना अर्थात - जो पहले खोजा जा चुका है, उसी को पुस्तक से खोज कर लिखना ही रिसर्च कहलाता है।Ó अपनी मौलिक उद्भावना देने की कोशिश मत करना नहीं तो तुम्हारा शोध कार्य बिगड़ जायेगा।
गुरुजी ने आगे कहा कि हमारे देश में विद्या की कोई आवश्यकता नहीं है जितनी विद्या होनी चाहिए उतनी यहां पहले से मौजूद है। उसमें तुम कुछ नया मत देना नहीं तो तुम समाज विरोधी समझे जाओगे।
इसके अलावा गुरुजी ने यह भी बताया कि हमारे यहां सबसे बड़ा साम्यवाद है। हम छात्रों को सरकार से भी ज्यादा आजादी देते हैं। दरअसल सब केवल चिल्लाते हैं कि हम साम्यवादी हैं लेकिन क्या वे हमसे बड़े साम्यवादी हैं। उन्होंने कहा कि तुम चाहो तो किसी पत्रिका का संपादन करो। बड़ा नाम है उस काम में। तुम कुछ भी कर सकते हो, तुम आजाद हो यहां। गुरुजी ने एक महत्वपूर्ण बात यह कही कि विश्वविद्यालय द्वारा बनाये गये व्यायामशाला का भरपूर लाभ उठाओ। अपने बाहु को मजबूत बनाओ। ताकि प्रशासन तुम्हें बेकार समझ कर गिरफ्तार करने से पहले सोचे। जानते हो प्रशासन केवल निर्बलों के लिए होता है सबलों के लिए नहीं। अगर तुम समाज में सबल हो, तुम्हारी बाहु मजबूत है तो तुम कुछ भी कर सकते हो, कोई तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। तुलसीदास भी कहते हैं-
समरथ को नहीं दोष गुसांई
यह हमारे देश की विडम्बना है कि असहाय को ही सताया जाता है। हमारा देश केवल उदारता दिखाने में ही आगे रहता है, उसे आंतरिक परिस्थिति से कोई सरोकार नहीं है। देश चाहे कोई भी हो चीन, जापान, इंग्लैण्ड, जर्मनी, रुस, अमेरिका, भारत इत्यादि व्यवस्था लगभग एक सी होती है। उसी में कोई अपनी बना लेता है कोई किसी और की बना देता है। हमारे देश भारत का भी यही हाल है, वह अपनी कम और दूसरों की ज्यादा बनाता है। प्रेमचंद के बड़े भाई साहब की तरह।
गुरुजी की बातें खत्म होते ही वहां बैठे मेरे अग्रज, जो रिसर्च कर रहे थे और उनका यह पांचवां साल था, से पूछने पर उन्होंने कहा कि कहीं सेट हो जाऊं फिर थीसिस लिख कर जमा कर दूंगा। वह अब सेट होने ही वाले थे। अग्रज ने मुझे कहा कि इस अध्ययन के तौर-तरीके को भी सीख लो तुम्हें इसकी पांच साल जरुरत पड़ेगी। तौर-तरीके में तुम्हें सबसे पहले यह ध्यान रहे कि तुम इसमें मौलिक उद्भावना मत डालना। प्रोफेसर तुम पर गुस्सा भी हो सकते हैं। उनके क्रोध का बुरा मत मानना। वह केवल क्लर्क की तरह डांटते हैं जो केवल पांच मिनट तक ही रहता है। क्या करें वे भी उनके भी तो पत्नी है, बच्चे हैं, तुम्हें नहीं डांटें तो किसे डांटेंगे। इस रिसर्च में तुम अपने को राग दरबारी का नायक समझो और सबको रिसर्च का अर्थ समझाओ। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रिसर्च के अन्त के छ: महीने की पीड़ा को झेलने के लिए तैयार रहना। इस पीड़ा को मैं झेल रहा हूं। मुझे छ: महीने के अन्दर अपनी थीसिस जमा करनी है। इस पीड़ा को प्रसव पीड़ा भी कहा जाता है।
देश के समस्त विश्वविद्यालय में शोध कर रहे लोगों की पीड़ा को मैं अब आसानी से समझ सकता था। अब मुझे समझ में आया कि मैं जिस चक्कर में गया था रिसर्च करने, यह तो उससे भी बड़ा घनचक्कर है। पुलिस से, प्रशासन से, सरकार की जनविरोधी नीतियों से बचना कोई आसान काम नहीं है।
इस पीड़ा और इतनी सुविधा-असुविधाओं के बाद भी यह शोध एक अद्भुत आनन्द प्रदान करता है। इसलिए सभी को इस पीड़ा का आनन्द लेना चाहिए-
अवसि देखिए देखन जोगू