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Saturday 18 Nov 2017

मुझे खुदा ने ग़ज़ल का दयार बख्शा है, ये सल्तनत मैं मोहब्बत के नाम करता हूं।

रोहित कौशिक
टी-7, एकता अपार्टमेंट
कुबेर स्कूल के सामने, रुड़की रोड, मेरठ (उ.प्र.)
मो. 09917901212
मशहूर एवं वरिष्ठ शायर डॉ. बशीर बद्र किसी परिचय के मोहताज नहीं है। आपने उर्दू शायरी में एक अलग मुकाम हासिल किया है। 15 फरवरी 1935 को जन्मे बशीर बद्र ने केवल अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में ही सफलता के झंडे नहीं गाड़े बल्कि उर्दू शायरी में भी लोकप्रियता की नई कहानी लिखी। उनकी ग़ज़लों में जहां एक ओर मोहब्बत बड़ी शिद्दत के साथ मौजूद है तो दूसरी ओर समाज का दु:ख-दर्द भी उसी तीव्रता और गहराई के साथ उपस्थित है।  आपकी साहित्यिक सेवाओं को देखते हुए भारत सरकार ने आपको 1999 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया है। यहां प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
0 बशीर साहब आपको शेरो-शायरी का चस्का कैसे लगा?
00 हिन्दुस्तान में शेरो-शायरी पहले भी बहुत आम थी और आज भी बहुत आम है। आदमी जब किसी दूसरे को अच्छा कहते हुए सुनता है तो दो एक्शन होते हैं। एक तो उसे लगता है कि लोग उसकी तारीफ करेंगे,दूसरा यह कि उसे बहुत-कुछ महसूस होने लगता है। जैसे एक बच्चा पढ़ रहा है और बूढ़ा कहता है कि यह मेरे दिल की आवाज है। तो शायरी में आदमी सिर्फ नहीं रहता बल्कि एक तरह से सैकड़ों आदमी उसके अंदर रहने लगते हैं।
0 किसी शायर को सुनकर ऐसा लगा कि मुझे भी शायरी करनी चाहिए?
00 जी नहीं ऐसा कोई शायर नहीं लगा लेकिन ऐसे बहुत से शायर लगे। यह झूठ नहीं है कि जो कोई कुछ करने वाला होता है खुदा पहले दिन से ही उसके दिल में रोशनी डाल देता है। मुझे ऐसा लगता था कि चाहे मीर हो, चाहे फिराक हो या फिर गालिब हो। इनमें से कोई ऐसा नहीं है जिसका मैं स्थान न ले सकूं। तो यह एक सोच थी मेरे अंदर जो करीब-करीब सही हो रही है। हिन्दी का प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन हिन्दी में मेरी पचास से ज्यादा किताबें छाप रहा है। इसी तरह उर्दू में भी हिन्दी के बड़े प्रकाशक मेरी किताबें छाप रहे हैं। मुझे ये मालूम हो गया था कि आज मैं जिस ज़बान में आपसे बात कर रहा हूं वह संस्कृत की आखिरी शक्ल है जो धीरे-धीरे खड़ी बोली में बदल गई। इस वक्त इसके दो नाम हैं। इसका एक नाम हिन्दी है, यह अरबी का लफ्ज़ है और दूसरा नाम है उर्दू, यह तुर्की का लफ्ज़ है। तो इतनी जानकारी के बाद आदमी आसानी से धोखा नहीं खाएगा।
0 इस दौर में उर्दू $गजल की स्थिति को आप किस रूप में देखते हैं?
00 उर्दू का कोई नुकसान अब तक नहीं हो सका औार न ही कोई कर सका है। करने वाले जाहिलों ने किया होगा और जाहिल लिखने वाले रोए होंगे कि हमारा नुकसान हो रहा है। लेकिन बशीर बद्र जानता है कि उसे खुदा ने गज़ल करने के लिए इस दुनिया में भेजा है, न तो उर्दू वाले की और न हिन्दी वाले की, किसी की कोई हिम्मत नहीं है कि मेरा कुछ बिगाड़ सके।
0 मेरा प्रश्न इस दौर में उर्दू ग़ज़ल की स्थिति को लेकर था। कृपया इस पर प्रकाश डालिए।
00 चमकती है कहीं सदियों में आंसुओं से जमीं, ग़ज़ल के शेर कहां रोज-रोज होते हैं। तो चाहे उर्दू वाले हों या फिर हिन्दी वाले हों, हजारों में एक ऐसा होता है जिसके पास एक-दो शेर हों। यहां यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि मेरे पास किसी भी नए और पुराने शायर से कम अच्छे शेर नहीं है। मुझे खुदा ने ग़ज़ल का दयार बख्शा है, ये सल्तनत मैं मोहब्बत के नाम करता हूं। तो मुझे जब मोहब्बत करनी है तो शायरी करनी है। मेरे लिए हिन्दू-मुसलमान कुछ नहीं है। ये मत समझिए कि मैं कोई बहुत बड़ा खोजी हूं, कोई खोज करने वाला हूं। दरअसल मैं स्टूडेन्ट बहुत अच्छा हूं। तो ऐसा आदमी धोखेबाज नहीं हो सकता।
0 आज ग़ज़ल का मतलब सिर्फ इश्क या फिर महबूबा से बातें करना ही नहीं रह गया है। इस दौर में गक़ाल अनेक सामाजिक एवं राजनैतिक प्रश्नों से जूझ रही है। इस बदलाव को आप किस रूप में देखते हैं?
00 बहुत अच्छी बात है। जो कुछ हमारे मां-बाप ने हमें दिया है वह बहुत बड़ी चीज है यानी मोहब्बत लेकिन यदि हमारे ऊपर कोई हमला कर रहा है तो हम उसकी तलवार तोडऩा जानते हैं। यह हमें आज के जमाने ने सिखाया है। तो जो पहले हुआ है वह भी ठीक था और जो आज हो रहा है वह उससे भी ज्यादा ठीक है। अब पहले से कहीं ज्यादा अच्छी ग़ज़ल लिखी जा रही हैं, ज्यादा अच्छे गीत लिखे जा रहे हैं। मेरा एक शेर है- सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा, इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जाएगा। तो हर आदमी यह कह सकता है लेकिन बशीर बद्र ने ही क्यों कहा। तो शेर कहने के लिए खुदा पहले से भेजता है। और अगर उसने नहीं भेजा तो आप शायर नहीं हो सकते लेकिन अगर आप सही नहीं चलेंगे तो एक बटा दस भी नहीं रह जाएंगे।
0 उर्दू शायरी में गुरु-शिष्य की एक परम्परा रही है। इस परम्परा के तहत  शागिर्द अपने उस्ताद के बहरों पर अधिकार करना सीखते थे। क्या इस दौर में भी उर्दू शायरी में यह परम्परा कायम है?
00 मैं चाहता था कि मैं किसी का शागिर्द होता और कुछ मेरे शागिर्द होते लेकिन दुनिया को इतनी जानकारी हो चुकी कि आजकल शागिर्द नहीं होते। बल्कि मुझे तो डर लगता  है कि वही लोग शागिर्द होते हैं जो दूसरों से लिखवाते हैं। दरअसल एक-दूसरे को सुनाते हैं बस। मैं अपने शेर बीवी को सुनाता हूं, दोस्तों को सुनाता हूं, बीवी मुझे अपने शेर सुनाती है और ऐसा नहींकि दोस्तों की राय नहींमानता। उनकी राय भी मानता हूं और उनको राय देता भी हूं। तो इस लिहाज से उस्ताद-शागिर्दी की जो संस्था थी उसमें दस प्रतिशत अच्छा था और नब्बे प्रतिशत उस वक्त मुगल राज के वक्त में भी खराब था कि जो उस्ताद कह रहा है उसे आप समझ रहे हैं कि खुदा ने कहा है, यह बिल्कुल गलत है।
तो उस समय भी उस्ताद-शागिर्दी की उस परंपरा को आप सही नहींमानते हैं?
बिल्कुल सही नहींमानता हूं। मैंने कभी किसी को न दिखाया है और न दिखाऊंगा और सबको दिखाया है, सबको दिखाऊंगा। जो कोई भी मेरे पास आया, मैंने उसे देखा लेकिन यह कभी नहींकहा कि यह मेरा शागिर्द है। मैंने हमेशा यही सोचा कि छोटा भाई है, मुझसे पूछ रहा है और मैं बता रहा हूं। मेरा बताना गलत भी हो सकता है।
0 इस दौर में उर्दू तनकीद (आलोचना) के ताल्लुक आपकी क्या राय है?
00 उर्दू तनकीद के ताल्लुक हर जमाने में मेरी यही राय है कि तीसरे दर्जे के बुद्धिमान लेखक तनकीद लिखते हैं। मैं भी तनकीद लिखता हूं। तनकीद में बौद्धिक दखल है सृजनात्मक दखल नहीं है। तनकीद में कहीं भी क्रिएशन जैसी बड़ी चीज की आत्मा नहीं है। जो चीज नहीं है उससे आप क्या उम्मीद करें। जाहिर है कि राम के सामने जितना भी काबिल आदमी जाएगा वो राम की जूती उठाने के लायक ही होगा। तब उसकी इज्जत बनेगी। यही हाल तनकीद में है। जो आदमी तनकीद करता है वह हमारी मदद करता है। जूते तो नहीं उठाता। जूते तो हमारे पास हैं ही नहीं।
0 आप न केवल एक तरक्कीपसंद शायर हैं बल्कि मंच के भी मकबूल शायर हैं। इस दौर में मुशायरों की बदलती हुई फिज़ा के बारे में क्या कहना चाहेंगे?
00 मुशायरों की फ़िज़ा तो अच्छी हैं। उसकी वजह यह है कि आप यह मानकर मत चलिए कि सब आदमी आपकी तरह हैं। खुदा ने जिसे जैसा बनाया है उसको उतना ही और वैसा ही पहुंचेगा। जब मैं मुशायरों में जाता हूं तो आधा मजमा चिल्लाता है- नहीं साहब ग़ज़ल तरन्नुम से होगी। इसके मायने उन लोगों के लिए मेरा तरन्नुम ठीक है। अस्सी प्रतिशत वो लोग बैठे हैं कि खुदा करे कि बशीर साहब अच्छे फार्म में $गजल पढ़ दें। तो कोई चीज बुरी नहीं है। खुदा ने जिसे तरन्नुम दिया वो तरन्नुम से पढ़े। उससे उसकी ग़ज़ल न तो अच्छी होगी और न बुरी।
 आजकल कहा जा रहा है कि मुशायरों की फ़िज़ा बदल गई है। पहले वाले मुशायरे नहीं रहे हैं। तो क्या यह सब बकवास है।
00 वही लोग चिल्ला रहे हैं जो मुशायरों में ग़ज़लें मांगकर पढ़ते थे। अब उनके लिए मौका नहीं। अब सुनने वाले ऐसे बातें करते हैं जैसे हम और आप बातें कर रहे हैं।
0 कहा जा रहा है इस दौर में मुशायरे चुटकलेबाजी का पर्याय हो गए हैं?
0 नहीं वो चुटकलेबाजी नहीं वो गाने-बजाने वालों का एक ठेका होता है। कुछ लोग मुशायरों के नाम पर गाना-बजाना सुनते हैं। मैं भी उनके बुलावे पर कभी-कभी चला गया और खूब पैसे ले आया। बहुत ज्यादा पैसा लेता हूं मैं। फायदा होता है यह ठीक बात है। लेकिन वे उन लोगों को भी बुलाते हैं जो गली-मोहल्लों में एक-दूसरे से लिखवाते हैं और उनको भी रुपए दे देते हैं।
0 इस दौर में उर्दू भाषा की क्या स्थिति है? आपकी नजर में इसे बेहतर बनाने के लिए क्या उपाय है?
00 आप ही जैसे लोगों से मुझे उम्मीद है। उर्दू को प्रोत्साहित करने का यही तरीका है कि लिखने वालों से कहा जाए कि आप कोई ग़ज़ल लिखकर लाइए, हम हिन्दी में छाप देंगे और उर्दू में आप छपवाकर हमें दिखाना। तो उर्दू के छोटे-छोटे तरसने वाले लोग जब आपके यहां छपी हुई ग़ज़ल देखेंगे तो उसे खट से उर्दू में लिख देंगे। तो हिन्दी को चाहिए कि उर्दू की थोड़ी सी हिम्मत अफजाई करे।
0 उर्दू की ग़ज़ल की तुलना में हिन्दी ग़ज़ल की स्थिति को आप किस रूप में देखते हैं?
00 दोनों बिल्कुल एक हैं इसकी वजह यह है कि आप क्यों कहेंगे कि यह हिन्दी ग़ज़ल है और यह उर्दू ग़ज़ल है। मेरी अनेक ग़ज़लें हिन्दी में बड़े प्रकाशनों से लेकर नए प्रकाशनों ने छापी हैं तो इस लिहाज से ग़ज़ल को हिन्दी और उर्दू या फिर हिन्दू और मुसलमान में नहीं बांटा जा सकता।
0 कुछ लोगों का मानना है कि ग़ज़ल पर केवल उर्दू का ही अधिकार है। आप क्या कहना चाहेंगे?
00 यह बिल्कुल गलत और झूठ है। जिन लोगों का यह ख्याल है मैं उन्हें आदमी ही नहीं मानता हूं। (इसी प्रश्न पर वहीं बैठी हुई बशीर साहब की बेगम जो खुद एक अच्छी शायर हैं, कहती हैं- सबसे ज्यादा हिन्दी में अरबी और फारसी के लफ्ज़ इस्तेमाल करके हिन्दी ग़ज़ल लिखी जा रही हैं जबकि उर्दू में इतना इस्तेमाल नहीं हो रहा है।)
0 आपके विचार से हिन्दी ग़ज़ल को उर्दू ग़ज़ल की बहर-योजना पर ही चलना चाहिए या फिर उसे हिन्दी के व्याकरण व छन्द शास्त्र का अनुसरण करना चाहिए?
00 देखिए दोनों एक हैं। आप मुझे न हिन्दी के मीटर से देख सकते हैं और न उर्दू के। खुदा की कसम मुझे नहीं मालूम कि मेरी ग़ज़ल किस बहर में है। वो हिन्दी बहर में है, उर्दू बहर में है या फिर इस बहर का क्या नाम है, मुझे नहीं मालूम। मैं जो कहूंगा वो ही नगमा होता है।
0 आप क्या कहना चाहते हैं? क्या ग़ज़ल का अपना एक अलग कल्चर है? वो न हिन्दी है, न उर्दू है?
00 जी नहीं वो दोनों है।
0 साम्प्रदायिक दंगों को आप किस रूप में लेते हैं? क्योंकि आप खुद इस दौर से गुजर चुके हैं?
00 थोड़ा सा तो नुकसान हुआ कि कहीं मकान जला दिया गया, कहीं टेलीफोन तोड़ डाला गया, कहीं टीवी उठा ले गए। लेकिन देने वाला उससे ज्यादा देता है। आज मैं यह क्यों न कह दूं कि जिस वक्त मेरा घर लुटा था उस समय अगर मैं एक रुपए का आदमी था तो आज मैं दस रुपए का आदमी हूं। मेरा एक शेर है- वक्त सौ मुन्सिफों का मुन्सिफ है, वक्त आएगा इंतजार करो। ऊपर तो वो बैठा हुआ है आप मेरी दो-चार किताबें जला गए, दो-चार कुर्सी उठा ले गए लेकिन आज किताबों का, कुर्सियों का और पैसों का अम्बार भर गया। क्या नहीं दिया उसने। तो खुदा भी कोई चीज है न।
0 क्या साम्प्रदायिक दंगों का प्रभाव साहित्य पर भी
पड़ता है?
00 जो छोटे शायर होते हैं उन पर पड़ सकता होगा। मैं उनको जानता तक नहीं। यदि मुझे शक भी हो जाए कि यह साम्प्रदायिकता का चश्मा पहनकर लिख रहा है या किसी के पक्ष में है तो बहुत खूबसूरती से किनारा करके उससे बात करना बंद कर दूंगा।
0 क्या शेरो-शायरी हिन्दू और मुसलमान के बीच की खाई को दूर कर सकती है?
00 दूर कर सकती है। रघुपति सहाय, दयाशंकर नसीम- ये दोनों शायर उर्दू में हैं और दोनों शायर हिन्दी में हैं। ये कई साल पहले के लोग हैं। उस जमाने में ये शिखर पर थे लेकिन इस दौर में भी इनका महत्व कम नहीं हुआ है।
0 आजकल ज्यादातर पुरस्कार राजनीति का शिकार हो गए हैं। आपकी क्या राय है?
0 इसको केवल राजनीति से जोड़कर मत देखिए। इसमें कुछ व्यक्तिगत बातें भी हो सकती है। व्यक्तिगत यह कि मैं आपको बहुत आम आदमी लगूं। ऐसा लगूं कि न हिन्दी का हूं, न उर्दू का हूं, न नया हूं न पुराना हूं। आप मुझे किसी समिति का सदस्य, अध्यक्ष या जज बना दें या कुछ लोग मेरे पास नोमिनेशन के लिए आएं। तो यह मेरा अपना छोटापन और बड़ापन है। इसमें ऐसे लोगों को जरूर ढूंढना चाहिए कि जिनमें खुदा का डर हो और वो इंसाफ करना चाहते हों। इंसाफ करने में अगर कोई भूलचूक हो गई तो वो भूलचूक नहीं है। तो यह अपना स्टाइल हैं हमें इस स्टाइल की शायरी पसंद है तो हम इस आदमी को पुरस्कार देते हैं। तो देना भी चाहिए क्योंकि बहुत सारे स्टाइल हैं।
तो आपको नहीं लगता कि पुरस्कार देने में किसी तरह की राजनीति हो रही है?
जी नहीं, मुझे नहीं लगता कि राजनीति हो रही है। जो लोग इस मामले में राजनीति कर रहे हैं उन्हें मैं नहीं जानता क्योंकि ऐसे लोगों की साहित्य में कोई हैसियत ही नहीं होती है। साहित्य की दुनिया एक अलग दुनिया है। चाहे नीरज भाई (गोपाल दास नीरज) हो या बशीर बद्र हो, इनकी दोस्ती अलग है, प्यार अलग है। ये नहीं जानते हैं कि बीजेपी क्या है। हालांकि मैं जानता हूं कि बीजेपी क्या है लेकिन मेरे अंदर का शायर नहीं जानता कि बीजेपी किस चीज का नाम है।
0 अभी अपने बीजेपी का जिक्र किया। कुछ समय पहले बीजेपी से संबंधों को लेकर आपको भी आलोचना का शिकार होना पड़ा था।
00 मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सका। जब मैंने यह शेर कहा कि- उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए। तो लोगों को यह मालूम हो गया था कि एक नया शायर आ गया। इसके बाद से न तो मुझे किसी ने परेशान किया और न मुझे यह शिकायत हुई कि मुझे कम या ज्यादा सम्मान दिया गया। मेरे पास शब्द नहीं है शुक्रिया अदा करने के लिए मुझे इतना सम्मान दिया गया। जहां तक बीजेपी से ताल्लुक की बात है तो मुझे इस पर गर्व है। बीजेपी में हिन्दी वाला भी आ सकता है, उर्दू वाला  भी आ सकता है और अंग्रेजी वाला भी आ सकता है। इस संबंध में किसी भी जिम्मेदार आदमी ने मुखालफत नहीं की।
0 एक शायर होने के नाते अपनी शेरो-शायरी से कितना खुश हैं आप?
00 मैं बहुत खुश हूं। मुझे मालूम है कि मीर और गालिब अगर जिन्दा रहेंगे तो बशीर बद्र उनसे भी ज्यादा शान से जिन्दा रहेगा।
0 क्या आपको लगता है कि जो काम मुझे अभी करना था वह नहीं कर पाया या फिर समाज को जो कुछ देना था वह अभी नहीं दे पाया?
00 यह बात तो खुदा को मालूम होती है इंसान को नहीं। मैं तो समझ रहा हूं कि मैं सम्पूर्ण हो गया हूं। कल खुदा मुझे कोई ऐसा शेर दे दें कि वो मेरे सारे शेरों को धो दे तो ये उसका करम है। ये उसकी नवाजिश है। या कुछ ले भी ले लेकिन वो लेता नहीं देता ही है।